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शीत लहर

शीत लहर

कलायन पत्रिका


शीत लहर
महा वीर शर्मा

दिल्ली में एक पुल के नीचे पटरियांे पर एक ओर 10 और दूसरी ओर 11 व्यक्ति जीवन-यातना भुगत रहे हैं। शयनागार रसोई कारोबारालय चौपाल – सभी कुछ इसी में समाये हुए हैं। ना दरवाजे हैं ना खिड़की हैं ताले का तो प्रश्न ही नहीं होता। इन में कुछ पुरुष और कुछ स्त्रियाँ हैं और एक स्त्री की गोद मंे एक बच्चा भी है।

इन लोगांे की जाति क्या है?

ब्रााहृण, वैश्य, क्षत्रीय, शूद्र या दलित वर्ग में तो यह लोग आ नहीं सकते। जाति-वर्गित लोगांे को तो लड़ाई झगड़ा करने का, ऊँच और नीच दिखाने का, आरक्षण का, फूट डलवा कर देश में दंगा फसाद करवाने का, और फिर अवैध युक्तियांे से अपने बैंक बैलेन्स को फुलाने का, अनेक सामाजिक असामाजिक वैध या अवैध अधिकार हैं। इन 21 व्यक्तियांे को तो ऐसा एक भी अधिकार नहीं है तो इनकी जाति कैसे हो सकती है।
तो फिर ये लोग कौन हैं?

इनके नाम हैं – भिखारी कोढ़ी लँगड़ा अंधा भूखा-नंगा अपंग भुखमरा कंगला। और गरीब होने के कारण इनके तीन नाम और भी हैं, क्यांेकि कहते हैं –

“गरीबी तेरे तीन नाम, लुच्चा गंुडा बेईमान।’

हाँ वह जो बीच में बैठी हुई जवान सी औरत है उसका नाम है “झबिया’। उसकी गोद में जो नन्हा सा बालक है उसे ये लोग “ललुआ’ कह कर पुकारते हैं। पिता का नाम ना ही पूछा जाए तो उचित होगा क्यांेकि कभी कभी कुछ विषम स्थिति में असली नाम बताना किसी गोपनीय मृत्यु-दण्ड जैसे अंजाम तक भी पहुँचा सकता है।

झबिया की क्या मजाल है कि कह सके कि उसकी गोद में इस हड्डियांे के ढाँचे पर पतली सी खाल का आवरण लिए हुए नन्हे से बच्चे का पिता नगर के प्रतिष्ठित नेता का जवान सुपुत्र है।

उस दिन अमावस्या की रात थी जब वह अपनी चमचमाती कार खड़ी करके बाहर निकला था तो झबिया ने केवल इतना ही कहा था,

शराब का हलका सा नशा, अंधी जवानी का जोश और नेतागीरी के आगे गिड़गिड़ाता हुआ कानून – बस उसने झबिया को घसीट कर कार मंे खींच लिया। झबिया ने तो केवल भूखे पेट भरने को दो रोटी के लिए कुछ पैसे माँगे थे ना कि यह माँगा था कि अपने उदर मंे उसका बच्चा लेकर उसको भी भूख से मरता देखती रहे।
शराब का हलका सा नशा, अंधी जवानी का जोश और नेतागीरी के आगे गिड़गिड़ाता हुआ कानून – बस उसने झबिया को घसीट कर कार मंे खींच लिया। झबिया ने तो केवल भूखे पेट भरने को दो रोटी के लिए कुछ पैसे माँगे थे ना कि यह माँगा था कि अपने उदर मंे उसका बच्चा लेकर उसको भी भूख से मरता देखती रहे।

गर्मियांे की चिलचिलाती हुई धूप, बरसात की तूफानी बौछारंे और कँपकँपा देने वाली सर्दियाँ इन पुलांे के नीचे रहने वाले बिन वोटांे के नागरिकांे के जीवन को अगले मौसम को सौंप कर चल देती हैं।

इस बार तो ठण्ड ने कई वर्षों का रिकार्ड तोड़ डाला। ये कँपकँपाते हुए अभागे बिजली के खंभों की रोशनी पर टकटकी लगाए हुए हैं। शायद इतनी दूर से बिजली के बल्ब से ही कुछ गर्मी उन तक पहुँच जाए।

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