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कलायन पत्रिका

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कहानी – इला प्रसाद

मिसेज सिन्हा परेशान हैं!

उन्होंने बार-बार प्रिन्सिपल से कहा था, उन्हें इन्विजिलेशन डूटी से मुक्त रखा जाए। बीते वर्षों में इन्हीं डूटीज के दौरान घटित अप्रिय प्रसंगों का ब्यौरा दिया था, लेकिन प्रिंसिपल भी पूरी घाघ थीं। सब कुछ उन्हीं के सामने,उन्हीं के कार्यकाल में तो घटित होता रहा था, इसीलिए अनजान होने का प्र‚न ही नहीं था और न ही उन्होंने अनजान बनने की कोई कोशिश की थी। उनका तर्क बस इतना था कि लिस्ट बन चुकी है और अब उसे बदलना संभव नहीं होगा।
सो मिसेज सिन्हा को डूटी करनी है।

पूर शहर में, जो कस्बा ज्यादा है शहर कम, कुल जमा दो ही कॉलेज हैं। एक लड़कियों का, दूसरा लड़कों का। परीक्षा के दौरान, लड़कियों के कॉलेज में लड़कों का परीक्षा केंद्र होना एक अनिवार्य स्थिति है और कॉलेज की प्राध्यापिकाओं के लिए उन्हें झेलना मजबूरी। अब यह आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप उन्हें किस तरह लेते हैं। युनिवर्सिटी हर साल कदाचार मुक्त परीक्षा का आश्वासन देती है और छात्र डंके की चोट पर नकल करते हैं। मिसेज सिन्हा जैसी उल्टी बुद्धि तो हर किसी की होती नहीं कि वह लड़कों से उलझ कर, उनकी कॉपियाँ छीनकर उन्हें परीक्षा भवन से बाहर निकलवाए और अपने लिए मुसीबत मोल ले।

कॉलेज की अन्य व्याख्याताओं की मिसेज सिन्हा के बारे में अलग-अलग राय है, लेकिन हर किसी के पास कहने को कुछ न कुछ है जरूर। मसलन, मिसेज सिन्हा काफी अपरिपक्व हैं और साल दर साल लड़कों से उलझकर अपने लिए कुआँ खोद रही हैं। एक दिन पीछे पड़ जाएँगे लड़के तो होश ठिकाने आ जाएँगे। बहुत स्मार्ट समझती हैं खुद को। ये मिस्टर सिन्हा भी कैसे हैं, समझाना चाहिए। … अथवा, अपनी इमेज बनाना चाहती हैं -ईमानदार, अनुशासनप्रिय, योग्य व्याख्याता की ( एक दबी हँसी भी मिली होती है इस वक्तव्य के साथ) । न न भली हैं बेचारी, नासमझ हैं। वगैरह, वगैरह। खुलेआम उनके मुँह पर ये प्रतिक्रियाएँ लेकर कोई सामने नहीं आता, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह सब मिसेज सिन्हा के कानों तक न पहुँचता हो। लेकिन मिसेज मंजुल सिन्हा को इस सब की कोई परवाह नहीं।

अपनी छात्राओं, पति, बच्चे और घर के बीच वे संतुष्ट हैं। विषय-ज्ञान अच्छा है और छात्राएँ उनकी इज्जत करती हैं। विभाग की एकमात्र व्याख्याता वे हेड से लेकर डिमांस्ट्रेटर तक के दायित्व निभाती रही हैं वर्षों तक। अब जाकर, युनिवर्सिटी को कई आवेदन भेजने के बाद उनके विभाग में दो और व्याख्याताओं की नियुक्ति हुई है और उनका कार्य भार कुछ हलका हुआ है। लेकिन अब बच्चे दिशानिर्देश की हदों से बाहर हैं, जिन्दगी व्यव्स्थित है और मिसेज मंजुल सिन्हा, अपने पति के साथ शांत जीवन जी रही हैं, अपने उसी ठसके के साथ जो तब भी बना रहा जब वे कॉलेज, घर और बच्चों के बीच पिसती रही थीं।

परीक्षा भवन में मात्र तीन प्रोफेसरों की डूटी थी। इस बार भी वही कमरा नम्बर सत्रह था। वही लड़कों का जमावड़ा था और वही परिचित गहमागहमी थी। साथ के दो अन्य इन्विजिलेटर पुरुष थे। पुरुष सहयोगियों को पाकर मिसेज सिन्हा कुछ आश्वस्त हुईं। वे सिर्फ इन्हें जानती ही नहीं थी वरन् कई अवसरों पर कॉलोनी के अन्दर भी इनसे मुलाकात होती रही थी। पति की मित्रता हो चुकी थी इनसे और मिसेज सिन्हा इन्हें पति के मित्रों के रूप में अधिक, और अपने कॉलेज के प्रोफेसरों के रूप में कम जानती थीं। कमरे में पानी वगैरह पिलाने के लिए दो चपरासी थे। छात्रों की संख्या कुछ साठ के आसपास।
टन्न,टन्न करके घड़ी ने नौ बजाए।

परीक्षाएँ शुरू हो चुकी थीं। कमरे में नि:स्तब्धता छाई हुई थी। लड़के प्र‚नपत्रों पर झुके। हाथ में पेन और कॉपियाँ डेस्क पर। मिसेज सिन्हा और दोनों सहयोगी कमरे में चहलकदमी कर रहे थे।
एक लड़का खडा हुआ, “पानी चाहिए।”
चपरासी ने गिलास लाकर थमा दिया। हल्की सी सरसराहट हुई।
मिसेज सिन्हा घूमीं। पिछली सीट पर बैठा लड़का जूते के तल्ले से कुछ दबा रहा था।

“क्या कर रहे हैं आप?”
“कुछ नहीं मैडम” लड़का हड़बड़ाया।
“खड़े हो जाइए।” मिसेज सिन्हा ने आदेश दिया।
और जैसा कि अनुमान था, जूते के अन्दर नोट्स की पुर्जियाँ थीं।
मिसेज सिन्हा ने लड़के की कॉपी छीन ली और परीक्षा भवन से बाहर जाने का संकेत किया। लड़के को लगा यह तो ज्यादती है। उसके नोट्स ले लिए गए। अब उसे परीक्षा देने दी जाए। अब आगे तो वह नकल कर नहीं सकता। प्र‚नपत्र अच्छा है। क्या पता इस बार बेड़ा पार हो जाए। पिछले तीन सालों से वह लगातार परीक्षा में बैठ रहा है और दुर्भाग्य की कृपा ऐसी कि हर बार मिसेज सिन्हा की डूटी वाला कमरा ही उसे मिलता है। यह आखिरी बार। इससे आगे तो युनिवर्सिटी भी चांस नहीं देगी। परीक्षा भवन में बैठने भर की अनुमति बनी रहे फिर अगल बगल की बेंचों पर बैठे उसके दोनों मित्र उसकी सहायता करेंगे ही। बेड़ा गर्क हो मैडम का!

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