एक झूठ – 2
कलायन पत्रिका
एक झूठ
मथुरा कलौनी
‘हाँ।’ उसने कहा था। एक हाथ की अँगुलियाँ उसने दूसरे हाथ में फँसा रखी थीं। जुड़े हुये हाथों से अपना निचला होंठ दबाते हुये उसने उत्तर दिया था। उत्तर देते समय वह स्थिर-चित नहीं थी। या हो सकता है यह मेरा वहम रहा हो। मैं उससे नकारात्मक उत्तर की आशा कर रहा था। उसके हाँ कहने से मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था। उस समय मैंने लक्ष्य किया कि वह मेरी ओर ही देख रही थी। मुझे लगा था जैसे वह जानना चाहती हो कि उसकी हाँ का मेरो ऊपर क्या प्रभाव पड़ा।
‘वह क्रिश्चियन है’ मेरे साथ आँखें चार होते ही उसने कहा था।
‘कब से जानती हो उसे?’
‘वैसे तो उसे मैं बहुत दिनों से जानती हूँ। मेरे साथ ही पढ़ता था।’
‘और ऐसे कब से जानती हो!’
‘एक साल से।’
‘शादी करोगी उससे?’
‘हाँ।
‘तुम्हारे घरवाले जानते हैं?’
‘नहीं।’
‘मान जायेंगे!’
‘नहीं।’
‘फिर!’
‘पता नहीं। मैंने बहुत सोचा पर कुछ समझ में नहीं आता।’
‘लड़का क्या कहता है?’
‘कुछ नहीं।’
‘कुछ तो कहता होगा।’
‘नहीं, इस बारे में कुछ नहीं कहता। बस कहता है कि समय आने पर देखा जायेगा।’
‘आ गया है। कुछ रिश्ते आये हैं। एक पर मम्मी और डैडी गंभीरता से सोच रहे हैं।’
‘और तुम्हें अभी तक पता नहीं है कि तुम दोनों क्या करने वाले हो?’
उत्तर में जानकी ने नकारात्मक में सिर हिलाया था।
‘उसके माँ-बाप क्या कहते हैं?’
‘वे तो मुझे बहुत मानते हैं। ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे मनमोहन मुझसे एक या दो दिन में ही शादी करने वाला हो।’
‘और मनमोहन तुमसे कुछ नहीं कहता है!’
वह चुप ही रही थी।
‘उसे मालूम है तुम्हारे लिये रिश्ते आ रहे हैं?’
‘हाँ।’
‘फिर वह चुप कैसे रह सकता है!’
‘वह कहता है कि मैं अपने मॉ-बाप से बात करूँ।’
‘अपने माँ-बाप से बात करने का साहस है तुममें?’
फिर एक बार वह चुप रही थी।
‘वह करता क्या है?’
‘नौकरी की तलाश में है।’
‘जानकी, तुमने कभी सोचा है कि वह तुम्हारे साथ केवल समय बिताना चाहता है?’