“मैडम प्लीज।” लड़का गिड़गिड़ाया।
मिसेज सिन्हा की मुखमुद्रा यथावत्। बल्कि अब तो वे उसके मित्रों की खबर ले रही थीं। उनकी कॉपियाँ भी छीनी जा चुकी थीं। छुपाए गए पुर्जे कॉपियों के साथ लगाकर उन पर अपनी प्रतिक्रिया लिखित रूप में देने में व्यस्त थीं वे।
तीनों ने एक दूसरे को देखा।
“यह आपने अच्छा नहीं किया मैडम। “एक ने धमकाने के अंदाज में चुप्पी तोड़ी। “मैंने क्या किया यह मैं जानती हूँ। आप अपना सामान समेटिए और बाहर जाइए। दूसरों का वक्त खराब मत कीजिए।” मिसेज सिन्हा शांत थीं।
“मैंने क्या किया यह मैं जानती हूँ। आप अपना सामान समेटिए और बाहर जाइए। दूसरों का वक्त खराब मत कीजिए।” मिसेज सिन्हा शांत थीं।
लड़के बौखलाए। “आप समझती क्या हैं अपने आपको? हर बार हमें निकाल देती हैं। आपकी वजह से हम पिछले तीन सालों से इस परीक्षा में बैठ रहे हैं। छोड़ेंगे नहीं हम भी आपको।”
शोरशराबा सुनकर दोनों सहयोगी प्रोफेसर आगे बढ़ आए।
मिसेज सिन्हा हँसीं। “आपको शर्म आनी चाहिए। आप हर बार पकड़े जाते हैं और तब भी आप हर बार नकल करने की कोशिश करते हैं। ईमानदारी से पढ़ाई कीजिए और फिर परीक्षा दीजिए। मुझे आपसे कोई दुश्मनी तो है नहीं कि मैं आपको निकालूँगी।”
“दुश्मनी हम करेंगे मैडम। हम आपको छोड़ेंगे नहीं। हमारा करियर खत्म करेंगी आप और हम आपको छोड़ देंगे। क्या समझती हैं आप?”
सदा की शांत मिसेज सिन्हा अब उत्तेजित हो उठीं। “क्या कर लेंगे आप? ये धमकियाँ किसी और को दीजिए। नकल करते हुए शर्म नहीं आती, ऊपर से जुबान लड़ाते हैं। दफा हो जाइए यहाँ से।”
“बिल्कुल। मुलाकात तो अब आपके घर पर होगी। आपकी इज्जत बहुत है न! हम उतारेंगे आपकी इज्जत। कल के अखबारों में आपकी खबर होगी।”
लड़के चले गए …
पूरे कमरे को जैसे सन्नाटा मार गया। बात इस हद तक पहुँचेगी, इसका अंदाजा किसी को भी नहीं था। बाकी लड़के वापस उत्तरपुस्तिकाओं पर झुक आए, परंतु तमाम कोशिशों के बावजूद मिसेज सिन्हा की मुखमुद्रा दयनीय हो उठी।
“आप वापस चली जाइए।” प्रो. शर्मा ने सुझाया था।
“हाँ, एक लिखित पत्र प्रिंन्सिपल को दीजिए और घर जाइए।” प्रो. सेन की भी यही राय थी।
मिसेज सिन्हा भी तब तक निर्णय ले चुकी थीं। वे चुपचाप कमरे से बाहर हो गईं। प्रिन्सिपल दो दिनों के लिए शहर से बाहर थीं। उनकी जगह कार्यरत प्राध्यापिका को सारी स्थिति समझाई। सारी घटना बयान करते हुए उन्होंने छुट्टी का आवेदन किया और घर वापस आ गईं।
तब से करीब एक घंटा बीत चुका है।
पतिदेव कई बार कमरे में टहल कर जा चुके हैं। मिसेज सिन्हा अभी भी गुमसुम बैठी हैं, गोया शब्द तलाश रही हों।
मिस्टर सिन्हा उनकी इस चुप्पी से परेशान हैं।
कुछ अघटनीय घटित हो चुका है, यह समझना मुश्किल नहीं है। उनकी आज छुट्टी है इसीलिए वे इन्तजार कर सकते हैं, लेकिन तब भी आखिर कब तक यह यूँ ही बैठी रहेगी। उन्हें पता है, परीक्षाएँ चल रही हैं। वे खुद ही पत्नी को कॉलेज छोड़कर आए थे। हर बार देवी जी एक दो लड़कों की छुट्टी करती ही हैं और घर आकर कहानी सुनाती ही हैं। आज आखिर ऐसा क्या हो गया कि इनकी जुबान पर ताला पड़ गया !
“अब कुछ बोलोगी भी ?” मिस्टर सिन्हा का धीरज हद पार कर चुका था। मिसेज सिन्हा का रुका हुआ बाँध जैसे फूट पड़ा। इतना अपमान उन्होंने जीवन में कभी नहीं झेला था। बीस वर्षों की इस नौकरी के दौरान उन्हें छात्राओं का स्नेह और आदर ही मिला था। कभी किसी ने उन्हें इस तरह अपमानित नहीं किया था। वे चुपचाप रोती रहीं।
फिर टूटे-फूटे शब्दों में रुक-रुक कर सारी घटना बयान हो गई।
मिस्टर सिन्हा एक क्षण को स्तब्ध रह गए। तीनों लड़कों का हुलिया अपरिचित नहीं था, उनके लिए। शातिर बदमाश थे वे। तो पिछले तीन सालों से बीवी तुम इनसे लोहा ले रही हो! हर बार वे इस तरह की कहानियाँ सुनते। कभी तह तक पैठने की कोशिश नहीं की। चलता ही रहता है यह सब तो! अब पानी सर से गुजर रहा है तो होश ठिकाने आए हैं। लेकिन करें क्या?
“तुम इतना घबरा क्यों रही हो? तुम्हें लगता है लड़के सचमुच घर तक आ जायेंगे।” प्रकटत: वे बोले।
&”नहीं आयेंगे? ” डूबती सी आवाज में मिसेज सिन्हा ने बहुत सारा धैर्य भरा कि जैसे मिस्टर सिन्हा “नहीं”” कह दें और वे उबर जाएँ।
“बिल्कुल नहीं। वे बस तुम्हें धमका रहे थे।”
मिसेज सिन्हा ने चाहा कि पति की बात पर यकीन कर लें, पर संभव नहीं हुआ। लड़कों की वह कुपित मुखमुद्रा, देख लेने का अन्दाज, उनकी आँखों के आगे फिर घूम गया। दिल डूब गया।
“नहीं, हमें पुलिस में रिपोर्ट लिखवा देनी चाहिए।”
“तमाशा बनवाना है? और पुलिस पूजा करवायेगी सो अलग।”