अग्निरेखा – 3
कलायन पत्रिका
एक झूठ
मथुरा कलौनी
गुप्ता की उदारता, विनƒाता और मोहक मुस्कान के सामने सब चित हो जाते थे। ऐसा कत्र्तव्यपरायण और परिवार से प्रेम करने वाला इंसान कहाँ मिलेगा? लेकिन इन सबके बीच, इन सबसे अप्रभावित तथा चिन्तित एकमात्र शख्स था जो गुप्ता को लंबी-लंबी चिट्ठियाँ लिखकर जीवन की ऊँच-नीच, संस्कार, पैसे का अत्यधिक मोह और बेलगाम दौड़ के दुष्परिणामों से अवगत करवाता रहता था, वह थे उनके चाचा। लेकिन अब गुप्ता बच्चा नहीं थे। वे चाचा की छत्रछाया से बहुत दूर निकल चुके थे। बस्तर तथा आसपास के घने जंगलों में सेंध मारकर उन्हें पोला करने वाले गुप्ता की शिकायतें हुईं। परिणामस्वरूप उनका ट्रांसफर कर दिया गया। गुप्ता ने ट्रांसफर तो ले लिया लेकिन वह पूरे समय “पहले जैसी’ किसी जगह पर लौटने के लिए प्रयास करते रहे। सरकार बदलते ही गुप्ता ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। युवा होती तीन लड़कियों की पढ़ाई फिर शादी की चिन्ता। इकलौते पुत्र को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजने का सपना भीतर ही भीतर पल कर टूट रहा था। बीच के दो साल राजधानी में नौकरी करते हुए गुप्ता के बेहद कष्टदायी निकले थे। बिना कमाई के। बिना जंगलों के! “शांति’ के साथ नौकरी करते हुए। और जैसा कि चलन था कुछ ले-देकर गुप्ता ने लोगों की निगाह से दूर यह जगह (परासिया) ले ली थी ।
एक बार फिर जंगल उनके आसपास थे। समृृद्ध सघन आसमान को छूते जीवंत जंगल। इसी समय इसी स्थान पर गुप्ता को चैतीराम और साँवली मिले थे। कुछ ही दिनों में वे दोनों गुप्ता दंपति के प्रिय सेवक बन गये थे। आसपास के माहौल से, व्यक्तियों से परिचित करवाने में, साहब का कोई भी काम करने मे चैतीराम हमेशा आगे-आगे रहता था। यहाँ आकर गुप्ता पाँच-सात महीने तोे आराम से नौकरी करते रहे पर जैसा कि रस्सी का स्वभाव होता है कि ऐंठना, और कुत्ते की पूँछ का टेढ़ी होना, वैसा ही स्वभाव कुछ-कुछ गुप्ता का बन गया था। चैतीराम को सुनाई देने लगी थी रात में पेड़ों के कटने-चिरने और हरहराकर गिरने की मनहूस आवाजें। पक्षियों के भयभीत होकर उड़ने पंख फड़फड़ाने की बेचैन आवाजें। जानवरों के भागने और चौंकने चौंकाने की व्याकुल आवाजें। चैतीराम समझ गया था मालिक भी और अफसरों की तरह जंगलों को उजाड़ने आये हैं। अपने पिता से चैतीराम जगल के लिए बनाये गये कानूनों के बारे में सुनता आया था। ताज्जुब कि उसका पिता जीवन भर उन कानूनों की रक्षा करता रहा और न ये बड़े अफसर, न सख्त कानून, न स्थानीय नेता, न जनता और न इनकी गोद में रहने वाले लोग इन जंगलों की रक्षा कर पा रहे थे! लगता था सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। चैतीराम हर बार गुप्ता को समझाने की चेष्टा करता लेकिन जैसे ही गुप्ता के सामने पड़ता उसकी जुबान लड़खड़ाने लगती। लेकिन एक दिन चैतीराम ने डरते-डरते बोल ही दिया,
“”मालिक, जानवरों का खतरा बढ़ गया है। यहाँ के लोगों का रहना मुश्किल हो जायेगा। लोग आपका नाम” चैती पूरा वाक्य बोल पाता इससे पहले ही गुप्ता चीख पड़े।
“”क्या बकवास करते हो! अपनी जबान सँभालकर रखो। मुझ पर इल्जाम लगा रहे हो। अपनी औकात में रहो।”
“”मालिक हरे भरे पेड़ों की हाय, आदिवासियों के तो घर ही उजड़ रहे हैं।”
“”चुप रहो ।” गुप्ता और जोर से चिल्लाये थे।
फिर चैतीराम की हिम्मत नहीं पड़ी थी वह बेबस निगाहों से हरी-भरी धरती को उजड़ते हुए देखता रहा। देखता रहा जिस हरी भरी धरती पर पाँव धरने की जगह नहीं मिलती थी वहाँ अब खाली जमीन नजर आती थी।
चैती का बचपन जिस जंगल के भीतर खेलते घूमते अपने पिता के साथ जड़ी-बूटियों को ढूँढ़ते-बीनते बीता था, वही जंगल अब उसके लिए अजनबी बन गया था वहाँ वनैले जानवरों से ज्यादा खतरनाक मनुष्यों ने अपना साƒााज्य स्थापित कर लिया था। चैती कई दिनों से देख रहा था उस मादा कठफोड़वा को जो अपने अण्डे देने के लिए भटक रही थी, कोटर बनाने के लिए उसे वृक्ष की तलाश थी। हरे भरे सघन जंगल में लंबे-लंबे सुंदर सुघड़ वृक्ष कम और ठूँठ ज्यादा दिखने लगे थे। किसी भावी संकट के लिए अपशकुन मानकर चैतीराम अनजाने ही खौफ से भर उठा था। वक्त बेवक्त जंगली जानवरं बच्चों, बकरियों को खींचकर ले जाते। वे सब अपनी व्यथा कहते तो किससे। अचानक ही एक खबर जंगल में आग की तरह फैल गयी थी कि गुप्ता को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया है।
“”मालिक! चैतीराम की आँखों में सचमुच दु:ख के आँसू थे जैसे उसकी आँखें कह रहीं हों कि वे वृक्ष तो आपको शाप देंगे ही जो हमारे पितृपुरूष थे, रक्षक थे, जीवनदाता थे। जिन्हें हम भी अपनी औलादों की तरह प्रेम करते थे। वन और वनदेवताओं को रुष्ट करने वाले आज तक उनके प्रकोप से नहीं बचे थे।
“”चैतीराम, चाहो तो तुम भी हमारे साथ चल सकते हो। वहीं बंगले पर रहना। बच्चों को पढ़ाना-लिखाना और अपनी मालकिन की सेवा करना।” गुप्ता का व्यवहार एकाएक बदल गया था। पर चैतीराम का मन उस समय गुप्ता के साथ जाने को हरगिज तैयार न था। अव्यक्त घृणा उसके मन में भर गई थी। जब मालिक का खुद का भरोसा नहीं तो वह कहाँ जायेगा और क्यों जाये उनके साथ। स्थानीय लोगों, परिन्दों और जानवरों को बेघर करने वाले मालिक को आखिर उनकी हाय ले डूबी।