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शरीफ बदमाश

शरीफ बदमाश

कलायन पत्रिका

शरीफ बदमाश


मकृष्ण कुमार यादव

 

 

‘खट..खट..खट.. दरवाजा खोलो, पुलिस।’

अचानक हॉस्टल के कमरा नंबर बत्तीस पर रात्रि में पुलिस ने छापा मार दिया था। मुखबिर द्वारा पुलिस को सूचना मिली थी कि उस कमरे में शहर के शातिर बदमाश का एक शागिर्द छुपा हुआ है। गहरी निंद्रा में लीन राकेश ने कमरे का दरवाजा खोला तो एक पुलिस वाले ने उसकी कनपटी पर रिवाल्वर सटा दी।

‘हिलना नहीं अपनी जगह से.. हैंड्स अप।’

तभी दरोगा जी की कड़कड़ाती आवाज सुनाई दी, ‘एक-एक चीज की तलाशी लो।’

‘पर सर! मैंने किया क्या है?’

‘वाह बच्चू! कितने भोले हो, अभी पता चलता है तुमने क्या किया है?’

‘लेकिन सर! मैं तो विश्वविद्यालय में पढ़ने वाला साधारण छात्र हूँ, कहें तो अपना परिचय-पत्र भी दिखा दूँ।’

दरोगा ने तमतमाती आवाज में कहा, ‘हम तुम्हारा भाषण सुनने के लिए यहाँ नहीं आये हैं और न ही विश्वविद्यालय का परिचय-पत्र इस बात का प्रमाण है कि तुम बहुत शरीफ हो। आजकल विश्वविद्यालय एवं कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र रातों-रात अमीर बनने के लिए बदमाशों की शागिर्दी में जाते हैं और फिर किसी हॉस्टल में दाखिला लेकर अपने को पढ़ाकू छात्र साबित करने की कोशिश करते हैं।’

‘सर! इसके कमरे से एक मोबाइल फोन, एक हीरो-होण्डा मोटरसाइकिल के कागजात एवं कुछ ग्रीटिंग्स कार्ड व पत्र मिले हैं, जो किसी लड़की ने इसे दिए हैं।’

उस सर्द सी जमा देने वाली ठण्ड में दरोगा ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ राकेश के गाल पर मारा, जिसकी गूँज रात्रि में हॉस्टल से बाहर तक सुनाई दी। राकेश की आँखों में आँसू आ गए थे। वह बार-बार अपनी बेगुनाही का हवाला दे रहा था कि तभी एक सिपाही की व्यंग्य भरी आवाज़ उसके कानों में पड़ी, ‘सर! ये तो कविताएँ भी लिखता है।’

फिर अपनी फूहड़ आवाज में जोर-जोर से राकेश द्वारा लिखी गई कविताओं में से एक का पाठ करने लगा। ‘च..च..च.. कितनी बढ़िया कविता लिख लेता है यह। चलो, अब रात को थाने में सन्नाटा तो नहीं पसरेगा, इस की कविताओं का रस लिया जाएगा… पर हाँ तू ये तो बता कि अपनी कविताओं में तुमने व्यवस्था की टाँग ही खींची है या कुछ अपनी उस ग्रीटिंग कार्ड वाली गर्ल – फ्रैण्ड के बारे में भी लिखा है कि यौवनावस्था में उभरते हुए उसके उन्नत उरोज, साँसों की धड़कनें, पुष्ट नितम्ब, पतली कमर, मचलकर चलना……

‘बिहैव योर सेल्फ!’ राकेश की तमतमाती आवाज गूँज उठी थी। ‘आप को किसी को इस तरह जलील करने का कोई अधिकार नहीं है? मैं कोई चोर-उचक्का, बदमाश या लड़कियों का दलाल नहीं हूँ कि आप मुझे इस तरह प्रताड़ित कर रहे हैं। मैं आपके सीनियर्स से आपकी शिकायत करूँगा। कोई भी कानून इस तरह किसी को परेशान करने की इजाजत नहीं देता।

दरोगा ने पलटकर फिर एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसे मारा और काबू से बाहर होते हुए बोला, ‘पुलिस वाले को धौंस देता है कानून की। चल थाने में तुझे हम वहाँ कानून भी पढ़ायेंगे और तेरी कविताओं का नशा भी उतार देंगे। इतनी धाराएँ लगाकर जेल में ठूँसूँगा कि मेरा नाम भी दरोगा…. नहीं।’

अगले दिन के अखबारों में प्रमुखता से यह खबर छपी कि अमुक गैंग का एक शातिर बदमाश पुलिस ने अपनी सक्रियता से धर दबोचा। अपने को विश्वविद्यालय का छात्र बताने वाला उक्त बदमाश काल-गर्ल्स रैकेट का शहर में सूत्रधार था और उसके कमरे से तमाम आपत्तिजनक वस्तुएँ बरामद हुईं हैं। यह भी पता चला है कि चंद पैसों के लालच में आरोपी बदमाश बड़े-बड़े होटलों एवं अमीर लोगों को जवान लड़कियाँ सप्लाई करता था और प्राप्त पैसे से गुलछरर्े उड़ाता था। सौदेबाजी में प्रयुक्त मोबाइल फोन एवं गर्ल्स हॉस्टल के आस-पास अक्सर देखी जाने वाली हीरो होण्डा मोटरसाइकिल भी पुलिस ने उस बदमाश के पास से प्राप्त की है।

राकेश एक मध्यवगीर्य संभ्रान्त परिवार से ताल्लुक रखने वाला एवं डॉक्टर-दम्पति का इकलौता बेटा था। बेटे को भी डॉक्टर बनाने की खातिर माता-पिता ने उसका दाखिला एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में करा दिया, जहाँ बी. एस. सी. द्वितीय वर्ष में अध्ययनरत होने के साथ ही उसने कोचिंग क्लासेज भी ज्वाइन कर ली थीं। आकर्षक व्यक्तित्व का धनी राकेश अपनी विनोद प्रियता, हाजिर जवाबी एवं मधुर वाणी के चलते कक्षा का केन्द्र-बिन्दु बन गया था। इकलौता बेटा होने के कारण माँ-बाप ने उसे मोटरसाइकिल एवं मोबाइल फोन जैसी सारी सुविधाएँ दे रखी थीं। खुले दिलो-दिमाग वाले राकेश से उसके क्लास की लड़कियाँ भी खुल कर हँसी- मजाक कर लेतीं और उसका शायराना एवं कवि अंदाज तो हर समारोह की जान बन गया था। पर ये सब बातें कक्षा के कुछ छात्रों को अखरने लगी थीं। वे राकेश की जगह अपने को देखना चाहते, पर सफलता हाथ नहीं लगी। राकेश का विनोदी स्वभाव, लड़कियों से खुल कर बातें करना एवं हर समारोह में आगे बढ़कर अपना योगदान देना उन छात्रों को अन्दर ही अन्दर कुढ़ने को मजबूर कर देता था और आखिरकार एक दिन हॉस्टल में बैठकर उन सभी ने राकेश का कैरियर बर्बाद करने की योजना बना डाली। इस काम में उनका साथ एक छात्र नेता ने दिया जो कि पुलिस हेतु मुखबिरी भी करता था। फिर क्या था रातों-रात पुलिस व कुछ छात्रों की मिलीभगत ने साजिश रचकर एक शरीफ छात्र को काल-गर्ल्स रैकेट का सूत्रधार घोषित कर दिया। यहाँ तक कि अखबारों ने भी चटकारे ले-लेकर उसके चरित्र पर कीचड़ उछाला।

 

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