अग्निरेखा – 4

इधर गुप्ता के घर पर छापे मारे गये लाखों रुपये की नकदी जेवरात लॉकर्स और बेनाम संपत्ति मिली थी। एक रेंज अफसर के पास इतनी संपत्ति! तब सुर्खियों में यह खबर छपी थी।

गुप्ता का भाग्यचक्र पलट गया था! भाई ने कोठी पर कब्जा कर लिया था। उसकी पत्नी के नाम पर जो पैसा तथा सोना था वह भी उसने दबा लिया था। गुप्ता के लिए वह सब गले की हड्डी बन गया था, न थूक सकते थे न निगल सकते थे। मुसीबत का यह वक्त गुप्ता के लिए प्राण लेवा साबित हुआ था। जवान होती लड़कियाँ, बेटे का बीच में लटका कैरियर, अपनों से चोट खाया मन, चिड़चिड़ी होती पत्नी और कई जाँचों से घिरे गुप्ता!

“”इतना बड़ा धोखा! एक ही बात गुप्ता के भीतर घुन की तरह लग गयी थी । अपनों के द्वारा छले जाने की यातना गुप्ता को अंदर ही अंदर सुखाये जा रही थी।

“”अब क्या होगा ?”

पति-पत्नी खामोश बैठे अपनों को कोसते रहते। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था। जहाँ जाते लगता बेइज्जत करके निकाल दिए गये हों। उन्हें लगता हर कोई उनकी नीयत पर संदेह भरी निगाहें फेंक रहा है। गुप्ता को अनिद्रा और उच्च रक्तचाप की बीमारी ने पकड़ लिया था।

इधर चैतीराम और साँवली की मुसीबतें दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थीं। एक-एक मटका पानी के लिए मीलों दूर तक जाना पड़ता आधे पेट रहना तो आम बात हो गयी थी। तीन-तीन बच्चों की हड़ीली बीमार काया देखकर साँवली का कलेजा मुँह को आ जाता था।

तीन वर्ष बाद।

किसी तरह तीन वर्ष गुजर गये।

गुप्ता का सस्पेंशन खतम हो गया था। यहीं आफिस में अटैच्ड कर दिया गया था। जीवन में थोड़ा-सा सुकून मिला था नौकरी बचने से।

आज चैतीराम और साँवली को अपने सामने देखकर गुप्ता को बीते दिन याद हो आये।

“”मालिक, कोई काम मिलेगा?”
“”तुम तो जानते हो चैती, सरकार ने हमारे खिलाफ कितनी सख्त कार्यवाही की है। हम खुद परेशानी में चल रहे हैं।”
“”मालिक, हमने तो आपको चैताया था, पर…”
“”जब खराब वक्त आता है तो मति मारी जाती है, चैतीराम।”
“”हम बड़ी आस लेकर आये हैं मालिक।” चैतीराम की सूनी निगाहें गुप्ता के चेहरे पर ठहर गयी।

गुप्ता ने बीस का नोट उसकी गद्दी पर रखा, “”कुछ खाने-पीने के लिए ले आओ।”

नयी जगह नये लोग चैतीराम क्या जाने कि कहाँ क्या मिलेगा ? पास की चाय की दुकान से थोड़ा बहुत खाने का सामान ले आया और बच्चों को खिला दिया।

“”हम आपके सिर पर बोझा नहीं बनना चाहते हैं मालिक।” चैती के पिचके गाल और अंदर धँसीं आँखें देखकर गुप्ता का मन भर आया। इधर चैती को लग रहा था मालिक बेवक्त बूढ़े हो गये हैं। कैसा भरा-भरा चेहरा था। उधर पत्नी बड़बड़ किए जा रही थी, क्योंकि साँवली पहले की तरह साफ-सुधरी चमक-दमक वाली नहीं रह गयी थी। तीन-तीन बच्चे बाहर शोर मचाते रहते हैं।

“”कहाँ जायेंगे बेचारे। उम्मीद लेकर आये हैं।” गुप्ता पत्नी को समझा रहे थे।0

“”चैती, तुम भी काम ढूँढ़ो और हम भी देखते हैं।”

नाले के किनारे पेड़ों के नीचे, जैसे तमाम मजदूरों ने पन्नियों और बोरों को खींचकर खोली बना ली थी वैसी ही व्यवस्था चैती कर सकता था।

आते-जाते कई लोगों से गुप्ता बात कर रहे थे। दोपहर से शाम हो जाती। शाम से सुबह। खुले आसमान के नीचे पड़े पाँच आदमी सूनी आँखों से आकाश को तकते रहते। बेशुमार गाड़ियों से भरे शहर में उनके लिए कोई ठिकाना न था ।18

“”इन्हें जाने क्यों नहीं देते! क्यों बैठा रखा है?” पत्नी ने नाराज होकर कहा।

“”एक दो दिन में काम मिल जायेगा। अपने आप चले जायेंगे।” गुप्ता ने पत्नी को समझाते हुए कहा! गुप्ता के मन में जो योजना चल रही थी, वह फिलहाल पत्नी को भी नहीं बताना चाहते थे। जो व्यक्ति यह काम करवाना चाहता था, वह भी गुप्ता के साथ पार्टनरशिप करने के लिए तैयार था, पर गुप्ता ही असमंजस में थे। वे उस पर भरोसा नहीं कर पा रहे थे। सगा भाई जब अपना न हुआ तो पराया क्यों साथ देगा! जिसके नाम जो चीज़ होती है वही अपनी कहने लगता है, और करने वाला रह जाता है। गुप्ता ने कितना किया था कितना कमाया था लेकिन आज क्या है हाथ में सिवा अपयश और बेईमान भ्रष्ट उपाधि के!

फिर भी गुप्ता को एक मौका मिल रहा था जिसका यह फायदा उठा लेना चाहते थे। इसलिए गुप्ता और उनका दोस्त भट्ट लगातार उस योजना पर बात कर रहे थे। दोनों को फायदा दिख रहा था और एक ऐसा व्यक्ति जो फिलहाल यहाँ से नहीं जा सकता था, तो क्यों न उसके आने का, उसके नाम का, उसकी जाति का, उसको मिलने वाली छूटों का फायदा उठाया जाये। भट्ट चूँकि इंडस्ट्रीज विभाग में अधिकारी थे और उनके संपर्क में ऐसी तमाम योजनाओं को बनाने वाले लोग आते थे, जिनका मकसद अल्पकालीन सप्लाइ का काम पकड़कर पैसा बचाना होता था!

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