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कहानी – उर्मिला शिरीष

वह अपनी संस्था की तरफ से उन लोगों को आमंत्रित करने जा रही थी। उसकी मित्र विभा ने पूरी तरह आश्वस्त कर दिया था कि वह लेाग जरूर आ जायेंगे। वह गहरी उत्सुकता तथा भावावेश से भरी थी। मन में ढेर सारे सवाल थे। संशय थे। वेदना तथा गर्व की अनुभूति थी। अब तक जो कुछ भी टीवी पर देखा था या पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ा था, वह सब उसके मन-मस्तिष्क में छाया हुआ था।
एक-एक चेहरा तथा दृश्य याद था। चेतन-अवचेतन में उन्हीं के साथ जीती थी। उन्हीं के बारे में सोचती थी। शुरू-शुरू में तो रेामांच तथा बलिदान के हैरतअंगेज दृश्य तथा घटनाएँ देखकर पूरे शरीर के स्नायु तनावग्रस्त हो जातएक-एक चेहरा तथा दृश्य याद था। चेतन-अवचेतन में उन्हीं के एक-एक चेहरा तथा दृश्य याद था। चेतन-अवचेतन में उन्हीं के
साथ जीती थी। उन्हीं के बारे में सोचती थी। शुरू-शुरू में तो रेामांच तथा बलिदान के हैरतअंगेज दृश्य तथा घटनाएँ देखकर पूरे शरीर के स्नायु तनावग्रस्त हो जात थे। उनके भिंचे हुए जबड़े… प्रबल रुलाई के वेग को चेहरे की माँस-पेशियों में समेटे चेहरे और शोक के समुन्दर में डूबी बारे
आंखों को देखकर मन थर्रा जाता था। ह्मदय में श्रध्दा तथा सहानुभूति की भावना भरी होती…. देश भक्ति के तमाम गीत, किस्से कहानियां… पात्र तथा घटनाएं…. जीवंत हो उठे थे। कई बार तो विश्वास ही नहीं होता था कि वह जो वहाँ हैं…. लड़ रहे हैं… मर रहे हैं, हम में से ही कोई हैं… हमारी ही तरह इंसान हैं।
आज ऐसे ही महान् साहसी तथा कुर्बानी की जीती-जागती प्रतिभाओं से मिलने का सौभाग्य उसे मिल रहा था। गर्वानुभूति के यह पवित्र क्षण उसके जीवन में सबसे यादगार क्षण बनने जा रहे थे। वह सीधे उन्हीं के घर जा पहुँची। विभा वहीं पहुँचने वाली थी। घर ढूंढ़ने में उसे जरा भी दिक्कत न हुई। बच्चा-बच्चा उनका पता जानता था।
घर के बाहर खड़ी हुई तो उसकी निगाहें-अनायास ही खाली पड़े झूले पर जा पड़ीं। स्थिर मौन किसी की स्मृतियों में खोया एकाकी पड़ा झूला। हालांकि गाय या बकरी ने उसका एक कोना नोंच दिया था, मगर उसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था गोया आकाश का कोई टुकड़ा मेघेंा के बीच अटक गया हो। पेड़-पौधों की पत्तियाँ समय से पहले ही सूख चुकी थीं। जड़ तक उनकी शाखें पीली तथ विवर्ण होकर गिरने लगी थीं। वह प्यासी थीं। रसविहीन थीं। उन्हें गीली मिट्टी का रस चाहिए था। सतही तौर पर प्रकृति की हर चीज में एक विशेष अवस्था में ही बने रहने की अदम्य वासना दिखाई देती है अन्यथा ध्यान से देखने पर सभी चीजें मूलत: माटी में मिल जाने को आतुर होती हैं। जो बगीचा कभी हरा-भरा तथा खिला-फूला रहा होगा, अब जगह-जगह पीली व सूखी पत्तियों से भरा हुआ था। परिवार के सदस्येां की उदासीनता तथा विराग दृष्टि दिखाई दे रही थी।
वह यूं ही खड़ी रही क्षणों तक। अजीब सा भयभरा संकोच उसकी नसों में उतरने लगा। क्या करुँ। यहीं खड़े होकर विभा का इंतजार करुँ या…. उसका हाथ अनायास ही घंटी की ओर बढ़ गया। सघन मौन को हिलाता घंटी का स्वर गूँजा… एक बार… देा बार… तब कहीं अंदर से धीमी आवाज सुनाई दी।
” मैं ” उसने अपना नाम बताया।
”कहिए, क्या काम है? कहाँ से आई हो?”
”जी, विभा ने आपको बताया होगा। वह मेरे साथ आने वाली थी-मगर बाद में तय हुआ कि वह सीधे यहीं पहुँच जायेंगी।” उसने अपनी संस्था का परिचय दिया।
उन्होंने बेशब्द दरवाजा खुला छोड़ दिया। वह पलों तक असमंजस में खड़ी रही कि अंदर जाये या न जाये, मगर खुला दरवाजा अंदर आने का संकेत दे रहा था। बरामदे में सामान पड़ा था अस्त-व्यस्त सा। खाली गत्ते के बाक्स…
पेपर्स…। अंदर का कमरा जरूर सुव्यवस्थित था। उसने चारों तरफ निगाहें दौड़ाई। क्रीम कलर के पंखे पर धूल की परतें चिपकी हुई थीं और किनारों पर छल्ले से लटक आये थे। छत पर जगह-जगह जाले लगे हुए थे और एक कोने में छत से सुराख बनाती दीमक अपना साƒााज्य फैलाती जा रही थी। उसे लगा इस घर में कितने सुराख बना देगी यह दीमक… कितना खोखला कर दिया होगा दीवारों को। दीवारों पर कई तस्वीरें लगी थीं। कोने की मेज पर बड़ी तस्वीर रखी थी जिस पर चंदन की माला पड़ी थी। अगरबत्ती केस तथा माचिस रखी थी। सुबह जलाई गई अगरबत्ती की राख किसी कीड़े की तरह लग रही थी। लग ही नहीं रहा था कि इस घर में कोई प्राणी है… कोई स्वर… कोई आवाज है। हर तरफ खालीपन… दर्द में डूबी घनी उदासी परकटे पक्षी की तरह बैठी हुई थी। शूरवीर जवान का शौर्य तथा तेज, उन बर्फीली चोटियों से होकर घर आते आते बेशब्द तथा वजनदार हो गया था या सबके प्राणेंा में जाकर समा गया था… या…।
”बैठिए। बुलाती हूँ।” कहकर वह दूसरे कमरे में चली गई।
एकदम हड्डियों का ढंाचा मात्र बची देह। त्वचा की झूलती लटों को आसानी से पकड़ा जा सकता था। नाक पर चढ़ा चश्मा जिसके पीछे छुपी आँखेां में गौर से देखना पड़ता था। गर्दन के नीचे दो नुकीली हड्डियों को देखकर उसे झुरझुरी सी हो उठी। क्या वह पहले भी ऐसी ही थीं या….
विभा को आ जाना चाहिए। वह मन ही मन परेशान हो उठी। लेकिन सामने खड़ी देशभक्त की माँ को देखकर वह श्रद्धाभिभूत हो उठी।
”मै आप लोगों से ही मिलने आई हूँ।”
”हम लोगों से! फिर कोई कार्यक्रम है क्या?”
तभी अंदर से एक बुजुर्ग से व्यक्ति आते दिखे, जो काफी कमजोर लग रहे थे पर उनके गोरे रंग के चमक विहीन चेहरे पर हिमशिलाओं सा दृढ़ता का भाव
चिपका हुआ था।
”इनको विभा ने भेजा है।”
”अच्छा। कहो बेटी।” उन्होंने बगल में पड़े सेाफे पर बैठते हुए कहा। घुटने मोड़ते वक्त उनके मुंह से हल्की सी आह निकली। शायद दर्द होगा।
”हमारी संस्था आप लोगों का सम्मान करना चाहती है। यह हमारे लिए बड़े गौरव कि बात है कि हम आप के परिवार का सम्मान करें। व्यक्तिगतरूप से भी मैं आप लोगों के दर्शन करना चाहती थी…” शेष शब्द उसके गले में ही अटक कर रह गये कयोंकि वह ऐसी तीक्ष्ण विस्मय भरी निगाहों से उसकी ओर देख रहे थे जिनमें पत्थर को भेदने वाला पैनापन था।
”माफ करना बेटी, मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है। मेरी हालत तो आप देख ही रही हो।”
”जी ले जाने लाने की व्यवस्था हमारी होगी।”
वह अपनी बात ठीक से प्रस्तुत कर पाती इससे पहले ही किसी का फोन आ गया। वह उठकर चले गये। वह फिर अकेली हो गई। वहाँ ठहरा सर्द अवसाद उसकी नसों मे उतरने लगा….।
”आप बाद में आ सकेंगी।” उन्होंने वहीं से कहा। वह बाहर निकल आई। खुली हवा में… रोशनी में लेकिन मन वहीं रह गया उसका। क्या बुरा मान गये वह? मेरे मुंह से कुछ गलत निकल गया? वह मुझसे मना न करके विभा से मना करवा देंगे?
जिस प्रभा मण्डल में दमकते चेहरों की कल्पना उसने कर रखी थी, उसके
विपरीत यहां तो विषाद तथा उदासी में डूबे चेहरे ही दिखे। सच है जीवन से बढ़कर कोई शब्द… कोई दिलासा… कोई राग… कोई खुशी… कोई चमत्कार नहीं हो सकता। क्योंकि जीवन स्वयं में एक आशा है… अलोक है…। जहाँ जीवन नहीं होता वहाँ का वातावरण और कैसा होगा! तो क्या तुम मृत्यु का उत्सव देखने की आकांक्षा लेकर गई थी! क्या सेाच रही थी कि महिमा पंड़ित, कि मृत्यु के बाद यहाँ लेाग खुश होंगे… हँस रहे हेागे! संतुष्ट होगें! उसने स्वयं को धिक्कारा।
विभा से आश्वासन मिलने पर ही उसने यह कार्यक्रम रखा था। हाँ, विभा ने यह शर्त अलबत्ता रखी थी कि माता-पिता को खासतैार पर आमंत्रित किया जाये अन्यथा वह तो उनकी बहू को बुलाकर ही संतोष कर लेती। वह ऑटो में बैठी और विभा के घर आ गई। प्रतीक्षा करने के अलावा केाई रास्ता न था। इन क्षणेां तो उसे यही चिंता क्लांत कर रही थी कि अगर उन्होने मना कर दिया तो संस्था में उसकी कितनी बेहज्जती हो जायेगी। विभाग को भी क्या लिखकर भेजेगी कि इन लोगों का सम्मान नहीं किया जा सका। सोच-सोच कर तनाव बढ़ता जा रहा था, मगर अपने तनाव तथा उद्विग्नता से ज्यादा उसे इन लोगों की अनकही मनोव्यथा कुरेद रही थी। क्यों वह उनके जीवन में झांकने की कोशिश कर रही है… क्यों वह उनको भावनात्मक स्तर पर जानना चाहती है… क्या इसलिए कि वह शिखर पुरुष के जन्मदाता हैं…. या सच्ची हमदर्दी जताने के वास्ते…
”क्यों, वहां नहीं गई?” तभी विभा ने आकर उसका ध्यान भंग किया।
”वहीं से तो आ रही हूँ।”
”क्या कहा उन्होंने?”
”दुबारा आने के लिये बोला है। उनकी तबियत ठीक नहीं है शायद। मगर उन्होंने मना कर दिया तो? वह आयेंगे तो? हमारी तो पूरी तैयारी हो चुकी है। प्लीज विभा, तुम्हारे ही हाथों में है।”
वह असहाय सी विभा का चेहरा देखने लगी।
”चलो।” कहकर उसने तुरन्त स्कूटर मोड़ लिया।
बीस मिनट बाद ही वह पुन: उसी कमरे में उसी सोफे पर बैठी थी जिसके सामने बर्फीली-दुर्गम चोटियों पर चढ़ते हुए जवानों के साथ उनका बेटा मुस्करा रहा था… तस्वीर में।
”हालांकि युद्ध तो समाप्त हो चुका है मगर… युद्ध में शहीद हुए या युद्ध में शामिल वीर जवानों तथा उनके परिवार जनों को सम्मान करने का हमारा संकल्प… है…”
”बेटी, युद्ध सीमा पार समाप्त हो गया है, जीवन में नहीं। असली युद्ध तो
समाप्ति पर शुरू होता है, जहाँ शहीदों के परिवार अपने बेटों या भाईयों को खेाकर अकेले हो जाते हैं… और… वह जो अपंग हो गये हैं… उस जीवन की त्रासदी को जीना किसी युद्ध से कम कष्टदायी होता है क्या..।”
”जी… …”
”जरूरी तो नहीं है कि हर कोई सम्मान करे…बल्कि हो सके तो हर किसी को युद्ध की विभीषिका एवं उसके कारणों को समझने का प्रयास करना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी तो सुरक्षित रह सके।”
”जी… आप उस वीर योद्धा के जनक हैं जिसके ऊपर सारे राष्ट्र को अभिमान है। हम सबको गर्व है। उसी महान् त्याग का स्मरण दिलाने के लिए… यह कार्यक्रम किए जाते हैं। बल्कि मैं तो अपने साथ फोटोग्राफर को लाने वाली थी ताकि आप लोगों के साथ फोटो निकलवा कर रख सकूं। हमारी आनेे वाली पीढियों के लिए धरोहर होंगी यह स्मृतियां। यह तस्वीरें। उनके लिए कितने आश्चर्य की बात होगी कि उन दुर्गम चोटियों पर चढ़कर हमारे जवानों ने युद्ध लड़ा था… विजय प्राप्त की थी।”
”बस, बस… हो गया सम्मान… हो गई प्रसंशा…।” वह एकाएक बीच में ही बोल पड़े। एकदम तैश में आकर। जैसे कहीं गहरे तक शूल चुभ गया हो। ”तस्वीरों को धरोहर मानती हो। मगर युद्ध के उन्माद की उस जिज्ञासा को क्या कहोगी जो अपनी शक्ति तथा साƒााज्य विस्तार की ऊंची महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए मासूम लोगों को तहस-नहस कर देती है। युद्ध में उतरे दोनों ही तरफ के सैनिकों के परिवार बर्बाद हो जाते हैं। उनकी बहू-बेटियां जवानी में विधवा हो जाती हैं… बच्चे-बूढे अनाथ हो जाते हैं। जिन्हें हम व्यक्ति रुप से जानते तक नहीं उनके प्राणों के प्यासे हो जाते हैं। जिन पैसों से राष्ट्र को समृद्धि की ओर विकसित होना चाहिए उसी को उड़ा देते हैं… बारुद के धुएं में। आज इंसान को युद्ध नहीं, जीने के साधन चाहिए। पता नहीं क्यों बन जाते हैं। हम बर्बाद लोगों के हाथों की कठपुतलियाँ। आप लोग जिस भावना और शब्दों को लेकर चल रहे हैं, वह कल तक रहेंगे क्या? बेटी, देश को
इम्पलसिव पेट्रियाटिक फीलिंग नहीं, एक दृढ़ संकल्प की आवश्यक्ता है। पता नहीं आप लोग बच्चों में ऐसे संस्कार क्यों नहीं डालते हैं।”
”आप गलत समझ रहे हैं सर, असल में…”
”मैं क्या गलत समझ रहा हूँ, जो देखा है वही बता रहा हूँ। सम्मान और सहयोग के नाम पर ले जाकर बैठा देते हैं और बुलाते हैं सम्मनित करने के लिए उन्हें, जिनसे आपकी संस्था को लाभ मिलना होता है। व्यक्तिगत स्वार्थ तथा लाभ की भावना वहाँ भी नहीं छूटती। कहाँ से होगा देश का भला। लाईन लग गई थी सम्मानित करने वालों की। बसों तथा ट्रेनों तक में लोग शहीदों के नाम पर पैसे मांग रहे थे। किसी ने सोचा कि इन सबके पीछे हमारे दिल पर क्या गुजरती होगी? हमने तो अपना फर्ज समझा, और आप लोगों ने? वास्तविक चिंताओं से दूर आप शहादत और देश भक्ति के शब्द आलापे जा रहे हैं।” कहकर वह चुप हो गये। उनका गला भर्रा गया था। उनकी गर्दन की नसें फूल कर बाहर निकल आई थीं।
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