निष्कासित

लड़का ऊँची जात का था। पंद्रह सोलह साल उमर रही होगी। वयःसंधि का जोश था। एक विजातीय लड़की
से प्रेम हो गया। एक दिन स्कूल से लौटा ही नहीं। अगले दिन उसकी लाश नाले में पड़ी मिली। सबको मालूम
था कि क्यों हत्या हुई है। लोगों के चेहरों पर यही भाव था कि यह तो होना ही था। तब से मन कुनमुना रहाथा कि इस कुप्रथा पर कुछ लिखूँ। फिर मुलाकात हुई लखनऊ के प्रसिद्ध साहित्यकार सुधाकर अदीब जी से। उनकी इसी विषय पर एक मार्मिक कहानी पगडण्डी के पात्र मेरे जहन में बस गये। उन्ही पात्रों को आधार बना कर मैंने निष्कासित की रचना की है। नाटक शीघ्र आ रहा है। बेंगलुरु जागृति थिएटर – अगस्त 31 – सितंबर 2 । एडीए रंगमंदिरा- सितंबर 14, 2018।

नया सवेरा – बृजेन्द्र श्रीवास्तव “उत्कर्ष” की कविता

कायापलट

जब ध्रुव का बिछड़ा दोस्त महेश उससे मिलने आता है तो उसे क्या मालूम था कि उसके साथ कुछ ऐसा घटेगा जिसकी कल्पना वह इस जन्म में तो क्या किसी जन्म में भी नहीं कर सकता था। वह अपने को एक ऐसे नये परिवेश में पाता है जहाँ उसे अपने ही घर के बारे में कुछ मालूम नहीं रहता है। आप मिलेंगे जनार्दन से जिसने जीवन का निचोड़ बोतल में खोज निकला है, जुल्फी से जो नौकर कम शायर ज्यादा है, पड़ोस की छम्मक छल्लो मल्लिका से… रुकिए रुकिए… यहाँ एक चोर भी है। और इन सब के बीच में है चंद्रा। “लोग गायब हो जाते हैं, गुम हो जाते हैं, पर यह पहली बार है कि आदमी चोरी हो गया है।“ हँसी ठहाकों से भरपूर नाटक जिसके पात्र पाठकों को बहुत दिनों तक गुदगुदाते रहेंगे।

तू नहीं और सही

जो रिश्ता दो साल के लंबे समय तक चले वह केवल एक अरेजमेंट बन कर नहीं रह जाता। उससे आगे भी  कुछ होने का दावा करता है| पढ़िए मथुरा कलौनी का बहुचर्चित लघुनाटक तू नहीं और सही। ( इस नाटक को नवें अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन बीजिंग चीन में नाट्य पाठ के लिये आमंत्रित किया गया था)

चमनलाल की मौत

चमनलाल कोई भी हो सकता है, आदमी भी हो सकता है और औरत भी। विजय कुमार की कलम से एक मार्मिक कहानी। पढि़ए विजय कुमार की एक दिलचस्प कहानी ‘चमनलाल की मौत’

  

आँगन की चिडि़या

वह तो आँगन की चिड़िया थी, जो अपना आँगन छोड़ उड़ चुकी है। अब तो उसे सिर्फ मेहमान बनकर आना है। चार दिन हँस खेलकर फिर वापस लौट जाना है।…
पढि़ए राजुल आशोक की एक दिलचस्प कहानी ‘ आँगन की चिड़या

  

सभी जानते हैं उसके संबंध में लेकिन कोई भी उसका नाम अपनी जुबान पर नहीं लाता। नाम उच्चारण करने में बहुत अश्लील लगता है। पढि़ए मथुरा कलौनी की एक दिलचस् प कहानी ‘ उसके बारे में’.

कहते हैं युवावस्था में मन मचल जाता है, दृष्टि फिसल जाती है इत्यादि। रूमानी साहित्य में कालेज-जीवन में ऐसी घटनाओं के होने का वर्णन मिलता है। मेरा छात्र-जीवन अतीत के गर्त में कहीं है तो सही पर उसका वर्णन यहाँ पर विषयांतर होगा। संप्रति नैनीताल में मेरे पास इन सब बातों के लिये समय ही नहीं है।
अपने बारे में कभी कभी-कभार सोच लेता हूँ बस। मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है मानो मैंने लड़कपन से सीधे प्रौढ़ावस्था में प्रवेश कर लिया हो, बीच के युवावस्था वाले भाग को लाँघ कर।
क्या इस कहानी का नायक झूठ बोल रहा है।

पढि़ए मथुरा कलौनी की कहानी एक झूठ

सुमति बिफर गई। उसने मेरी बात पूरी नहीं होने दी। ‘उस तरह मुस्कराने के लिए मैं चार दिनों से अभ्यास कर रही थी शशि। मेरा भी आत्मसम्मान हो सकता है यह तुम्हें ध्यान नहीं आया।’

मथुरा कलौनी की एक मर्मस्पर्शी कहानी तुमने कुछ कहा होता। 

अंतिम शरण्य

किस विषम परिस्थिति में डाला विचलित मन काँप-काँप जाता,
कैसी यह आज्ञा सखे, कि जिसको सुन कर ही मन घबराता!
द्रौपदी की द्विविधा को उजागर करती प्रतिभा सक्सेना की कविता अंतिम शरण्य

शरीफ बदमाश

हम तुम्हारा भाषण सुनने के लिए यहाँ नहीं आये हैं और न ही विश्वविद्यालय का परिचय-पत्र इस बात का प्रमाण है कि तुम बहुत शरीफ हो।

आजकल विश्वविद्यालय एवं कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र रातों-रात अमीर बनने के लिए बदमाशों की शागिर्दी में जाते हैं और फिर किसी हॉस्टल में दाखिला लेकर अपने को पढ़ाकू छात्र साबित करने की कोशिश करते हैं।

सब कुछ ठीक ठाक है

एक जमाना था जब हम जवाँ थे, एक जमाना यह है जब कहना पड़ रहा है कि हम अब भी जवाँ हैं। फर्क इतना है कि तब दिल से सोचते थे और अब थोड़ा बहुत दिमाग से भी सोच लेते हैं।

प्यार तब भी अपरिभाषित था और आज भी अपरिभाषित ही है। इसमें दिमागी सोच कम ही काम करती है।

ग़ालिब कह गये हैं –

‘यह आग का दरिया है..’

सामरसेट माम कह गये हैं
‘प्यार के मामले में तटस्थ मत रहो..’
प्यार के इस पहलू पर लिखी गई यह कहानी काल्पनिक हैं पर कपोल काल्पनिक नहीं।

-मथुरा कलौनी

शुभ दीपावली

दीप जलाने हों तो, मन के दीप जलाओ
नफरत का तिमिर हटा, चेहरों पर मुसकान लाओ

जरा सा घी दे दे माई

‘कौन है इहाँ दूध का धुला ,
बड़े ऊँचे -ऊँचन ने छला।!
कलपती हुइ है मातु कृपी!’
‘जरा सा घी दे दे माई।’

पढि़ये महाभारत के महारथी अश्वत्थामा पर प्रतिभा सक्सेना की कविता ‘जरा सा घी दे दे माई’

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