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एक और…
एक और… – 2

एक और… – 2

कलायन पत्रिका

एक और…


कहानी – पाराशर गौड़

विधायक चट्टान सिंह इस इलाके से युवा नेता के रूप में उभर रहा था। यूँ तो उसे राजनीति में आये अभी कुछ ही समय हुआ था लेकिन अपनी मेहनत व सूझबूझ से वो आज विधान सभा का नेता भी बन गया था। लोगों में उसकी छवि इतनी साफ सुथरी थी कि अगर आज चुनाव हो जाएँ तो उसे मुख्यमंत्री बनने से कोई नहीं रोक सकता था।

सर्किट हाउस में उसे उसका साला पंचम व पटवारी रविदत्त आते दिखाई दिए। उसने उन्हें इशारे से कमरे में अंदर जाने को कहा। लोगों से मिल-मिलाने के बाद जैसे ही चट्टान सिंह अंदर पहुँचा रविदत्त ने उसके पाँव पकड़ कर गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया, ‘सिंह साब हमें बचा लीजिए। एक आप ही हैं जो हमें बचा सकते हैं।”

वो कुछ समझ पाता कि तभी सरजू जो सिंह साब का दाहिना हाथ जाना जाता है, टेलीफेान लिए कमरे में आया और फोन को पकड़ाते हुए बोला, ‘ जी भाभी जी का है फोन है।’

” हांॅ बोल।’ चट्टान सिंह फोन में बात करने लगा।
फोन में बातें गौर से सुनता जा रहा था और बीच बीच उन दोनों को घूरता भी जा रहा था।
फोन को सरजू को पकड़ाते हुए उसने कहा इस पटवारी ने मेरे लिए बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है। और अब साथ में मेरे साले को भी लपेट लिया हैे। आग बबूला हो कर पटवारी का गिरेबान पकड़ते हु?ए कहा, ‘भवानी का बच्चा कहाँ है।’

‘जी मालुम नहीं।’
“अगर वह मथुरा दास के पास चला गया होगा तो मेरा तो खेल खत्म। मेंरी पॉलिटिकल लाइफ खत्म समझो।’
सरजू बोला ‘भाईजी आप कहो तो इस पटवारी के नाम एफ आई आर…’
‘अभी नहीं ‘ पहले इसे अंदर ले जा और पूछ इससे कि क्या-क्या हुआ। सरजू रविदत्त को घसीटते हुए अंदर ले गया।

मथुरा दास जिसे लोग नेता जी कहा करते हैं इस क्षेत्र के एम पी थे और खेले खिलाये खिलाड़ी थे। हर विधायक सांसद की कमजोरियों पर हमेंशा आँख गड़ाये रहते थे। मजाल है कि मौका हाथ से निकल जाए। चट्टान सिंह पर तो उनकी खास नजर ही थी कि कब वह या उसका कोई आदमी जरा सी गलती करे और वे उसे भुना कर अपना अपना स्वार्थ सिंद्ध करें।

नेता जी आँगन में कुर्सी में बैठे बैठे सुबह सुबह कि चाय की चुसकी लेने में व्यस्त थे, विधायक प्यारे लाल आता दिखाई दिया।

‘ तुम सुबह सुबह सब ठीक तो है।’

‘हांॅ, सब आपकी दुआ है। आपके लिए खुशखबरी है। बात कुछ ऐसी है कि रात को निकलना पड़ा।

“कैसी खुशखबरी लाये हो?”

‘चुनाव सिर पर हैं। आप को जिस मुद्दे की तलाश थी वो मिल गया है। वही चट्टान सिंह…”

बीच में बात काटते हुए नेता जी ने कहा ‘मैं समझा नहीं। जरा खुल कर कहो।’ जनेऊ को दोनों हाथों से पकड़़ कर उससे पीठ को खुजलाते हुए उन्हांेने कहा।

‘मटियाली में पटवारी रविदत्त, ब्लाक का अफसर और विधायक चट्टान सिंह का साला पंचम, तीनों ने एक गौरा नाम की औरत का पहले तो बलात्कार किया फिर उसे मार कर पेड़ पर लटका दिया। लाश पुलिस पौड़ी ले के गई है।”

सर पर हाथ फेर कर नेता बोले ‘ हऽम, प्यारे समझले कि तू विधान सभा का नेता बना ही बना। तुझे अब नेता बनने से कोई रोक नहीं सकता।

जिस के सिर पर आपका हाथ हो नेताजी तो उसे फिर किस बात की चिंता।”

….. उधर जैसे ही गौरा की लाश पौड़ी पहुँची, अस्पताल के आगे लोगों की भीड़ जमा होने लगी। सब इस निर्मम हत्या के बारे में चर्चा कर रहे थे। न्यूज मीडिया के लोग भी वहाँ पहुँच चुके थे।

जब पोस्टमार्टम के बाद गौरा की लाश को बाहर आँगन में लाया गया तो उसे देख कर भीड़ बेकाबू होने लगी थी। मीडिया के लोग भीड़ को चीर कर लाश के पास जाकर तरह-तरह के एंगलों से फोटो खींचने लग गए।

कोई लूथी से कह रहा था ‘ दोनों हाथों को सिर पे रख कर… थोड़ा इमोशन चाहिए।’

लूथी का पथराया चेहरा क्या इमोशन लाता। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है। वह पथराई आँखों से कभी जनता को देखता जैसे मानो वो भीड़ से इस दर्द से छुटकारा पाने की भीख माँग रहा हो।

इतने में वहाँ उमेश अपने साथियों के साथ आ पहुँचा। फोटोग्राफरो को हटाते हुए लूथी के पास जाकर उसने कहा, “आप लोगांे को अपने अखबार के लिए मसाला मिल गया है न। क्या कभी आपने सोचा कि इस पर क्या बीत रही है। कहाँ है आपके वे पत्रकार जो कहते हैं कि हम जनता को न्याय दिलाने में का दावा करते हैं।”

‘हांॅ हॉं कहॉं है वे।” तभी भीड़ से आवाज आई। “हत्यारे मुर्दाबाद। पुलिस म्ुर्दाबाद।” जनता का स्वर ऊँचा होने लगा। पुलिस मुर्दाबाद के नारों से पौड़ी जैसे हिलने सी लगी। बेकाबू भीड़ को देखते हुए एस पी ने पुलिस के 5 – 6 ट्रक तुरंत तैनात करवा दिए। पुलिस को आते देख जनता भड़क गई और पुलिस पर पथराव करने लगी। इस प्रकरण में कई लोग जख्मी हो गए। तभी पुलिस वाले एक ट्रक में गौरा की लाश को उठा कर ले गए। बेचारा लूथी हताश खड़ा देखता रह गया।

उधर पुलिस ने लूथी की मौजूदगी के बिना गौरा की लाश को आनन-फानन जला दिया। उमेश व उसके साथी लूथी को लेकर थाने गए। सामने वही थानेदार मिला जो गौरा की लाश को पौड़ी लाया था और जिसने लूथी को न्याय दिलाने का वादा किया था।

‘दिला दिया ना आपने इस गरीब को न्याय।” उमेश ने थानेदार से कहा। “कम से कम इसको तो साथ ले जाते ताकि ये अपने हाथों से उसका अंतिम संस्कार कर देता।”

‘उमेश बाबू , मैं… मैं ‘ थानेदार नेे कुछ कहना चाहा।

‘क्या मैं-मैं लगा रखी है।” गुस्से सेे आग बबूला होते हुए उमेश ने कहा। “आपने तो अपना काम कर दिया। अब तुम हमारा काम देखो। तुम तो

गए इंस्पेक्टर और तुम्हारा वो एस पी है ना, उसको कह देना अपना बोरिया-बिस्तर तैयार रखे।”
उमेश के जाते ही थानेदार ने एस पी को फोन में सारी बात बतार्इं और अपनी वर्दी व बाल-बच्चों की फिक्र मेंे फोन में ही गिड़गिड़ाने लगा।

अखबार में हादसे का वर्णन तथा विधायक चट्टान सिंह और उसके साले पंचम का नाम बडे़-बड़े हरफों में छपा। सारी अंगुलियाँ चट्टान सिंह की ओर उठ रही थीं।

उधर चट्टान सिंह ने जब अखबार पढ़ा तो उसके पाँव के नीचे से जमीन खिसक गई। इस घटना को लेकर पहाड़ की राजनीति गरमा गई थी। नेता लोग इसे अपनी-अपनी तरह से भुनाने लगे थे। ऐसे में मथुरादास फिर भला कहॉं चुप बैठने वाले थे। मोटरों का काफिला ले कर वे सीधे लूथी के घर जा पहुँचे।

लूथी को पास सटाते हुए और अपनापन जताते हुए कहने लगे, ‘देख भुला, इस दुख में तू अकेला नहीं है। हम भी तेरे साथ हैं। तेरे साथ जो अन्याय हुआ है उसका मुझे बड़ा दुख है। कातिल चाहे कोई हो, कितनी ही पहँुच वाला हो, हम सजा दिला के रहेंगे। हम और हमारी सरकार तुझे पूरा न्याय दिलवायेगी, ये हमारा वादा रहा।”

“कौन दिलायेगा किस को न्याय!’ उमेश ने नेता जी पर वार किया।
“नेता जी ये उमेश जी हैं। गढ़वाल विश्वविद्यालय के…”
‘अच्छा-अच्छा।’ खुद ही उसके पास जाकर हाथ मिलाते हुए कहने लगे, “‘परसों पहाड़ बंद आपने ही करवाया था। हमें बहुत अच्छा लगा कि कोई तो है जो इस गरीब की आवाज उठाये हुए है।”

बीच में नेता जी को खुश करने धनसिह बोला, “हॉं नेताजी नारा तो इनका था लेकिन कार्यकर्ता हमारे थे।

‘ठीक है, ठीक है।” धनसिंह को घूर कर फिर उमेश से कहा, “हमें आपके बारे में जानकारी मिलती रहती थी, लेकिन मुलाकात आज हुई। अच्छा लगा आप से मिलकर। अब देखिए ना हम सारे काम छोड़ कर चले आये यहांॅ…”

‘राजनीति करने।’ उमेश ने कहा, “देखिए नेता जी, एक बात ध्यान से सुन लीजिए और अपने इन चाटुकारों से भी कह दीजिए कि वे गौरा की मौत को लेकर कोई राजनैतिक खेल न खेलें और न ही उस पर अपनी रोटियाँ सेकें वर्ना ये खेल आपको ले डूबेगा।”

नेता जी को आभास होने लगा था कि अगर उमेश के आक्रोश को न दबाया गया तो उनका स्वयं का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। नेता जी ने उमेश के कंधे पर अपना हाथ रखते हुए कहा, “तुम इतनी दूर की क्यों सोच रहे हो। हम यहाँ राजनीति करने नहीं आये हैं। हम तो दर्द बाँटने आये हैं।”

‘हम सब समझते हैं। हमें सब पता है कि पौड़ी में क्या हुआ। पुलिस के उस एस पी और थानेदार ने लूथी के साथ क्या बर्ताव किया। मैं तो कहता हूंॅ उसके लिए उन पर कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए।”

“ऐसा है आप सर्किट हाउस में आ जाओ। वहॉं बैठ कर बात करते हैं कि आगे क्या करना है।” फिर लूथी के पास जा कर कहने लग, “जब तक उमेश जैसा होनहार युवा नेता साथ है तुम्हें चिंता करने की कोई बात नहीं हं।ै वो तुम्हें न्याय दिला कर रहेगा। और फिर हम भी तो हैं।”

सर्किट हाउस में नेताजी धन सिंह से कह रहे थे। “देखो धन सिंह अगर उमेश को यहीं पर नहीं रोका गया तो वो तुम्हारे लिए खतरा बन सकता है। देखा नहीं जो काम तुम पूरे चार साल में नहीं कर सके उसने एक ही आवाज में कर दिया। पूरे पहाड़ को बंद करवा दिया।”

तभी किसीने दरवाजे के पास आकर कहा, ‘नेता जी आपसे मिलने कोई आया हुआ है।’
नेता जी समझे शायद उमेश आया होगा। जब वह व्यक्ति सामने आया तो उमेश नहीं बल्कि की कोई और ही था। उसे देखते हुए नेता जी बोले, “कौन हो तुम।’
पॉंव को पकड़ते भवानी बोला, “मैं भैरौखाल ब्लाक का बी डी ओ भवानी सिंह। नेता जी मुझे बचा लो। मैं आपके पॉंव पड़ता हॅूं। आपके आगे हाथ जोड़ता हूंॅ मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे हैं, वे बेसहारा हो जाएँगे। मेरा धर उजड़ जाएगा। नेताजी मुझे बचा लो।” वह उनकी टाँगो से चिपक कर रोने लगा।

‘अच्छा तो आप हैं उन तीन मूर्तियों में से एक।” धनसिंह ने उसका कालर पकड़ कर उसे अपनी ओर खींचते हुए कहा। ‘जब तुम किसी का घर उजाड़ रहे थे तब नहीं आई अपने घर की याद।”

इतने में उमेश ने दरवाजा खटखटाया। उमेश को देखते हुए नेता जी ने कहा, “आइए, आइए। बैठिए। कहिय आप गौरा के केश में क्या चाहते हैं हम से।”

उमेश ने कुर्सी में बैठते हुए कहा “मेंैं चाहता हूंॅ कि पहले उन तीनो को फांसी की सजा हो। नहीं तो कम से कम उƒा कैद तो हो ही। और…”

‘और क्या?’ नेता जी ने जानना चाहा।

‘ और उस एस पी और थानेदार का सस्पेनशन।’

“देखिए जेल फाँसी की बात तो कोर्ट तय करेगी। रहा सवाल उन दोनांे का तो वो हम अभी किए देते हैं। धन सिंह, मुख्यमंत्री को फोन लगाना।”

मुख्यमंत्री भाष्करानन्द ज्यों ही फोन पर आये तो नेता जी ने कहा, नमस्कार भाष्करानन्दजी। मैं मथुरा दास।”

“नमस्कार। कहिए मथुरा दास जी स्वास्थ्य कैसा है?”

‘सब आप की कृपा है।”

“पौड़ी की स्थिति कैसी है। सुना है जनता बड़ी खफा है।”

“उसी के लिए फोन कर रहा हूंॅ। देखिए जब तक वहाँ के एस पी और थानेदार को सस्पेंड नहीं किया जाता तब तक वहाँ की हालत पर काबू पाना हमारे बस की बात नहीं। अभी तो चिनगारी है कहीं आग न बन जाय।”

“मथुरादासजी मैं आपका मतलब समझ गया हूँ। मैं अभी आई जी से बात करता हँू। उनके सस्पेंशन का ऑर्डर फोन पर ही दे देता हँू। बाकी आप सँभाल लीजिएगा।”

‘उसकी फिक्र आप न करें। वो आप मुझ पर छोड़ दें।”

फोन रख कर नेता जी ने पलटते हुए उमेश कहा, “लो भाई काम तो आपका हो गया।

उमेश ने तपाक से कहा, ‘और दूसरा?’

‘वो भी हो जाएगा। लेकिन उससे पहले आप को हमारा एक काम करना होगा। चट्टान सिंह की पिछले साल की तेल के घोटाले की एक फाइल जो आपके पास है, जिसकी वजह से वह बच गया था, वो हमें चाहिए।”

“वह तो…”
“उमेश जी इसके बदले हम आपको उस क्षेत्र से एम एल ए का टिकट भी दिलवा देंगे।”

“ठीक है लेकिन हमारा दूसरा काम?” उमेश ने कहा।

“बिसात बिछ गई है सिर्फ गोटियों की तलाश है। उस बिसात की एक गोटी तो हमारे पास यहीं मौजूद है।”

“क्या मतलब?” उमेश ने जानना चाहा
भवानी की ओर इशारा करके नेता जी ने कहा, ” भैरोखाल का बी डी ओे भवानी दत्त।”

जैसे ही उमेश ने भवानी का नाम सुना उसके तन बदन में आग भड़क उठी वह गुस्से में आग बबूला हो कर उसकी ओर लपका।

नेताजी ने उमेश को समझाते हुए कहा, ‘इसे मारना ठीक नहीं। यह तो हमारे और आपके लिए बड़े काम की चीज है। यह उस केश का चश्मदीद गवाह है गवाह, क्या समझे! यह तो अब सरकारी गवाह बन कर ही बच पायेगा। क्यों भवानी?’

भवानी के आगे ‘जी ‘ कहने के सिवा कोई रास्ता न था।

मथुरा दास ने मुख्यमंत्री से लेकर हाई कमांड व पार्टी तक के चट्टानसिंह के सारे रास्ते बंद कर दिए। उसे विधान सभा के नेता पद से भी हटा दिया गया। उसे अपना राजनैतिक जीवन चौपट होता हुआ साफ दिखाई दे रहा था।

 

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