एक और… – 3

कलायन पत्रिका

एक और…


कहानी – पाराशर गौड़


शाम के 4 बजे थे। डाक्टर दुर्गा क्लिनिक बंद कर जाने को तैयार ही थी कि दरवाजे पर एक लड़का आता दिखाई दिया। लड़के ने कहा, “जी मुझे हिमांशु जोशी ने आपके पास भेजा है।'”
“हाँ-हाँ कहो मैं क्या कर सकती हूँ आपके लिए।”
“जी… जी… वो क्या है कि…” शर्म के मारे आँखें झुक गर्इं। गला सूखने लगा था भुवन का। “हम से गलती हो गईं।”
“अबार्शन करवाना चाहते हो?”

‘जी हाँ।ं’

‘दोनों अनमैरीड हो? ‘

‘जी… ‘

दुर्गा ने उसे ऊपर से नीचे तक देखकर कहा ‘लड़की कहांॅ है?’

‘बाहर है।’

‘उसे अंदर लाओ ‘ वह गया और तृप्ति को लेकर अदंर आ गया।

अब हिमांशु ने भेजा है तो कुछ तो करना ही पड़ेगा। अपने बचाव के लिए उसने अपनी मेज के नीचे लगे टेप रिकार्ड का स्विच चुपके आन कर दिया। चूँकि उसके साथ पहले भी एक ऐसा ही केस ह?ो चुका था जिसकी वजह से उसे कोर्ट तक जाना पड़ा था।

तृप्ति से दुर्गा ने पूछा ‘ क्या नाम है तुम्हारा?’

‘जी तृप्ति।’

“ये कुछ पेपर्स हैं तुम दोनों इनको भरो और दस्तख़त कर दो। फॉर्मेैलिटी तो पूरी करनी है ही ना।”

भुवन ने फार्म सब ठीक भरा। घर का पता, बाप का नाम, फोन नंबर। फार्म को देखते कर दुर्गा ने कहा, “”मुथरादास जी याने नेता जी के लड़के हो। पहले क्यों नहीं बताया। जाओ परसों दस बजे आ जाना।”

ये सारी बातें रिकॉर्ड हो चुकी थीं। उसने कैसेट निकाला ही था कि तभी चट्टान सिंह का फोन आ गया, “दुर्गा कैसी हो ‘

‘ठीक हूँ भैया तुम कैसे हो ‘

“हाल ठीक नहीं हैं।”

‘ हाँ वो तो मैं समझ सकती हूँ। अखबारों से आये दिन पता चल ही रहा है। ‘

“तुम्हें तो पता है ही कि पंचम किस केस में फँसा हुआ है। उसके उस जंजाल ने मुझे भी फँसा दिया है। अब जब तक अपने व उसके लिए कोई अच्छा सा वकील न कर लूँ तब तक उसे किसी हस्पताल में भर्ती कराना था।” चटानसिहं ने कहा।

“समझ गई। हो जाएगा।” भैया तुम्हारी आवाज को क्या हो गया है। लगता है तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है।”

“़बस यूँ समझ ले कि तेरे भैया की राजनैतिक हत्या होने वाली है इस

पंचम और गौरा के केस को लेकर। इसने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। अरी बहना, वो है न मथुरादास, उसने अपनी सारी गोटियाँ फिट करके मेरा सारा खेल खत्म कर दिया है।”

मथुरादास का नाम आते ही दुर्गा के कान खड़े हो गए। वो चट्टान से बोली, ‘ भैया तुम जल्दी से मेरे आफिस आओ। तुरंत।’

‘ अभी आया।’ कह कर उसने टेलीफोन रखा। सीधे दुर्गा के आफिस की ओर चल दिया। जैसे वहाँ पहुँचा दुर्गा ने उसे वो सारी चीजें दिखाईं, ऑडियो टेप जिसमें भुवन तृप्ति और दुर्गा के बीच हुई पूरी बातचीत रिकॉर्ड थी। क्लिनिक के दरवाजे पर लगे कैमरे ने भुवन और तृप्ति का चेहरा साफ पकड़ा था। चट्टान सिंह की बांछें खिल गई। आँखों में एकाएक चमक आ गई। उसने कृतज्ञता से दुर्गा की ओर देखा और कहा, “बहन तूने बचा लिया। अभी तो मैं चलता हूँ। बाद में बात करता हूँ।”

घर पहुँचते ही उसने नेता जी को फोन किया। “नेताजी नमस्कार” मैं चट्टान सिंह।’

“नमस्कार, नमस्कार। कहिए कैसे याद किया?”

“आप तो अंतर्यामी हैं। सब की खबर रखते हैं। सब की खबर लेते हैं। नेता जी आपने तो अपनी गोटियाँ बिछा लीं। एस पी और थानेदार को सस्पेंड करवा दिया। आपने तो हमारे लिए मुख्यमंत्री और पार्टी के दरवाजे भी बंद करवा दिए हैं। लूथी को न जाने क्या घुट्टी पिला दी होगी और उमेश को न जाने क्या प्रलोभन दिया होगा आपने अब तक। सुना है भवानी को सरकारी गवाह बना दिया है आपने। फिर भी पूछ रहे हैं कि कैसे याद किया।”

“अरे भाई हम कौन होते हैं किसी के रास्ते बंद करवाने वाले। ये तो सब कुंडली और उसमें बैठे ग्रहों का खेल होता है। जब ग्रहों की बुरी नजर पड़ती है तो तब आदमी कहीं का भी नहीं रहता।”

‘बिल्कुल सही फरमाया आपने नेता जी। कुंडली के ग्रह तो अब आपके उल्टे पड़ने वाले हैं। अपनी फैक्स मशीन पर आये फैक्स को पढ़िए जरा। अभी पता चल जाएगा कि किसके ग्रह खराब होने वाले हैं।

फैक्स पढ़ते ही नेता जी के पाँव तले जमीन खिसक गई। चट्टान सिंह ने दुर्गा का दिया हुआ क्लिनिक का अबॉर्शन वाला फार्म फैक्स किया था जिसमें भुवन और तृप्ति के हस्ताक्षर थे।

‘क्यों नेता जी कैसा रहा हमारा पासा! अब देखना कल के अखबार में यह खबर किस तरह मिर्च-मसाले के साथ छपती है। और हाँ, हमारे पास भुवन और तृप्ति की आवाज में वो टेप भी मौजूद है जिसमें उन्होंने स्वयं कबूला है कि बच्चा उन्हीं का है।”

नेता जी को काटो तो खून नहीं।

चट्टान सिंह ने कहा, ‘देखिए नेता जी यूँ तो मैं राजनीति में अभी नया-नया हूँ। अभी तो बहुत सारे दावपेंच सीखने हैं? आप से। फिर भी अगर आपकी ओर से कोई बात बनती दिखाई दे तो हमारे दरवाजे कल 10 बजे तक आप के लिए खुले हुए हैं। ठीक 11 बजे ये सब मटीरियल प्रेस के पास होगा। फिर आप जानें और आप का काम।”

‘अरे नहीें-नहीं, इतनी दूर जाने की जरूरत नहीं। मैं मिलता हूँ न आपसे कल ठीक 10 बजे।” इतना सुनना था कि चट्टान सिंह ने खट् से फोन काट दिया। नेताजी समस्या के हल को ढूंढने के लिए इधर से उधर और उधर से इधर घूमने लगे।

अगले दिन 10 बजने वाले ही थे कि चट्टान सिंह के घर पोर्च में गाड़ी रुकने की आवाज आई। जैसे ही घंटी बजी उसने दरवाजा खोला। सामने नेता जी खड़े थे। हाथ जोड़कर स्वागत करते हुए चट्टान सिंह ने कहा, “हमारे गरीबखाने में आप जैसे राजनैतिक महारथी का स्वागत।’

‘बाज़ नहीं आओगे कटाक्ष करने से। सब समझता हूँ तुम्हारा व्यंग्य।” बैठते हुये नेताजी ने कहा। ‘देखो चट्टान सिंह अगर तुम प्रेस में चले भी जाते हो तो क्या होगा। ज्यादा से ज्यादा थोड़ी बदनामी होगी। अरे राजनीति में हत्या, बलात्कार और घोटाले की घटनाएँ जितनी जल्दी उभरती आती हैं उतनी जल्दी भुला भी दी जाती हैं। यही तो खूबी है हमारी जनता में।’

भाव बदलते नेता जी ने कहा, “अब देखो तुम्हारे साले का केस अदालत तक गया तो जानते हो क्या होगा? इसमें तुम्हारे भी कच्चे चिट्ठे खुलेंगे। तेल का किस्सा उठेगा जो तुम्हें राजनैतिक जीवन को हाशिये पर ला कर खड़ा कर देगा। तेल की फाइल जो उमेश के पास है उसे मैं जब चाहूँ हासिल कर तुम्हें सबके सामने नंगा कर सकता हूँ। लेकिन मैं ऐसा नहीं करूँगा। राजनीति में मेरी पीठ तुम खुजलाओ और मैं तुम्हारी, तभी राज कर पाएंगे हम। बेहतर यह होगा कि हम दोनों मिलकर एक साथ होकर कुछ सोचें।’

‘तभी तो मैंने आपको यहाँ बुलवाया है।” चट्टान सिंह ने कहा।

‘सुनो, मैं मुख्यमंत्री से कह कर एस पी और थानेदार को बहाल करके गौरा का केस रफादफा करवा देता हूँ।’

“लूथी और उमेश?”

“उनकी चिंता तुम काहे करते हो! उनके लिए हम हैं न।” नेता ने कहा।

“और मेरी फाइल?”

“उसका भी जुगाड़ हो जाएगा। तुम मुझे सब मटीरियल दे दो और मैं तुम्हें फाइल।”

‘ठीक है। तो यह तय हुआ कि जो आप चाह रहे हैं वही हम भी चाह रहे हैं और जो हम चाह रहे है वहीे आप भी।”

दोनों ने हँसते हुए हाथ मिलाया। जैसे नेता जी बाहर जाने लगे चट्टान सिंह ने कहा, ‘ एक बात तो हम भूल ही गए। उस मधुली का क्या होगा जिसकी गवाही पर ये केस कहीं और कभी भी खुूल सकता है।’

‘उसका भी इलाज हो जाएगा। पहले जो सामने है उससे तो निपट

लें।’ कह कर नेताजी गाड़ी में बैठ कर चल दिए।

उधर चट्टान सिंह ने सारे डॉक्युमेंट नेता को थमाये और नेता ने तेल की फाइल। मुख्यमंत्री से कहकर एस पी व थानेदार को फिर से बहाल करा दिया गया। गौरा का केस आत्महत्या बताया गया और उसे ठंडे बस्ते में डालने का काम शुरू हो गया।

कुछ दिन बाद एक और लाश पौड़ी आई। वो थी मधुली की। उसने फाँस खाई थी ऐसा प्रचार किया जा रहा था। पास में नेता उसकी मौत पर भाषण दे रहा था़।

समाप्त
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