राकेश के मम्मी-पापा ने दौड़-धूप कर किसी प्रकार उसकी जमानत करवाई और उसे फिर से अपने कैरियर की ओर उन्मुख करने की चेष्टा की, पर सब बेकार। अदालतों के चक्कर काटते-काटते, कानूनी दाँव-पेचों से रोज उलझते एवं पड़ोसियों व रिश्तेदारों की उपेक्षा व व्यंग्य भरी निगाहों ने राकेश के अन्तर्मन में गहरी टीस भर दी। व्यवस्था की विसंगतियों एवं लम्बी कानूनी प्रक्रियाओं ने उसे तोड़ कर रख दिया। उसका पक्ष जानने की बजाय समाज ने उसे ही कटघरे में खड़ा कर दिया। अपने ही कमरे में कैद वह पन्नों पर कुछ लिखता और फिर उन्हें फाड़ कर फेंक देता यहाँ तक कि अपने मम्मी-पापा से भी ज्यादा बातें नहीं करता। मम्मी-पापा ने उसे शादी करने की सलाह दी तो उसे भी उसने ठुकरा दिया।
आखिरकार एक लंबे समय बाद वह दिन भी आया जबकि राकेश को अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया पर इतनी जलालत के बाद ये सब चीजें उसके लिए बेमानी हो गई थीं। जिस दिन अदालत ने राकेश को सारे आरोपों से मुक्त कर बाइज्जत बरी कर दिया, उस दिन उसके मम्मी-पापा काफी खुश हुए थे। बहुत दिन बाद उनके मायूस चेहरे पर खुशी के भाव दिखे। उस दिन राकेश ने भी रात्रि का भोजन उनके साथ किया। मम्मी-पापा को भी लगा कि अब राकेश एक नई जिन्दगी की शुरुआत कर सकेगा, पर शायद होनी को कुछ और ही मंजूर था।
सुबह जब राकेश काफी देर तक नहीं जगा तो किसी अनहोनी की आशंका से मम्मी-पापा ने उसके कमरे का दरवाजा खोला पर सामने का नजारा देखते ही चीख पड़े। सामने राकेश की लाश औंधी पड़ी हुई थी और बगल में जहर की एक खुली शीशी रखी हुई थी। उनकी चीख सुनकर सारे पड़ोसी इकट्ठा हो गए और किसी ने पुलिस कोभी इतला दे दी। पुलिस आकर लाश के पंचनामे में जुट गई। पुलिस को राकेश के तकिये के नीचे एक कागज मिला था, जिस पर उसने लिखा था-
अदालत ने तो मुझे दोषमुक्त साबित करके अपने कर्तव्य की इत्तिला कर दी, पर मेरे उन सुनहरे दिनों एवं मेरे परिवार वालों की मानसिक प्रताड़ना का क्या कोई अदालत न्याय कर पायेगी? व्यवस्था की सनक ने एक शरीफ छात्र को गुनाहगार घोषित कर दिया…. यहाँ तक मीडिया ने भी बिना कुछ जाने-समझे चटकारे लगा-लगाकर मेरे चरित्र पर तोहमत लगायी। अपने रिश्तेदारों एवम् पड़ोसियों की उपेक्षा व व्यंग्य भरी निगाहों को मैं कैसे भुला सकता हूँ? क्या इन जलालतों का कोई अदालत न्याय कर पायेगी? मैं अभी तक सिर्फ इसलिए जिन्दा था कि अपनी मम्मी-पापा को समाज में निगाहें ऊँची करके चलते देख सकूँ। मैं उनके ऊपर कोई पाप या गुनाह की गठरी छोड़कर नहीं मरना चाहता था।
मम्मी-पापा! हो सके तो मुझे माफ कर देना पर मैं ऐसी विसंगतिपूर्ण व्यवस्था में और नहीं जीना चाहता, जहाँ कि मेरा दम घुटता हो। मैंने अपनी जिन्दगी के लम्हे जी लिए और अब भारमुक्त होकर स्वेच्छा से मौत को गले लगा रहा हूँ… अलविदा।