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हास्य व्यंग्य
दर्द आम आदमी का

दर्द आम आदमी का

कलायन पत्रिका

दर्द आम आदमी का


बसंत कुमार भट्ट

कुछ दिन पहले अचानक हमें अपनी बुध्दि पर फिर से तरस आने लगा। यह कोई नई बात नहीं थी। किसी मनोचिकित्सक की शरण जाना हमने जरुरी नहीं समझा। असल में साल छह महीने में ऐसा हो ही जाता है। अगर हमारी बुध्दि का यही हाल रहा तो तो आगे भी कभी-कभी ऐसा होले रहने की पूरी सम्भावना है।
जब भी राष्ट्रीय जीवन में गहराई से घुसे हुए किसी शब्द या मुहावरे का अर्थ हमारी पकड़ में आ जात है तो हम अपनी नादानी को कोसते हुए चुपचाप शर्मिंदा हो लेते हैं कि देखेा इतनी मामूली सी बात हमारी पकड़ से दूर रही। जनसेवा, आमूल परिवर्तन जैसे जुमलों के अर्थ खुलते समय हमारी जो हालत हुई थी वही हालत ‘आम आदमी का चेहरा’ पकड़ में आ जाने पर हुई।

उस शब्दशास्त्री की मर्मज्ञता पर हमारा सिर श्रध्दा से झुकता चला गया। जिसने पीड़ित आदमी, दुर्बल आदमी, सामान्य आदमी आदि-आदि सैंकडों-हजारों की भीड़ में से चुने भी तो, आम आदमी। जरा बढ़िया पके हुए रस से भरपूर आम की कल्पना कीजिए और तब उस आदमी की कल्पना कीजिए जिसमें राजनीतिबाजों और साहित्यसेवियों के दुबारा चुसे जाने की संभावनाएं मौजूद हों। आम आदमी का गुढ़ार्थ एक झटके में खुल पड़ेगा।

आम इस देश का राष्ट्रीय फल है। उसकी पैदाइश देश के कोने कोने में होती है। आम आदमी भी हमारे देश की जलवायु और मिट्टी में खूब पैदा होता है। आम आदमी के ठीक-ठीक आँकड़े अभी नहीं जुटाएँ गये हैं पर इतना तय है कि प्रत्येक सौ शिशुओं में पाँच केा छोड़ कर बाकी सब आम आदमी की नस्ल के होते हैं। बगीचों के मलिक पूरी निष्ठा से इस प्रयास में लगें हैं कि आमों की नस्ल में सुधार हो, उनकी उपज में दोगुनी- चौगुनी वृध्दि हो। मोहक, खुशबुदार, स्वादिष्ट आमों को चूसने का मौका विदेशवालों को भी मिल सके जिससे रुपये नही डालर कमाए जा सकें।

आम आदमी के रस से साहित्य और साहित्यसेवियों का भी पोषण हुआ है। प्रगतीवाद के जमाने से लेकर अब तक उनके चूसे जाने के खिलाफ सैकडों आन्दोलनों के माध्यम से टनों साहित्य उगला गया है। आम आदमी एक-एक आँसू की कीमत वसुलने के लिए इन बुध्दिजीवियों की का हर सिपाही मैदान में डटा हुआ है।

कैसी विडम्बना है कि आम आदमी में आम की ही सी जड़ता व्याप्त है। काश वह जान पाता कि इस देश के लेखक-साहित्यकार के मन में उसके चूसे जाने को लेकर कितना आक्रोश है, कैसी छटपटाहट है।

कुर्सी पर बैठा हुआ और मौका मिलते ही कुसीर् पर बैठे हुए को धकिया कर कुर्सी पर बैठने के लिए आतुर राजनेता भी आम आदमी की खुराक पर ही जिन्दा है। दोनों के बीच दासेंच और धक्का-मुक्की का एक ही मुद्दा है- आम आदमी। एक कहता है – अर नरभक्षी, तुने आम का सारा रस निचोंड कर तेांद भर ली है। मुझे भूखे पेट कुर्सी पर देखकर भी जलता है। दूसरा गुर्रा उठता है- चूप करो, रस तो रस छिलके तक चबा चुके हो।

आम की एक और बड़ी खसियत है। ऐसे मीठे-मीठे फल और काँटा एक भी नहीं। शरीफ इतना कि एक कंकडी उछाल दी और उसने खद को दूसरे के मूँह में टपका दिया। निरीह ऐसा कि चूस कर गुठली फेंक दी ओर एक नया पेड़ हाजिर।

आम आदमी में चूसे जाने की अपर सम्भावनाएं मौजूद हैं। अभी उसके छिलके और गुठलीयों के उपयोग पर भी उच्चस्तरीेय अध्ययन होना शेष है।

जब तक आम आदमी की नस्ल कायम है और जैसे कि उसका कायम रहना तय है जब तक साहित्य और राजनीति की ख्ेती करने वालों को कोई डर नहीं। उनके खेतों में आमों की रौनक कायम रहेगी।

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