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ललित निबंध
गंगा तीरे

गंगा तीरे

गंगा तीरे


प्रतिभा सक्सेना

देवात्मा हिमालय बार-बार पुकारता है आओ, चले आओ पूर्व-प‚िचम दोनों ओर बाँहें पसारे कब से खड़ा हूँ! मेरी छाँह में, अंतर में सोई हुई की दिव्यता जाग उठेगी। तन-मन की रिक्तता को सिक्त करती हुई, उस गहन शान्ति में अवगाहन कर मानस स्निग्ध उज्ज्वलता से आपूर्ण हो जायेगा।

इधर कई सालों से उधर ही नहीं जा पाई थी – न हरिद्वार, न ऋषिकेश। मन हमेशा उधर ही दौड़ता रहा, पर दुनिया के जंजालों में ऐसी फँसी रही कि उधर का रुख न कर सकी। नि‚चय कर लिया कि इस बार जरूर जाऊँगी, चाहे जिस भी मौसम में जाऊँ। उस पुकार को अनसुना करना अब मेरे बस में नहीं है।

पिछली बार हिमालय की ओर गई थी तब बद्रीनाथ, केदारनाथ के दर्शन भी कर आई थी। अलकनन्दा, मन्दाकिनी, भिलंगना आदि सरिताओं के नाम मन को खींचते थे। देख कर नयन तृप्त हुए थे। पर यह तृप्ति तो और भी तृषा जगाने वाली निकली। बार-बार वहीं जाने की कामना जगा जाती है। इस बार मार्च में जाने का अवसर मिला। मौसम अच्छा था, न अधिक सर्दी, न गर्मी। हरिद्वार में बाबा रामदेव के पातंजलि योगपीठ जाने का भी विचार था।

यात्रा ठीक ही रही, रात को चले थे सुबह पहुँच गये। उधर की हवाओं में बहनेवाली पावन शीतलता का स्पर्श होते ही अनुभव होने लगा कि हम साधारण धरती से ऊपर आ गये हैं। देवभूमि में प्रवेश करते मन-प्राण जुड़ाने लगे। यहाँ धरती का रूप ही निराला है। कल पानी बरसा था। ऊँचे घने हरे-भरे पेड़ों से समृद्ध धरा गुल्मों, झाड़ियों और वनघास से आच्छादित। जगह-जगह ताल-तलैयों के दर्पण में झाँकती हरियाली और आकाश का अथाह नीलापन। ऊँचे घने आƒा-तरु सुनहरे बौरों से ढके खड़े हैं, लगता है हरीतिमा ने स्वर्णिम दुशाला ओढ़ ली हो। ऐसे पेड़ देखे युग बीत गये थे।

सूखी धरती और बचे-खुचे झंखाड़ से पेड़, हरे नहीं चारों ओर उड़ती हुई धूल की परतें ओढ़े, रूखे-सूखे छितरी डालोंवाले। शुष्कता और वीरानापन झेलते भीतर की अतृप्ति बढ़ती जा रही थी। तन-मन पर एक विषण्णता, एक अजीब सी विरक्ति छा गई थी। यहाँ इस सुफला-सुजला धरती को, निस्सीम निर्मल गगन को, इस झूमती हरियाली को और इनके साथ, भाव-भक्ति भरे सरल लोगों की भंगिमा निरख, ह्मदय उल्लसित हो गया। यहाँ आ कर विस्तृत वेगवती पावन जलधारा को नयनों मे भर जी जुड़ा गया! ऐसी तृप्ति जिसकी स्मृति से ही विलक्षण शान्ति मिलती है। हरिद्वार आकर सारी क्लांति मिट गई। चित्त को उन्मुक्ति का आभास होने लगा। जैसे मन-प्राण को विदीर्ण करती तृषा शांत हो कर तरल उल्लास से आप्लावित हो जाये। बहुत दिनों तक याद रहेगा यह अनुभव। मैं फिर आऊँगी, बार- बार आऊँगी जीवंत रूप में इस अनुभव को ग्रहण करने।

सचमुच देवभूमि है यह! पग-पग पर दिव्यता का आभास होता है। यहाँ आने को, यह सब पाने को बार बार भीतर से पुकार उठती थी – चलो यहाँ से चलो, वहाँ चलो। और कितनी लंबी प्रतीक्षा के बाद मैं आ सकी। जब पाने का मुहूर्त होगा तभी तो आ सकूँगी। उससे पहले लाख कोशिश कर लूँ, कुछ नहीं होने वाला। पर अब लगता है कामना की तीव्रता के आगे बाधाओं का वश अधिक नहीं चलेगा। अंतर्मन से उठने वाली सच्ची पुकार निरर्थक नहीं जायेगी।

शिवताण्डव स्तोत्र में व्यक्त रावण की कामना इस समय याद आ रही है। उसकी कामना अपनी पूरी तीव्रता से व्यक्त हुई, शिव के प्रति उसके आत्म-निवेदन में। भीतर ही भीतर गहन वैराग्य जाग रहा है। चाह उठती है कि इस सब का परित्याग कर, पुत्र को राज्य सौंप, शान्तमनस्, जिह्वा पर शिवमंत्र धारण कर आत्मलीन हो शांत जीवन व्यतीत करूँ, गंगा तट की किसी गुहा में अपना निवास बना कर। सारे विश्व से अपने भुजबल का लोहा मनवाने के बाद, असीम ऐश्वर्य भोगने के बाद क्या शेष रह गया था पाने को? पर तृप्ति कहाँ मिली थी? क्या कमी थी उसे? कौन सा सुख, विलास, सम्मान, सुयश बाकी रह गया था? पर आत्मिक शांति और संतोष कहीं नहीं नहीं मिला था। उसके जैसा महाप्रतापी, विश्व के सभी सुख-विलास भोग कर भी तृप्ति नहीं पाता। एक उत्कट कामना ह्मदय में पाले है जो रह -रह कर उसके काव्य में व्यक्त होती है।

सारा कुछ जो अपने भुजबल से अर्जित किया है, सारे सुख, सारा वैभव बेमानी हो उठा है। जी भर गया है इन ऊपरी आडंबरों से। अपने भीतर उतरता है, सब व्यर्थ लगता पर है। किन्तु उसकी कामना कहाँ पूर्ण हो सकी। कितने जन्मों के पुण्य संचित होते होंगे तब सुरसरि का सान्निध्य हो पाता होगा। गंगे, तुमने तो मानवी रूप धरा है। नारी संवेदनाओं को जीया है। अष्ट वसुओं की माँ गंगे, सात पुत्र समर्पित हो गये इसी जल में, शाप-मुक्त हो गये। एक भीष्म -देवव्रत को जीवन मिला। तुम साक्षी हो उस विडंबनामय जीवन की। तुम्हारे मन की करुणा कितनी बार उमड़ी थी माँ, समझना मेरे मन को भी। जो बीत गया बीत गया, अब शेष दिन अपनी रुचि के अनुकूल अपने ढंग से जीना चाहती हूँ। उस आनन्द को पाना चाहती हूँ कि जीवन, जीने की लाचारी न बन उत्सवपूर्ण यात्रा बन जाये और इसी सहजता से उस तट तक पहुँच जाऊँ।

विधाता ने जैसी विचित्र इच्छाएँ मेरे भीतर उत्पन्न की हैं, उन्हें प्राय: उतने ही अप्रत्याशित ढंग से पूरा भी किया है। जब तक पूरी नहीं होतीं, मन तृषित मृग सा भागता रहता है-व्याकुल भटकता, खोजता। ऐसी बहुत सी इच्छाएँ जो किसी से कहते भी नहीं बनतीं। कहूँ तो लोग मेरी बुद्धि पर संदेह करेंगे। बहुत मन करता रहा था- सघन वन में हरी-सुनहरी घासों की चादर बिछी हो, बीचबीच में छोटे-बड़े पेड़ पुष्पित लताओं के हार पहने खड़े हों। वनपुष्पों की मदिर गंध चतुर्दिक् व्याप्त हो। परियाँ जहाँ पूरे चाँद की रातों में विहार करती हों, और मैं इस सब का प्रत्यक्ष अनुभव करूँ। महाबलेश्वर की सुरम्य वनखंडिकाओं में मुझे यह सब अनायास मिल गया। वह पुष्पित तरु-गुल्मों को छू कर आते सुगंधित पवन की स्मृति अब भी कभी-कभी राह चलते अनायास उदित हो जाती है जो क्षणांश को ही सही मन में उल्लास बिखेर जाती है।

और आज यहाँ गंगा मेरे परम निकट बह रही हैं। जहाँ निवास मिला है वह भवन गंगा के तट पर स्थित है और जिस कक्ष में मैं हूँ वह तो गंगा से लगा हुआ है। एक हाथ भी दूर नहीं, इस खिड़की के नीचे प्रवाह है। लगता है गंगा सट कर बह रही हैं। इतनी निकटता क्या कभी किसी को मिली होगी! लगता है हाथ नीचे लटकाऊँ तो लहरों को छू लूँगी। वे तो मेरे बिल्कुल पास हैं, दूरी बिल्कुल नहीं। अब तो प्रयास मुझे ही करना है उनका स्पर्श पाने को। दिन में भी, रात में भी लगातार पाँच दिन।

प्रात:कालीन सूर्यरश्मियाँ लहराती जल राशि को एक नई आभा से भरती हैं। परावर्तित होकर वह दीप्ति मेरे कक्ष में समाती है, लहरें झिलमिलाती हैं। उनकी दमक इन दीवारों पर नाचती है। जल की तरलता प्रकाश बन कर लहराती है। मेरा तन-मन भीग उठा है उस तरल ज्योति की छलकन में। गंगा की लहरें ज्योति रूप धर मुझे स्नान करा रही हैं। विहँसता प्रकाश मेरे कक्ष में उजास भरता बिखर रहा है। मेरे कक्ष में गंगा लहरा रही हैं। सर्वत्र प्रकाशमान। मेरा अंत:करण उस ज्योति से दीप्त हो उठा है। माँ, तुम्हारा प्रसाद!

लहरों के साथ किरणों का खेल चलता है। खिलखिलाती हुई लहरें दौड़ती हैं, रश्मियाँ घूम-घूम कर पकड़ती हैं, जल में धूपछाँहीं आभा बिखरती है। प्रवाह के हरहर-नाद के साथ नृत्यरत लहरों की पायलें खनक रही हैं। जल पाँखी लाइन लगाये बैठे हैं। एक नीली चिरैया आसमान तक उड़ती है फिर नीचे आकर जल का स्पर्श कर उड़ जाती है।

दिन में सूर्य का प्रकाश और रात्रि में कभी तो चन्द्रमा की स्निग्ध ज्योत्स्ना कभी तट का विद्युत प्रकाश। और लहरों से उच्छलित उजास ज्योति-गंगा बन मेरे कक्ष में लहराती रहती है। मैं अपने बिस्तर सहित उन्हीं लहरों से सिक्त होती रहती हूँ। निरंतर स्नात- कभी गंगा के जल मे स्नान, कभी प्रकाशगंगा में। रात में लहरें मंद हो जाती हैं। श्यामल सतह पर रूपहली चंचल रेखाएँ। लगता है कोई मृदु-मंद स्वरों में गुनगुनाता हुआ अदृश्य अंगुलियाँ से रम्य कविता लिखे जा रहा है।

कहाँ से चला आ रहा है ये अजरुा प्रवाह- अनादि काल से ऊँचे शिखरों से उतरता? एक दिन विलक्षण अनुभव हुआ। गंगा के हरहराते स्वर को सुनते हुए खिड़की से गंगा के प्रवाह को देख रही थी, इतना चौड़ा पाट कि उधर घाट पर दृष्टि ही नहीं जा रही। खिड़की का भान खो गया। लगा मैं उधर बढ़ती चली जा रही हूँ। जल का विस्तार मेरे सामने, और मेरे पाँव पानी पर, मैं उस पर चल रही हूँ। उधर चलती जा रही हूँ जिधर से प्रवाह आ रहा है। मैं गंगा के उद्गम की ओर बढ़ी जा रही हूँ। ऊपर और ऊपर पर्वत दिख रहे हैं। मैं बढ़ती जा रही हूँ। विचित्र अनुभूति! मैं चमत्कृत हूँ। उस पल क्या हो गया था मुझे!

 

हरिद्वार के साथ भोले शंकर का नाम जुड़ा है। और वहीं पास में कनखल में सती के पिता दक्ष का निवास, जहाँ यज्ञ में सती ने पति का अपमान न सह पाकर देह त्यागी थी। याद आता है गणों द्वारा यज्ञ ध्वंस और शिवप्रिया का करुण अवसान। अपने अनादर की बात सुन कर चुप रहे थे शंकर, पर पत्नी के प्रति दुव्र्यवहार और उसकी परिणति पर वे क्रुद्ध हो उठे थे।

यज्ञ-भंग कर दक्ष का सिर काटने के बाद सती की मृतदेह कांधे पर डाल उन्मत्त-से भटक रहे है। लाल नेत्र, बिखरी जटायें, दिशाओँ का भान नहीं, धरती आकाश मँझा रहे हैं। कुछ कहा नहीं बस पत्नीत्व के अधिकार से वंचित कर दिया! क्या अपराध किया था? सीता का वेश धरा था राम की परीक्षा लेने को। मैंने क्या कभी वेश नहीं बदले? पत्नी की बात आते ही दृष्टि इतनी संकुचित क्यों हो जाती हैं?

कितनी गहन वेदना रही होगी! प्रिया की अंतव्र्यथा की स्मृति आते ही नयनों से अश्रु झरने लगते हैं – रुद्राक्ष बिखर जाते हैं।। मन में दु:ख है, क्रोध है, चिर-विरह की वेदना भीतर ही भीतर दग्ध कर रही है। विचलित हो उठे हैं शंकर, उचित अनुचित का भान भूल कर सती देह बाँहों में समेटे बादलों को रौंदते, बिजलियों को कुचलते उद्भ्रांत से भटक रहे हैं।

क्या-क्या याद दिला देती है गंगा !

हरि की पौड़ी की हर शाम उत्सवमयी होती है, हर शाम। चंदन कपूर के साथ पूजा में अर्पित पुष्पों की सुगंध वातावरण में व्याप्त है। अवसाद, नैराश्य का कहीं नाम निशान नहीं। शांति, संतोष और प्रसन्नता के साथ परम शांति की अनुभूति। गंगा मैया का प्रसाद है यह! लहरों की उठापटक में बता रही हैं, कालप्रवाह का उतार चढ़ाव।

जीवन की चिरंतन धारा नित्य-प्रवाहित है। एक ही प्रवाह के कितने रूप! जन्म से लेकर विलय पर्यन्त। कितने संगम और कितने भूतल, ग्राम-नगर, वन-उपत्यका। लंबी यात्रा पर्वत से सागर तक! अनुभव बाँटती चलती हैं गंगा।

गंगा की आरती उसी शाश्वत जीवन की आरती है जो भूतल पर बह कर भी उसमें लिप्त नहीं होता। जीवन के सब रूपों को झेलती चलती है गंगा, शैशव से विलय पर्यन्त। सुरसरि -प्रवाह में दीप दान का दृश्य मन को विभोर करता है। पत्तों की द्रोणियों में सुगंधित पुष्प भर कर बीच में प्रज्ज्वलित दीप की लौ लहरों के साथ लहराती बलखाती बढ़ी जा रही है।

प्राणों की ज्योति से दीप्त जीवन की अनवरत धारा में प्रवाहित हो रही है। श्रद्धा भक्ति के पुष्पों के साथ त्रिविध-ताप की सुलगती अगरबत्तियों की धूमरेखा से सज्जित! उच्छल लहरें प्रकाश किरणों की खींचतान करती चारों ओर बिखर रही हैं।

मेरी दृष्टि जा रही है अब तटों पर उमड़ते जन-गंगा के प्रवाह पर। उत्तर दक्षिण पूर्व प‚िचम चारों ओर जन ही जन, भक्ति से भरे। जितने मूड हैं इस अनवरत प्रवाह के, जनगंगा के भी कितने-कितने रूप। चारों ओर से प्रवाह आ-आ कर मिल रहे हैं। भिन्न भूषा, भिन्न भाषा, भिन्न रूप रंगों की कितनी धाराएँ आत्मसात् किए है यह जनगंगा। यहाँ एक प्रवाह में बह रहे हैं सब, एक भावधारा के अधीन। सारा अलगाव बह गया है। यहाँ आ कर वे जुड़ गये हैं माँ गंगा से, एक दूसरे से। किसी के प्रति अलगाव नहीं वरन् अपार सहानुभूति। इतनी भीड़ में भी दूसरे को धकिया कर आगे बढ़ जाने की बात मन में आ नहीं सकती, सबको जगह देते, एक दूजे के प्रति सम्मान की भावना और अपार सहानुभूति लिए बढ़े जा रहे हैं। इसी लिए कुंभ का इतना बड़ा मेला सह अस्तित्व की भावना के बल पर ही इतनी सफलता से संचालित होता है। लोग अपने अंत:करण में प्रविष्ट हैं, दूसरों के बारे में सुनने-जानने की फ़ुर्सत ही किसे है।

मेरे सिरहाने गंगा बहती रहीं। पूरी छह रात और दिन गंगा मेरे साथ रहीं। अनवरत बहता वह पुण्य-प्रवाह और लेटे-लेटे कलकल निनाद सुनती मैं। लहरें कानों में लोरी सुनाती रहीं। बीच में जितनी बार उठी खिड़की से पूरे प्रवाह के दर्शन के बिना, चैन नहीं पड़ता था। इतना सुन्दर अनुभव, इतनी लीनता मन को डुबा देन वाली, किसी इच्छा का अस्तित्व ही नहीं रहता जहाँ, कोई कामना करवट नहीं लेती। पूरी तरह तन्मय। परम शांति !

मन नहीं मानता, देख देख कर जी नहीं भरता ।
यह अनुभव कभी भुला नहीं पाऊँगी, इसे पुनर्नवीन करने फिर फिर आऊँगी, रुकूँगी ऐसे ही किसी कक्ष में जहाँ दिन-दिन भर रात-रात भर गंगा मेरे समीप बहती रहें।
कब से संचित एक विचित्र कामना थी। मेरे बिल्कुल समीप विस्तृत वेगवती सरिता का प्रवाह हो, जिसे मैं पल-पल अनुभव करती रहूँ। धारा की कल-कल सुनते सो जाऊँ। आज देखती हूँ जहाँ लेटी हूँ, बिल्कुल बराबर में गंगा बह रही हैं। मेरे सिराहने गंगा, लगता है खिड़की से हाथ बढ़ाऊँ तो लहरों की तरलता का अनुभव कर पाऊँगी। जैसी अटपटी इच्छाएँ मेरे भीतर भर दी हैं, ओ मेरे अंतर्यामी, उन्हें उतने ही अप्रत्याशित ढंग से पूरा भी किया है तुमने! तब लगता है मेरी चाह सफल हो गई है। शांति संतोष के साथ पूर्णकाम होने का अनुभव।

जो कुछ बीत गया, जैसे बीत गया उससे कोई शिकायत नहीं है। पर अब बचे-खुचे जीवन का एक भी पल गँवाना नहीं चाहती। अब तक जिन चक्करों में पड़ी रही, अब इससे अलग होना चाहती हूँ। चाहती हूँ अपने आप में सीमित, छोटे-छोटे घेरों में दौड़ते रहने की थकान, मन की क्लांति से मुक्ति मिल जाये।

  शेष समय तुम्हारे सान्निध्य में बिताना चाहती हूँ, माँ गंगे! अपनी यह आनन्दमय कामना तुम्हें अर्पित करती हूँ ! देवि, अब दायित्व तुम्हारा है!

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