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लेखिका – सुधा

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कलायन पत्रिका

लेखिका – सुधा


दादी माँ 

 

बात-बात में उन्हीं की चर्चा होने लगती थी। ऐसा होता ही है। जो गुजर जाता है, लोग उसके गुणों को ही याद करते हैं। और दादी तो सर्वप्रिय थी; किसी के विरुध्द जाने का उनका स्वभाव ही नहीं था।

उनके पिता सनातनी धार्मिक पुरुष थे। उनकी माँ पति की अनुगता सद्गृहणि थीं। इसलिए घर के वातावरण में नित्य की पूजा-संध्या के अतिरिक्त यज्ञ अनुष्ठानों की भी सुगंध भरी रहती थी। जन्म के शाकाहारी बाल-बच्चों में स्वाभाविक सात्विकता आ गयी थी। सहेलियों के बीच उनकी पहचान पुजारिन लड़की के रुप में थी। वे इस बात से कभी झेंपी नहीं। बल्कि उन्हेांने पूजा को बड़ी श्रध्दा से आत्मसात कर लिया था।

कहते हैं, उनके श्वसुर ने उन्हें बचपन में ही कभी वाल्मीकि रामायण की पंक्तियों का शुध्द उच्चारण करते सुन लिया था, तभी उन्हें अपनी पुत्रवधू बनाने की बात उनके मन में आ गयी थी। संयोगवश, जब घर के सबसे बड़े पुत्र सुयोग्य होकर बड़ी पद-प्रतिष्ठा के रास्ते अग्रसर हुये तो उनके मन की बात पूरी भी हो गयी। इस तरह वे एक धनाढय परिवार की बड़ी बहू बन कर आ गयी थीं।

इस परिवार के लोग भी बहुत अच्छे थे। उन्हें सास-ससुर, पति यहाँ तक कि देवर-ननदों को भी भरपूर प्यार-सम्मान मिला। लेकिन यह घर उनके मायके से सर्वथा भिन्न था। यहाँ कोई पूजा ही नहीं करता था। कभी किसी मौके पर अगर भगवान बीच में आ भी जाते थे तो रस्म अदायगी भर हो जाती थी। वह अगर अपने बचपन की आदत के कारण भगवान के सामने हाथ जेाड़कर कुछ देर ठहर जाती थीं, तो कभी उनकी कोई ननद या पति ही आश्वस्त होने के लिए उन्हें छू कर पूछते थे कि उनकी तबियत तो ठीक है न!

फिर धीरे-धीरे उन्होंने अपने को द्रुत पूजा के लिए तैयार कर लिया था, वे नहीं चाहती थी कि उनके लोग उनकेा लेकर चिन्ता में पड़ें। और उन्हें यह लगने लगा था कि यह भी ठीक ही है। घर के सारे लोग बड़े कर्मठ थे। सब अपने उत्तरदायित्वों के पालन में इतने तत्पर रहते थे कि वे दंग रह जाती थीं। काम के सामने उनके बूढ़े श्वसुर, युवा पति और किशोर देवरों को खाने-पीने की भी सुध नहीं रहती थी। उनकी सास सब को आराम पहुँचाने में अपने को खटाती रहती थीं। उनकी ननदें माँ से ये सारे गुण सीख रही थी; वे भी उसी दल में शामिल होकर प्रसन्न रहीं।

दुर्भाग्य से, दादी के पुत्र कर्मठ नहीं हुये। दोनेंा बेटों में एक भी परिवार की कर्तव्यपरायणता नहीं पा सका। आलस्य और प्रमाद में पड़े इन पुत्रों को लेकर उनके पति विक्षुब्ध रहा करते थे। लेकिन वे कभी पुत्रों से विमुख नहीं हुयीं। परिवार की आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को न्यून बनाने वाले बेटों की माँ होने का केाई दुख उन्होंने नहीं प्रकट किया। बल्कि जब वे दोनेां अपनी किसी भूल के कारण अलग-थलग पड़ जाते थे तो उनको थामा।
वे ऐसा केवल पुत्र प्रेम की दुर्बलता में करती हों, ऐसा नहीं था। उन्हें अक्सर अपने मामूली पुत्रों पर दया आती थी, जो अपने पिता और पितामह की विशिष्टताओं के बीच पिस रहे थे। वे अपने बेटों को उतनी सुविधायें मुहैया करा देती थी, जिससे वे दुखी न रहें और घर में कलह भी न हो।

कुदरत का करिश्मा देखिये! दादी के उन्हीं मामूली बेटों के ऐसे बच्चे हुये जिन्होंने परिवार तो क्या देश का नाम दुनियां में रौशन कर दिया। आये दिन विदेशेंा की यात्रा करने वाले इन बेटे-बेटियों की जीवन शैली एकदम बदल गयी थी। बात-बात पर माई-गॉड बोलने वाले इन बच्चों को यह सोचने की भी फुरसत नहीं थी कि भगवान क्या है।

लेकिन दादी की जान इनमें बसती थी। अब ये उसके लिये भगवान के प्रतिनिधि थे। किसी ने कभी दादी से शिकायत की थी कि आपके पेाते-पेातियों को अखाद्य खाते देखा हैं। दादी ने हँस कर इतना ही कहा था- खाते होंगे। उन्होंने इसके लिए किसी से कुछ पूछने की जरुरत नहीं समझी थी।

स्वर्ग में दादी पर विचार हेाने लगा। यह अति पवित्र हैं, इसमेंं तो कोई दो राय नहीं थी। लेकिन विचारक देवों का कहना था कि इनका तो अपना कोई व्यक्तित्व ही नहीं था; राम के साथ राम, रहीम के साथ रहीम!

लेकिन जब उनकी प्रगति मापी गयी तो सब चौंक गये। अरे! यह तो मुक्ति के निकट पहुँच गयीं। कैसे भाई? जिसके जीवन का प्रारम्भ पूजा-पाठ से हुआ था, उसने वृध्दावस्था में अपने बच्चों को अखाद्य के लिये भी माफ कर दिया! यह कैसी प्रगति है?

साक्षी रुप में सब कुछ अंकित करने वाली आत्मा ने तथ्य उजागर कर शंकायें दूर कर दीं कि स्थितियों से अप्रभावित रह कर, इसने दूसरों को बदलने की कोशिश में कभी भी अपना अपव्यय नहीं किया।

दादी के गुजरने के बाद उनके घर में बहुत सारे लोग जुट आये हैं। इनमें बहुतेरे ऐसे हैं जो उनके सम्पर्क में आये थे, वे सब याद करते हुये कहते हैं कि उनके प्रभाव में उन्हेांने अपने अंदर कितना अच्छा बदलाव महसूस किया था।

 

समाप्त

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