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उमाशंकर चतुर्वेदी
बरसात का मौसम होते हुए भी जब बिजली रह रह कर चमक उठती है, उमाशंकर जी बता रहे हैं कि बिना बादल के बिजली कैसे गिरती है और कैसे गिराई जाती है। पढ़िए एक बहुत ही दिलचस्प रचना।
लीजिए लेाग इसी बात पर परेशान हो उठते हैं कि बिना बादलों के बिजली कैसे चमक गई? कैसे समझाएं लोगों को कि अपने यहाँ बिना बादलों के भी बिजुरिया आँख मिचौनी करती है, चमकती है, गिरती है, आग लगाती है और फिर वापिस चली जाती है।
दूसरी तरफ यह आलम भी है कि बादल घनघोर बरसें और बिजली का कहीं अता पता भी न हो। अपने यहॉें साल भर बिजली चमकती है और बरसात मे कहिए तो बिजली का पता ही न चले। आप भी पूछ सकते है कि यह कैसे संभव है? लेकिन में डंके की चोट पर कह सकता हूँ कि अपने देश में यह संभव हैं, क्येंाकि अपने यहाँ ऐसे ज्ञानी, विज्ञानी, तंात्रिक और प्रजातंात्रिक व्यक्ति हैं जो सब कुछ संभव कर दिखाते हैं। बिजुरिया चमकाना है तो चमका देंगे और नहीं चमकाना है तो नहीं चमकाएंगे।
वो कहीं पर भले ही चमकती रहे, हमें नहीं देखना है और जब हम नहीं देखेंगे तो ससुरी नहीं चमकी। हम सरकारी दूरदर्शन पर जब तक उसे नहीं चमकाएेंगे कैसे चमकेंगी? हम रोज ही दूरदर्शन पर मौसम का हाल बताते हैं। अब अगर मौसम उसके अनुसार न घिरे या न खुले तो क्या आप दूरदर्शन को फोडें़गे?
यहाँ तो ऐसे ऐसे महापुरुष मिलेंगे जो दिन में भी तारे दिखला देते है। आप हुकुम तो कीजिए – ”स्वामी दिन को रात कहें तो तारे हम चमका दें।” अब बताइए कि जब दिन में तारे चमकाए जा सकते हैं तो बिना बादलों के बिजुरिया चमकाना या चमकना कौन सी बड़ी बात है? अपने देश की महिलाएं तो यों भी रोज बिजलियाँ गिराती है।
अब वो जमाना गया जब बादल उमड़ते घुमड़ते थे, तभी बिजुरिया चमकती थी औरविरहिणियों के दिल धड़का करते थे। अब तो कम्प्युटर का युग है, सेा बिना बादलों के भी बिजुरिया चमकाना कोई बड़ी बात नहीं है। बिना बादलों के बिजली चमकती है, कड़कती है, और आप अन्दाज ही लगाते रहिए कि भैया ऐसा कैसे हो गया?
आप सोचते रहिए लेकिन यहाँ तो ऐसे वाक्ये रोज ही होते रहते हैं। अब यूँ ही देखिए कि कुछ समय पहले बिना खाए पिए ही लोगों ने डंका पीट दिया था कि सौदों पर शैदा होकर कमीशन खाया गया है। वैसे सही बात तो यह है कि आदमी खाएगा, पिएगा नही तो जिन्दा कैसे रहेगा? सेा जिन्दा रहने के लिए कुछ तो खाता ही है, और अपने स्तर से तथा मौका देखकर खाता है। कोई घास खाता है तो कोई मालपुए कोई रोटी तो कोई डबलरोटी।
बहरहाल लोगों ने कुछ भी खाया हो लेकिन सुना है कि इतना सब खाने के बाद हुआ कुछ नहीं। खाने वाले सब कुछ खा पीकर मुँछें न होते हुए भी मूँछों पर ताव देकर घूमते फिर रहे हैं। उधर कुछ लोग है कि तिल का ताड़ बनाकर बिना छाया का झाड़ खड़ा कर देते हैं। बिना भूकम्प का भूकम्प पैदा कर देते हैं।
यदि कुछ खाया पिया गया होता तो इतनी लंबी चौडी जांचों, गला फाड़ फाड़कर चिल्लाने, तथा पदों से इस्तीफा देकर बाहर आने के बाद भी कुछ हुआ धरा क्यों नहीं?
जब कुछ नहीं हुआ तो, है न सही बात, कि बिना बादर के बिजुरिया चमक गई। आप सोचते रहिए कि कैसे कैसे लोग हैं, बिजुरिया चमकाने वाले।
बिजली चमकाई भी और कुछ मजा भी न आया। किसी की समझ में यह भी नहीं आता कि बड़े लोग क्या कभी कमीशन भी खाते हैं? वे क्या खाते हैं और पीते हैं, यह वे स्वयं भी नहीं जानते हैं और लोग हैं कि बिना बादलों के बिजली चमकाने पर तुले रहते हैं। घर का सौदा बाजार से लाते नहीं और विदेशी सौदों की बात करते हैं, बहस छेड़ते हैं। घर के अपने ही पाइप में पानी आता नहीं सो उसकी चिन्ता नहीं और इटालियन पाइप पर चर्चा छेड़ते है। बिना किसी फोर्स के बोफोर्स पर बहस करते हैं। छेड़ते रहिए चर्चा और चमकाते रहिए बिजुरिया, बादल तो गायब हैं।
दिल्ली में मौसम साफ होने पर भी बिजली चमक जाती है और गिर कर चली जाती है। लोग देखते ही रह जाते हैं और जिस पर गिरती है वेा हक्का- बक्का रह जाता है। जो बिजुरिया चमकाते थे और डराते रहते थे उन्हीं पर बिजली गिर जाती है।
अपने यहाँ बड़ी विचित्रताएँ और विभिन्नताए हैं। बिना बादल के बिजुरिया चमकती है, बिना पाँव के लेाग ऊपर ही ऊपर उडते हैं, बिना कान के सुनते है और बिना आँख के देख लेते हैं। ज्ञान चक्षु केवल अपने देश में ही हैं। इन्हीं ज्ञान चक्षुओं के बल पर देख लेते हैं कि किस सौदे पर कौन शैदा है और कहाँ से किसको क्या मिला? कौन कहाँ आता जाता है, यहाँ तक कि मुहल्ले में किसकी बच्ची, किसकी पत्नी और किसका आदमी कैसा है। ज्ञान चक्षु दौड़ाए, कुछ पता लगाया और बिना बादलों के बिजली चमका दी।
कुछ लोग बिना शादी के भी हनीमून मना लेते हैं और कुछ को शादी के बाद भी हनीमून का जुगाड़ नहीं बैठता है। वैसे हनीमून का प्रचलन अभी हुआ है, हम और हमारे बाप दादे कभी हनीमून मनाने घर के बाहर नहीं गए। घर के काम घर पर ही हुए और घर पर ही हम सब बड़े हुए। अब तो हनीमून में भी न हनी की मिठास हैं न मून की ठण्डक। अब तो हनीमून से आपस में गर्मागर्मी शुरु हो जाती है। हनी और मून अलग अलग छिटक जाते हैं।
हनीमून मनाकर भी कुछ नहीं होता है। बिना बच्चों के अनेक बाप मिल जाँयगे और बिना बाप के अनेक बच्चे पैदा हो रहे हैं। जो डाक्टरी नहीं जानते वे डाक्टरी कर रहे हैं। तो साईकिल का पंचर जोड़ते थे वे आदमी की शल्यक्रिया कर रहे हैं। बिना नौकरी वाले तो नैाकरी कर रहे है और अनेकों नौकरी पर होते हुए भी खुलेआम घूम रहे हैं, और नेतागिरी कर रहे हैं। इतने विरोधाभास हैं कि गिनाते गिनाते लोग विरोध करने लगेंगे।
भूत होता है या नहीं होता है, किसने देखा, लेकिन आप चर्चा छेडिए तो तीन चौथाई आबादी के लेाग भूत देखने की पुष्टि कर देंगे। मरे हुए आदमियों का तो अलग, जिन्दा आदमियों का भी भूत दिखता है। दुनियाँ में बिना शौहर के श्रीमतियाँ और बिना श्रीमतियों के श्रीमान हैं। शंका हो तो सिनेमा देख लीजिए जहाँ कुमारी कन्याएं ऐसे रोल करती है जो श्रीमतियाँ भी नहीं जानती हैं और न कर सकती हैं और अनेक श्रीमतियाँ कन्याओं का रोल करती हैं। बिना तालाब खुदे कागजों में तालाब बनते हैं, कुऐ खुदते हैं, पेड़ लगते है सिंचाई होताी है। बिना आग के भी लोग आग लगाते हैं। कुछ लोगों का काम ही है कि किसी के सुखी जीवन में आग लगाते फिरना या कि दो सम्प्रदायों के बीच साम्प्रदायिक आग लगाकर आपस में लड़ा देना। पानी में भी आग लगा दी जाती है, सन्तकवि ने लिखा है –
पानी पानी सबरौ जरि गयौ
मछली खेले फाग रे ।
अपने यहाँ बिना कालेज और स्कूल के पढ़ाई करे के इन्तजामात हैं। अखबार में विज्ञापन पढ़िए जिसमें घर बैठे इंजीनियरी, डाक्टरी, पत्रकारिता आदि की उपाधि प्राप्त करने का जिक्र और नुस्खा है।
बिना शिक्षक के स्कूल हैं और बिना स्कूल के शिक्षक भी हैं। जो नहीं हैं उनकी फाइलें तो अभी निपटने से रहीं, लेकिन जो जिन्दा है वे भी परेशान हैं। अत: बिना बादलों के बिजुरिया चमकना कोई बड़ी बात नहीं है और वो भी अपने देश में, जहाँ सभी बिजली गिराते हैं।