अग्निरेखा – 5

“”महिला आदिवासी हो, तो और भी फायदेमंद रहेगा तुरंत काम मिल जायेगा। कोई पुरानी सोसायटी हो तो खरीद डालो और लायसेंस ले लो, एक-दो साल सप्लाइ करके बंद कर देना।” गुप्ता के दोस्त ने प्रोजेक्ट की फाइल थमाते हुए कहा।

“”वह मानेगा? पूछेगा ? बताना पड़ेगा उसे तब तो उसका भी हिस्सा रहेगा। कल के दिन कुछ हो गया तो वह मेरे खिलाफ खड़ा हो जायेगा।” गुप्ता सशंकित होकर बोले।

“”आपके खिलाफ कैसे जायेगा? अपने पास रखो। अपने साथ! बड़े-बड़े लोगों ने आदिवासियों के नाम पर जमीनें ले रखी हैं। फिर आप तो उसको परिवार सहित सहारा दे रहे हैं।”

“”इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा, न आदमी। वह भी मजबूर ह,ै चूं-चपड़ नहीं करेगा ।” गुप्ता को सारी योजना साकार होती नजर आ रही थी। गुप्ता का दिमाग कम्प्यूटर की तरह काम करता है, हिसाब-किताब लाभ-हानि कहाँ किसको कैसे फिट करना है, पटाना ह,ै दबाना है, मँजे हुए खिलाड़ी की तरह खेलना जानते हैं गुप्ता। सुबह लॉन में चाय पीते गुप्ता का चेहरा खिला हुआ था। वही वर्षों पुरानी मुस्कान थी उनके चेहरे पर! एक रहस्यमयी मुस्कान!

“”चैती, तुम्हारे लिए एक कमरा देखा है, वहाँ जाकर रहो, बच्चों को जुलाई से स्कूल में भर्ती करवा देना। साँवली घर का काम करेगी या बच्चों को सँभालेंगी?” गुप्ता के स्वर में गहरी आत्मीयता थी । अपनत्व था। अधिकार था। वे अपने जीवन की दूसरी पारी खेलने जा रहे थे। जिसके कर्णधार थे चैतीराम और साँवली। और गुप्ता थे सारथी, उनका दोस्त था पीछे से हाथ लगाने वाला। साईड बिजनेस और प्रोजेक्ट तो ऐसे ही पूरे किए जाते हैं।

बढ़ी-बड़ी परियोजनाओं पर काम करने वाले लोग जानते हैं कि सफलता कहाँ और कैसे मिलती है? गुप्ता तथा भट्ट के संपर्क थे। व्यवसाय करना जानते थे। पैसा फैंकना आता था और पैसे से कैसे पैसा बनाया जाता है, इसमें दोनों पारंगत थे। डेढ़-दो वर्ष बाद ही गुप्ता की लड़कियाँ अच्छे स्कूल-कॉलेज में पढ़ रही थीं। लड़का एमबीए करने के लिए लंदन चला गया था और श्रीमती गुप्ता अपने खूबसूरत चेहरे पर मोहिनी मुस्कान लिए फिर शापिंग करने के लिए जाने लगी थी। लेकिन चैतीराम जो इंडस्ट्री का प्रोप्राइटर था और साँवली जो संस्था की सचिव (अध्यक्ष गुप्ता की पत्नी थी) थी उनका परिवार वहीं, उसी एक कमरे में रह रहा था। हाँ दोनों बच्चे सरकारी स्कूल में जाने लगे थे और साँवली पहले की तरह मालकिन की सेवा करती हुई उनकी उतरन पुरानी साड़ियाँ पहन रही थी। अँगूठा लगाने और हस्ताक्षर करने की इससे ज्यादा और क्या कीमत हो सकती थी! गुप्ता जब कभी एकांत में सोचते तो उनकी अंतरात्मा उनसे पूछती पहले तो तुमने जंगलों को लूटकर कमाया था और जब जंगल वालों को! लेकिन यह सोच क्षण भर के लिए उठती जैसे पानी का बुलबुला उठा और फूटकर और पानी की धार में मिल गया। काम खतम होते ही चैतीराम अपनी जगह और गुप्ता फिर जंगलों के बीच होंगे। इसी आशा में गुप्ता अपना समय काट रहे थे। लेकिन उस दिन गुप्ताजी की नींद उड़ी हुई थी। दो दिन से चैती और साँवली का कहीं अता-पता नहीं था। हफ्ता दस दिन की प्रतीक्षा के बाद भी वे सब नहीं आये थे। गुप्ता ने सब जगह ढूँढ़ लिया था। गुप्ता पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट नहीं लिखवा सकते थे क्योंकि वे उनका कोई सामान चुराकर नहीं ले गये थे। जो नुकसान उनके न होने पर होने वाला था, वह गुप्ता किसी के सामने प्रकट नहीं कर सकते थे। सब एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे थे, खासकर गुप्ता की पत्नी ने ताने मार-मारकर गुप्ता को परेशान कर दिया था। और उधर चैती गुप्ता के काम और ईमान दोनों को पूरी तरह से समझने के बाद जंगलों के भीतर और भीतर घुसता चला गया था। जंगलों के इतने भीतर कि जहाँ से राजधानी के प्रमुख विभागों को थर्रा देने वाले और साँसत में डाल देने वाले बम के धमाकों की गूँज सुनाई देती थी।

 

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