एक झूठ – 3

कलायन पत्रिका

एक झूठ


मथुरा कलौनी

खैर, जो भी करना सोच समझ कर करना। मैंने बुजुर्गी ओढ़ते हुये कहा था। बात मेरे लिये विशेष महत्व नहीं रखती थी। मेरे विचार से लड़की गलती कर रही थी। उसे सावधान करना मेरा कर्तव्य था, वह मैंने कर दिया। आगे वह जाने।

मेरी बात जानकी को अच्छी नहीं लगी थी। उसके हाव-भाव यही बता रहे थे। मैं सोच रहा था कि वह अब उठ कर चली जायेगी। वह गई नहीं, बैठी रही। बातों का सिलसिला कायम रखने के लिये मैंने उससे पूछा था,

‘गर्मी की छुट्टियों में जब तुम आई थीं, तो तुमने उस लड़के के संबंध में कुछ नहीं कहा था।’

‘आपने पूछा ही नहीं था।’ उसने कहा था।

‘मुझे क्या मालूम था जो पूछता! जिस तरह तुम मुझसे घुलमिल गई थीं, उससे मैं तो कुछ और ही सोच रहा था।’ मैंने कहा था और कहने के साथ ही मैं सोचने लगा था कि यह मैं क्या कह गया। जानकी यदि यह पूछे कि मैं क्या सोच रहा था तो असमंजस में पड़ जाऊँगा। जानकी ने पूछा भी था। ‘कुछ नहीं, ऐसे ही..’ कह कर मैंने बात वहीं समाप्त करने की चेष्टा की थी।

‘नहीं, बताइये न।’ जिद करते हुये जानकी ने कहा था।

किसी लड़की के साथ आपने बुरूँज के फूल तोड़े हों और वह जानकी की तरह आपके पास बैठ कर जिद कर रही हो तो वह लड़की आपको उस समय प्यारी लगेगी ही। जानकी उस समय मुझे भी प्यारी लग रही थी। उसका हाथ मैंने अपने हाथ में ले लिया था। उसने भी छुड़ाने का कोई प्रयत्न नहीं किया था। उसी समय अंजना उसे खोजती हुई आई थी। वह उठ कर उसके साथ चली गई थी और मैं सोचता रह गया था।

मेरे पास ढेरों काम थे। मैं उनमें जुट गया था। लेकिन दिमाग में जानकी थी। मैं यही सोच रहा था कि कहीं वह बेवकूफी न कर बैठे। दोपहर खाने के बाद जब पंडित परिवार आराम कर रहा था वह फिर नीचे मेरे पास आई थी।

‘जानकी मैं तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था। मुझे नही लगता कि तुम्हारी जोड़ी मनमोहन के साथ बैठेगी।’ मैंने कहा था।

‘यह कैसे कह सकते हैं आप?’ उसने पूछा था। इस समय उसके स्वर में उत्तेजना नहीं थी।

‘तुम जानती ही कितना हो उसको? चोरी छिपे मिलती होगी, वह भी थोड़े समय के लिये। मुझे तो यह भी विश्वास नहीं है कि तुम उससे प्यार करती हो।’

‘करती हूँ।’ जानकी ने कहा था। मुझे उसकी आवाज खोखली लगी थी।

‘मुझे पूर्णतया विश्वास नहीं होता।’ मैंने कहा था। ‘अच्छा एक बात बताओ, मेरे साथ बात करना तुम्हें कैसा लगता हे?’

‘अच्छा लगता है।’ उसने कहा था।

‘केवल अच्छा लगता है, बस! यह जो अपने भेद बता रही हो मुझे, पिछली गर्मी में इतना घूमीं मेरे साथ, यह सब क्या यह नहीं दिखाता कि यह अच्छा लगने की सीमा से कुछ अधिक ही है।’

‘हाँ, बहुत अच्छा लगता हे।’ उसने कहा था।

‘क्या यह अच्छा लगना प्यार में नहीं बदल सकता!’ मैंने कहा था। आशा के विपरीत वह मेरी बात से विचलित नहीं हुई थी। शांत और सयाने भाव में उसने उत्तर दिया था,

‘प्यार और अच्छा लगना एक बात थोड़े ही है।’

‘प्यार जब होता है तो कोई धमाका थेड़े ही होता है? बस ऐसे ही तो आरंभ होता है।’

‘शायद।’ उसने बहुत धीमे स्वर में उत्तर दिया था।

‘शायद क्या? ऐसे ही होता है।’मैने कहा था । ‘मान लो, तुमको किसी कारणवश छह या सात महीनों के लिये यहीं मेरे होटल में रुकना पड़ जाय तो क्या हमारे संबंध गाढ़े नहीं हो जायेंगे? तुम मेरे संबंध मेंे बबहुत कुछ जान जाओगी और मैं तुम्हारे संबंध में। मेरा तो विश्वास हे कि तुम मुझसे ही प्यार करने लग जाओगी। मनमोहन अतीत का विषय हो जायेगा।’

‘मैं क्या जानूँ?’ उसने कहा था।

‘यह जो तुम मैं क्या जानूँ बोलद रही हो न, मैंने अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुये कहा था,’उसी से पा चलता है कि बात संभव है। नहीं तो तुम कहतीं कि ऐसा हो ही नहीं सकता है। तुम बोलतीं कि मनमोहन को प्यार करने के बाद कोई दूसरा व्यक्ति तुम्हारे जीवन में आ ही नहीं सकता।’

‘मैं क्या जानूँ?’ उसका एक ही उत्तर था।

इसके बाद हम दोनों के बीच थेड़ी चुप्पी छा गई थी। वह क्या सोचने लगी थी यह तो वही जाने, लेकिन थोड़ी देर केलिये मेरे जहन में यह सवाल उभरा था कि क्या यह संभव है? थेड़ी देर से अधिक मैं इस सवाल पर हीं ठहर सका था। मेरे मामा-चाचा क्या कहते! भाई भूखे हैं, बहन अनब्याही है, बाप क्षय रोग का मरीज है और द्वारका अपनी जिम्मेदारी को ताक पर रख कर इश्क फरमा रहा है। लेकिन मनमोहन के प्रति जानकी का मोह मुझे अच्छा नहीं लग रहा था या यूँ कहना चाहिये गलत लग रहा था। इसलिये उसी बात को आगे बढ़ाते हुये मैंने जानकी से कहा था,

 

आगे

Powered By Indic IME