निष्कासित
लड़का ऊँची जात का था। पंद्रह सोलह साल उमर रही होगी। वयःसंधि का जोश था। एक विजातीय लड़की
से प्रेम हो गया। एक दिन स्कूल से लौटा ही नहीं। अगले दिन उसकी लाश नाले में पड़ी मिली। सबको मालूम
था कि क्यों हत्या हुई है। लोगों के चेहरों पर यही भाव था कि यह तो होना ही था। तब से मन कुनमुना रहाथा कि इस कुप्रथा पर कुछ लिखूँ। फिर मुलाकात हुई लखनऊ के प्रसिद्ध साहित्यकार सुधाकर अदीब जी से। उनकी इसी विषय पर एक मार्मिक कहानी पगडण्डी के पात्र मेरे जहन में बस गये। उन्ही पात्रों को आधार बना कर मैंने निष्कासित की रचना की है। नाटक शीघ्र आ रहा है। बेंगलुरु जागृति थिएटर – अगस्त 31 – सितंबर 2 । एडीए रंगमंदिरा- सितंबर 14, 2018।













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