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कहानी – उर्मिला शिरीष

‘हरेक के दिल में सच्ची भावना है आप लोगों के प्रति, इतनी श्रद्धा, इतनी सहानुभूति कि….”
”पहले मैं भी यही सोचा करता था कि मातृ-भूमि के लिए प्राण न्यौछावर करने का सौभाग्य कितनों को मिलता है। पर अब लगता है सैनिक तो हंसते-हंसते कुर्बान हो जाते हैं, पीछे छूट जाती है गहन विभीषिका। जवान बेटे का जाना परिवार के लिए पल-पल मौत से लड़ना होता है। मृत्यु को प्राप्त इंसान सबसे मुक्त हो जाता है, मगर उसके पीछे जो रहते हैं उनकी वेदना को महसूस करना कितना असहनीय होता है। गौरव गाथाएँ सुनकर अभिभूत होना और बात हैं लेकिन यहां झेलना…” उन्होंने अपने ह्मदय के बाँयी तरफ कांपते हुए पतले हाथ को रख कर कहा, ”मौत से भी ज्यादा दु:खदायी होता है… उस दु:ख को हम जी रहे हैं…
क्योंकि हमारे लिए यही अंतिम सत्य और लक्ष्य है…। लेकिन अब हम नहीं चाहते कि इसे कोई तमाशा बनाये…। संभव हो तो… यह सब छोड़कर कुछ और करिए। हमें चैन से रहने दीजिए। बार-बार वही खेाखली बातें सुनने की शक्ति हम में नहीं रही। आश्चर्य कि किसी की बातों में चिंतन या भविष्य को समझने की कोई दृष्टि दिखाई नहीं देती। आप लोग उसे शब्दों में जीते हैं लेकिन हमें तो अपनी अंतरात्मा में जीना है।”
वह लगातार बोले जा रहे थे। लगता था कोई अदृश्य काला तूफान उनके ह्मदय में भरा हुआ था। उनका चेहरा आवेश तथा व्यथा से लाल हो गया था। हल्की लंबी नाक पर रक्ताभा चमक उठी थी। गालों की बूढ़ी चमड़ी अब भी कांप रही थी… आंधी में थरथराती दिए की लौ की तरह…। उनकी आवाज में ऐसी कंपकपाहट थी जैसे ठहरे हुए पानी में भारी पत्थर गिर गया हो अैार उसकी गँूज देर तक उसकी सतह को थरथराती रहती है। आँखों में उतर आई नमी को उन्होंने अपनी भूरी शुष्क पलकों में सेाख लिया।
इस दौरान उनकी पत्नी एकदम चुप बैठी रही थीं। एकदम स्तब्ध! स्पंदहीन! उसने सकपका कर उनकी तरफ देखा तो उन्होंने नि:शब्द बहते आंसुओं को
अपनी पतली रूखी उंगलियों से पोंछ लिया। सांय-सांय करता अवसाद उन चारों के भीतर पहाड़ से टकराती तेज हवाओं की तरह उतरता जा रहा था। उसने तस्वीर की तरफ देखा। हंसता-खिलखिलाता चेहरा। सैनिक वर्दी पहने खड़ा उनका बेटा। माता-पिता के कंधों पर झूलता दो-ढ़ाई बरस का उनका बेटा। स्कूल यूनिफार्म में दोस्तों के बीच मुस्कराता बेटा…। और भी तस्वीरें थी जो अपने विदेह अस्तित्व और उपस्थिति से उस कमरे की पीली पड़ती धूसर दीवारेां को थामे हुई थीं। जीवन की बहती निद्र्वन्द्व धारा अचानक ही इधर-उधर गुम हो गई थी।
विभा ने उसका रुआंसा चेहरा देखा तो पास में आकर हाथ दबाकर जताया कि वह बुरा न माने। इस तरह की अप्रत्याशित स्थिति में सहज रहे। उसने
कांपती लरजती आवाज़ में कहा-
”माफ कीजिए। मैं आपका मन नहीं दुखाना चाहती थी लेकिन…।”
”लेकिन आप भी कया कर सकती हैं। आपको भी तो रस्म अदायगी के लिए भेजा गया है। यह विडम्बना ही तो है कि यहां हर विचारधारा तथा महापुरुष का अवदान रस्म अदायगी के रूप में स्मरण किया जाता है। हमारा आचरण गिरगिट की तरह रंग बदलने वाला हो गया है।”
वह चुप निरंतर सहमी सी देखती रही उस चेहरे को जो अपने भीतर की उफनती धाराओं को थामकर संयत होने की निष्फल चेष्टा कर रहा था।
”आप खुश होंगी कि आपने हमें बुला लिया है। संंस्था खुश होगी कि उसने एक शहीद के परिवार को सम्मानित किया है और दर्शकों को लगेगा कि उन्होंने एक वीर जवान के माँ-बाप को प्रत्यक्ष देखा है। सरकार खुश होगी कि उसने अपना दायित्व निभाया है। पर क्या यह सब सिनेमा हॉल में बिताये गये समय की तरह नहीं है? तात्कालिक भावावेश में बहाने वाला। बाहर निकलते ही सारी सहानुभूति और संवेदना खत्म। क्या होता है बाद में? भूल जाते हैं सब कुछ। उस उफनाती हुई देश भक्ति की धारा को बांध सका कोई। सिर्फ नहीं भूलते हैं तो कुछ लोग। अपंगों कि जिंदगी जीने वाले भुक्त-भोगी। बिना हाथ-पांव के जिंदा रहना है उन्हें। कोई है जो उन्हें शामिल कर ले अपने जीवन में? हर बार जख्म खरोंच कर जाने वाले असल में हमारी तकलीफ को औपचारिकताओं में बांधकर किताबी शब्द उटकर कितना महसूस कर पायेंगे?”
बोलते-बोलते वह थक से गये। एकदम निढाल हो सेाफे पर अधलेटे वह आँखे मूंदकर पता नहीं किस दुनिया में डूब गये। उनकी सांसे तेज-तेज चल रही थी…। ”अब यह सब सहन नहीं होता…।”
”शांत हो जाइए। क्या हो गया है आज आपको!” इस बार उनकी पत्नी ने उन्हें रोकते हुए कहा।
”नहीं, कहने दीजिए।” उसने अपने मनोभावों को नियंत्रित करते हुए कहा। किन्तु अनजाने ही अंदर से वह उनके दु:ख और संताप की सहभागी हो गई थी। उनको देखकर अवाक थी वह। उसे पहली बार महसूस हुआ कि उसने इस दुनिया और इस जिंदगी के बारे में क्यों नही सोचा। क्यों नही उसने सोचा कि देवत्व तथा महानता के पीछे भी मनुष्यत्व की सामान्य सी लगने वाली भयावह पीर छुपी हो सकती है। युद्धविराम के बाद संतोष एवं राहत की संास लेकर निÏश्चत होने वाली वह, इस सुलगती हुई स्थिती की आँच तक नहीं झेल पा रही जबकि वह सब इसके बीच बैठे हुए हैं… सांस ले रहे हैं।
”अंकल की तबीयत ठीक नहीं है।” इस बार विभा ने स्थिति की गंभीरता को
भांपते हुए कहा।
”नहीं बेटी आपसे क्या कहें़। समय के इस प्रवाह में ऐसे कड़वे और अजीब अनुभव हुए कि…”
”कुछ कहने की जरुरत नहीं है। अपना रोना मत रोओ। जब परमात्मा ही दयालु नहीं रहा तो हमें किसी की दया या सहानुभूति चाहिए भी नहीं।”
वह उठकर खड़ी हो गई। उसे लगा थोड़ी देर और रूकी तो उसके आँसू टपक पड़ेंगे…। मन में गहरे तक व्यथा की धुरी उतर गई थी… जैसे एकाएक बर्फ का गोला निगल लिया हो।
कुछ चुभता पिघलता तथा बहता महसूस हुआ। मृत्यु चाहे युद्ध के मैदान में हेा या बंद कमरे में, शब्द उसे महान् पवित्र तथा गौरवान्वित क्यों न कर दें, उसका दु:ख तथा प्रभाव कम नहीं होता… अब समझ में आया। थोपे गये युद्ध के उन्माद को खतम करने के लिए, और अपनों पर ही वार करने से कतराते सकुचाते हताश होते अर्जुन को क्यों इतनी गहनता सूक्ष्मता तथा विराट रुपों में आत्मा की नश्वरता और परमात्मा की बात समझानी पड़ी थी… क्यों संबंधों और अपने परायों को लेकर इतने तर्क देने पड़े थे? … कृष्ण जानते थे कि युद्ध में त्यागी गई देह और अपनों का बिछोह अर्जुन को जीवन से विमुख तथा पराधीन कर सकता है। मगर क्या अर्जुन युद्ध जीतने के बाद भी उस मनोव्यथा से उबर पाये थे? आह… महानता और असाधारण साहस के भीतर छुपी साधारण माँ-बाप की स्पृहाएँ, और बेटे के प्रति वियोग की अंतहीन पीड़ा को कौन समझ सकता है!
शब्द हैं… भाव हैं, उनका विराट आभा मण्डल है… उसकी स्मृतियाँ हैं… पर वह ही नहीं है… जिसके जिए सब कुछ गढ़ा गया था… जिसके साथ में सब थे…। उसने चिट्टी तथा लिफाफा खोल कर रख दिया और मौन हाथ जेाड़ कर बाहर निकल आई। लगा अभी-अभी बंदूक की कोई गोली उसके सीने को भेदती हुई निकल गई है। उसका सिर चकराने लगा…। हल्का सा चक्कर महसूस हो रहा था उसे… हालांकि विभा ने कहा भी कि मैं बाद में फोन करती हूं मगर उससे कुछ बोलते नहीं बना। … कांपते कदमों से वह बाहर निकल आई।
मेरा बेटा… देश भक्ति… संस्था… सम्मान… पिपासा… तमाम शब्द उसके ह्मदय पर ओलों की तरह गिर रहे थे। ह्मदय को भेदने वाली वह दु:ख भरी दृष्टि जिसमें अंदर का विलाप हिलोरें मार रहा था। वह दहकते दर्द की पैनी धार! कितनी बातें थी जो वह पूछना चाहती थी… उफ् क्या पूछती कि बेटे के शहीद हाने पर कैसा लग रहा है? नौजवानेां को क्या संदेश देंगे? देश के प्रति आपकी क्या भावनाएँ हैं? उसे स्वयं से वितृष्णा हो उठी कि वह कितनी क्षुद्र बातें कर रही थी उनके सामने। कितना छोटा सा उद्देश्य लेकर पहुँची थी उसके सामने। स्वयं को कितना गौरवान्वित महसूस कर रही थी उनको बुलाकर! एक संस्था की मामूली सी प्रतिनिधि बनकर जा पहुँची यह जताने के लिए कि देखेा समाज और हम आपके लिए क्या सोच रहे हैं? कैसे याद कर रहे हैं!
आत्म-ग्लानि से उसका ह्मदय फटने लगा… अरे हाँ उनकी बहू को भी देखना चाहती थी। वह बाहर निकली ही नहीं… क्या घर में नहीं थी…! रास्ते भर उसका मन तीव्र बैचेनी से छटपटाता रहा… यहाँ तक कि खाना खाते वक्त… सेाते वक्त… उन दोनों के चेहरे ही उसकी स्मृतियों और चेतना को उदीप्त किए रहे…।
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