एक भाषा में कहे गए मंतव्य को पूर्ण सावधानी एवं एकाग्रता के साथ दूसरी भाषा में मूल की आत्मा की रक्षा करते हुए कहना लिखना अनुवाद है।
अनुवाद-कर्म राष्ट्रसेवा का कर्म है। यह अनुवादक ही है जो दो संस्कृतियों, समाजों, राज्यों, देशों एवं विचारधाराओं के बीच “सेतु’ का काम करता है। और तो और, यह अनुवादक ही है जो भौगोलिक सीमाओं को लांघकर भाषाओं के बीच सौहार्द, सौमनस्य एवं सद्भाव को स्थापित करता है तथा हमें एकात्मकता एवं वैश्वीकरण की भावनाआंें से ओतप्रोत कर देता है। इस दृष्टि से यदि अनुवादक को समन्वयक, मध्यस्थ, संवाहक, भाषायी दूत आदि की संज्ञा दी जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी।
कविवर बच्चन जी, जो स्वयं एक कुशल अनुवादक रहे हैं, ने ठीक ही कहा है कि अनुवाद दो भाषाओं के बीच मैत्री का पुल है। वे कहते हैं-
“”अनुवाद एक भाषा का दूसरी भाषा की ओर बढ़ाया गया मैत्री का हाथ है। वह जितनी बार और जितनी दिशाओं में बढ़ाया जा सके, बढ़ाया जाना चाहिए ….।”
अनुवाद का महत्व
वस्तुत: अनुवाद वह साधन है जिसके द्वारा दो भाषाओं की सांस्कृतिक चेतनाओं, जीवनपद्धतियों एवं विचारधाराओं को एकदूसरे के निकट लाकर, राष्ट्रीय एकता के पुनीत संकल्प को पुष्ट किया जा सकता है। अनेकता में एकता के भाव को चरितार्थ करने में अनुवाद की महती भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता।
अनुवाद का क्षेत्र बहुविस्तृत है। भूमंडल पर साहित्य, कला, प्रौद्योगिकी, चिकित्साशास्त्र, धर्मदर्शन, अर्थशास्त्र, समाज-विज्ञान, राजनीति-विज्ञान, गणित आदि ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में जो उल्लेखनीय प्रगति हुई है उसका विवरण हम तक अनुवाद के माध्यम से ही पहुँचता है, पहुँच रहा है, पहुँच सकता है।
अनुवाद के महत्व को रेखांकित करते हुए हिन्दी विद्वान् श्री रामचन्द्र वर्मा लिखते हैं-
“”…. अनुवादों की सहायता से पाठकों का ज्ञान बढ़ता है और उनकी आँखें खुलती हैं। वे देखते हैं कि अन्यान्य भाषा-भाषी कैसे अच्छे-अच्छे स्वतंत्र तथा मौलिक ग्रन्थ लिखते हैं और उन्हें देखकर उनमें भी मौलिक ग्रन्थ लिखने की स्पर्धा उत्पन्न होती है जिससे स्वतंंत्र साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता मिलती है …।”
तुलनात्मक अध्ययन की दृष्टि से महत्व
तुलनात्मक अध्ययन मानव के सीमित ज्ञान को नए आयाम देता है तथा वह अपने देश, काल, भाषा एवं व्यक्तिगत अहं को त्याग कर निर्लिप्त भाव से मानव-मूल्यों को परखने लगता है। पाश्चात्य विचारक एवं विद्वान् मैक्समूलर ने स्पष्टतया कहा है कि “”सभी प्रकार के उच्चतर ज्ञान का उपार्जन तुलना से हुआ है और वह तुलना पर ही आश्रित है।”
पाठक या शोधकत्र्ता एक-साथ कई भाषाओं का ज्ञाता नहीं हो सकता। दो या दो से अधिक भाषाओं के साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए उसे अनुवाद की ही शरण में जाना पड़ता है। आज देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के भाषा-विभागों में तुलनात्मक अध्ययन की सुविधा उपलब्ध है और वह अध्ययन मुख्यत: उस आधारभूत सामग्री पर आधारित है जो अनुवाद के माध्यम से विद्यार्थियों-शोधकर्मियों तक पहुँचती है।
इस सम्बन्ध में डॉ. सी. एच. रामुलु के विचार उल्लेखनीय हैं-
“”विश्वविद्यालयों में हिन्दी में अनुवाद को तुलनात्मक अध्ययन का अनिवार्य अंग मानने की नितान्त आवश्यकता है। इससे अनुवाद का दायित्व बढ़ जायेगा। यदि विश्वविद्यालयों और शोध-संस्थाओं में उत्तम कोटि का तुलनात्मक अनुसंधान करना हो तो अनुवाद भी उत्तम कोटि का होना चाहिए ….।