एक झूठ – 5

कलायन पत्रिका

एक झूठ


मथुरा कलौनी

 

‘चलो भई, हम चुप हो जाते हैं। तुम्हीं बताओ अपनी सगाई की बात।’ अंजना ने कहा था। तब मेरी समझ में आया था कि क्यो जानकी मुझसे कतरा रहीं थी।

‘सगाई हो गई जानकी?’ मैंने पूछा था।

‘जी।’ जानकी ने कहा था।

‘बधाई हो।’ मैंने कहा था।

अंजना एक बार मेरी ओर और एक बार अपनी दीदी की ओर देखते हुये बोली थी,

‘द्वारका जी, आपने पूछा ही नहीं कि सगाई किसके साथ हुई है!’

‘मनमोहन के साथ?’ मैंने अंजना की ओर देखते हुये पूछा था।

‘मनमोहन के साथ! अरे आप गलती कर ही गये न। मनमोहन का केस तो शुरू से ही बहुत कमजोर था। वह तो किसी गिनती में था ही नहीं। आपका केस जो…’

जानकी ने उसकी बात पूरी नहीं करने दी थी। जोर से डाँट कर कहा था,

‘अंजू, क्या बकवास लगा रखी है। जो मुँह में आता है बक देती है।’

‘ठीक है बाबा, मैं चलती हूँ। लगता है मेरी यहाँ आवश्यकता नहीं है।’ कह कर और मुँह बना कर अंजना वहाँ से चली गई थी।

‘आप अंजना की बातो का बुरा मत मानियेगा। मुँह में जो आता हे बक देती है।’ जानकी ने कहा था।

‘बुरा मानने लायक उसने कुछ कहा ही नहीं।’ मैंने कहा था। फिर मैंने जानकी पूछा था कि क्या वह चाय पीयेगी?
‘नहीं मैं ऊपर पी चुकी। ‘ जानकी ने कहा था।

‘पहले तो ऊपर नहीं पीती थीं। मेरे साथ ही पीती थीं। अब क्या हो गया? मंगनी हो गई है, इसलिये?’

‘नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं है। आपने ऊपर भिजवाई थी, वहीं पी ली।’

‘एक और कप पीओ।’ मैंने जोर दे कर कहा था।

चाय पीते हुये बातों का टूटा हुआ सिलसिला जोड़ने की चेष्टा करते हुये मैंने कहा था,

‘क्या तुम अपनी सगाई से खुश हो जानकी?’

‘मैं इस संबंध में सोचती ही नहीं। जैसे पहले थी वैसी ही अब भी हूँ।’ उसने कहा था।

‘तुमने मनमोहन से क्या कहा?’

‘कुछ नहीं।’

‘तुमने उसे बताया तक नहीं कि तुम्हारी सगाई हो गई है!’

‘उसे मालूम है।’ उसके उत्तर में कुछ रुखाई थी। एक निश्चयात्मकता थी, जैसे कह रही हो कि मनमोहन जब था तब था। अब मनमोहन से कहीं अच्छा पात्र मिल गया है, इसलिये अब उसमें मेरी दिलचश्पी नहीं रही। एक कठोरता थी, जैसे कह रही हो कि सभी भूल करते हैं, मैंने भी की है, जिसे याद दिलाये जाने की आवयश्यकता नहीं है।

‘तुम्हारा नया मंगेतर कैसा है?’ मैंने पूछा था।

‘अच्छे हैं।’

‘उससे तुम्हारी चिट्ठी चलती है?’

‘हाँ’

‘क्या लिखता है वह?’

‘इससे आपको क्या?’

जानकी से मुझे ऐसे उत्तर की अपेक्षा नहीं थी। कहा भी उसने बड़ी रुखाई के साथ था।

‘हाँ मेरा पूछना गलत हो सकता है, ‘ मैंने कहा था, ‘लेकिन पिछली बार जब तुमने मुझे मनमोहन के साथ घटी सभी छोटी-बड़ी बातें बाताई थीं, उसी से…’

‘पिछली बार भी मैं आपको ऐसा ही उत्तर देने वाली थी, लेकिन आप बुरा मान जायेंगे कर के…’ आखिरी शब्द को लंबा खींचत हुये उसने वाक्य पूरा किया था।

उसका उत्तर सुन कर मेरे अंदर एक तीव्र इच्छा यह जागी कि किसी तरह जानकी को चोट पहुँचाओ। कुछ ऐसा कहो कि वह तिलमिला जाय। मैं केवल इतना भर कह कर रह गया,

‘नहीं जानकी, पिछली बार तुम मुझको ऐसा उत्तर नहीं देने वाली थीं, क्यों कि पिछली बार तुम्हें मेरी आवश्यकता थी जो अब नहीं रही।’

इसके बाद फिर कभी जानकी से मेरी एकांत में बात नहीं हुई। अब तो थोड़े ही दिनों में उसकी शादी होने वाली है। बात आई गइग् हो गई है।

जानकी के बारे में कभी कभार सोच लेता हूँ, बस। जानकी इतने दिनों मेरे होटर में रही। उसकी याद तो आयेगी ही। जितने भी टूरिस्ट नियमित रूप से मेरे होटल में आते हैं, उनकी याद आती ही है। उन्हीं को ले कर तो मेरा व्यवसाय है। अब मिस्टर पंडित अगली बार जब आयेंगे तो उनसे जानकी के बारे में पूछना स्वाभविक ही होगा। मैं अपने अनुशासन की जकड़ से कभी बाहर निकल ही नहीं सकता। अपने ही अनुशासन को ताक पर रखना दुर्बलता है, और मैं द्वारकानंद कभी दुर्बल हो ही नहीं सकता। दुर्बल होना मेरे लिये विलासिता है। बस इतना ही कह सकता हूँ कि जानकी के साथ बीते कुछ अंतरंग क्षणों में मैंने अपने आप को सीमित रूप से निरंकुश कर दिया था।

 

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