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मथुरा कलौनी

मेरा नाम मथुरा दत्त कलौनी है। अपने नाम से मुझे बहुत प्यार है ऐसी बात नहीं है। फिर भी कोई मुझे गलत नाम से जाने, यह मैं पसंद नहीं करता। यह मेरा दुर्भाग्य रहा है कि लोग मुझे गलत नाम से ही बुलाते हैं। बचपन में मुझे मथुरिया नाम से बुलाया जाता था। मेरा बचपन पहाड़ों में बीता है। गाँव दो पहाड़ियों के बीच में है। शहरों की तरह यातायात के साधन वहाँ पर नहीं हैं और न ही फोन या मोबाइल जैसी कोई चीज। वहाँ पर आवाज का जोर चलता है। आसपास किसी गाँव के किसी आदमी को बुलाना हो तो अपने घर की खिड़की से सिर को निकाल कर फेफड़ों में हवा भर कर हाँक देनी पड़ती है। ऐसी आवाज को पहाड़ में धाध बोलते हैं। धाध कई प्रकार की होती है। एक धाध के सामने 100 किलोवाट का ट्रांसमीटर कुछ भी नहीं है। पहाड़ी स्थानों में मथुरिया प्रकार के नामों की तो नहीं पर लहराते नामों की बहुतायत है। ऐसे नाम वहाँ के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। बुलाने के लिए बस एक धाध लगानी होती है। मेरे घरवाले मुझे जब इस नाम से बुलाते थे तो पूरी पहाड़ी गूँज उठती थी। उनकी धाध इस पहाड़ से उस पहाड़ तथा इस पेड़ से उस पत्थर तक टकराती हुई उस कंदरा तक पहुँच जाती थी जहाँ उस समय मैं अपने किसी खेलकूद में मस्त होता था। मुझे यह मालूम हो जाता था कि बुलाने वाला कौन है और मुझे किस लिए बुलाया जा रहा है, खाना खाने के लिए या मार खाने के लिए।
बचपन में मुझे अपने बारे में सोचने का न तो अवसर था और न ही सोचने की कोई आवश्यकता। मैं अकेला तो नहीं था, मेरे जैसे नामों से पहाड़ गूँजते रहते थे। मथुरिया, परमियां, दम्मुवा इत्यादि। यदि किसी का नाम कुछ कलात्मक हो या फिसफिसा हो तो लोग सुविधाजनक नाम रख देते थे जैसे चोक्खा, बोक्का वगैरह। बचपन की बात तो बचपन के साथ गई। अब मैं अपने नाम के प्रति संवेदनशील हो गया हूँ। नहीं तो यह लेख लिखने की नौबत ही न आती। दमुवा या डोक्का से तो मैं बहुत अच्छा हूँ, फिर भी कभी बहुत विचित्र सा लगता है। एक बार मैं अपने एक शुद्ध मैदानी मित्र के साथ पहाड़ पहुँचा तो पहला बुजुर्ग जो सामने पड़ा उसने कहा – अरे मथुरिया कब आया तू। मेरा जो हाल हुआ सो हुआ मेरा मित्र भी सदमे से मरते मरते बचा।
पहाड़ से निकला तो लोग मेरे नाम के प्रति जिज्ञासु हुए। पूछने लगे कि मथुरा तो जगह का नाम है, आदमी का नाम कैसे हो गया। अब मैं क्या उत्तर देता। मैंने थोड़े ही अपना नाम रखा था। शहर में आने के बाद मैंने पाया कि लोग मथुरा नाम से बहुत परेशान हो जाते हैं। एक सज्जन हैं जो मुझे मथ्ुरा-द्वारका बुलाते हैं।
मेरे स्कूल के एक अध्यापक मेरे बीच के नाम से मुझे बुलाते थे यानी दत्त। जब वे सही मूड में बुलाते थे तो लगता था कि धत् बुला रहे हैं। यह मेरे सहपाठियों के लिए एक मजाक का विषय बन गया था। इस पर मेरा परेशान होना स्वाभाविक था। अध्यापक महोदय जब गुस्से से बुलाते थे तो लगता था कि किसी ने मेरी पीठ पर चाबुक मार दिया हो। उनके इस तरह बुलाने प्रभावित होकर मेरा एक मित्र मुझे मुँह से बुलाता ही न था, वह स्केल से जोर से बेंच में मार देता था। कहाँ रह गया दत्त और कहाँ यह स्केल से बेंच पीटना। मुझे आज तक पता नहीं चला कि महोदय मुझे दत्त क्यों पुकारते थे। मथुरा और कलौनी से उन्हें क्या चिढ़ थी।
कालेज में गया तो मैंने पाया कि वहाँ नाम से अधिक जात को महत्व दिया जाता है। मथुरा दत्त कलौनी से मैं एम.डी. कलौनी हो गया। पर मेरी परेशानी समाप्त नहीं हुई। अब कलौनी मुझे परेशान करने लगा था। लोग पूछने लगे कि कलौनी क्या है और क्यों है। कलवानी और कलौनी क्या एक ही हुए। कलवानी सिंधी होते हैं, कलौनी क्या हुए। कलौनी सिंधी नहीं हुए तो क्यों नहीं हुए।
अब मैं घबड़ा गया। मैंने सोचा क्यों न मैं अपना नाम दक्षिण भारतीय शैली में रखूँ। एम.वी. गोपाल, एक्स.वाई.जेड.रमेश, इन नामों में विशेषता यह होती है कि व्यक्ति का नाम तो अंत में होता है और जगह का नाम, पिता का नाम आदि आरंभ के अक्षरों में रहते हैं। इस तरह मेरा नाम बनता था डी.के.मथुरा यारों ने इसको और भी संक्षिप्त कर डी. के. एम कर दिया जो देखते न देखते डी. एम.के बन गया मैंने सोचा यही हाल रहा तो में शीघ्र ही ए. आई. डी. एम. के. में बदल जाऊँगा लिहाजा मैं अपने पुराने नाम पर वापस आ गया। इसके लिए जिन कठिनाइयों से गुजरना पड़ा वह मैं ही जानता हूँ।
उस बीच मुझे पहाड़ जाने का अवसर मिला। वहाँ मुझे अपने एक घुमक्कड़ चाचा मिले। उनके बारे में यह मशहूर है कि वे महीने में केवल एक दिन अपने घर में रहते हैं। उनका हुलिया यह है कि वह चश्मा नहीं पहनते तो ऋषि वाल्मीकि लगते। मैंने उनसे अपने नाम की व्याख्या पूछी।
उन्होंने इस तरह बताया।
मेरा नाम मथुरा क्यों पड़ा?
नक्षत्रों के अनुसार तुम्हारी राशि सिंह राशि है। ग्रहों का कुछ ऐसा चक्कर था कि तुम्हारे नाम का पहला अक्षर म होना अनिवार्य था। क्योंकि मथुरा का पहला अक्षर म है, पवित्र तीर्थ स्थान का भी नाम है, इसीलिए तुम्हारा यही नाम रखा गया। और यह बहुत ही उत्तम नाम है।
मथुरा के साथ दत्त क्यों जुड़ा हुआ है, जबकि मेरे चचेरे भाई का नाम परमानंद है?
हमारी कास्ट, उन्होंने कास्ट शब्द का ही इस्तेमाल किया था, में दत्त, नंद या शर्मा लगाया जा सकता है, और कुछ नहीं। उन्होंने मुझे पूरी छूट दी कि मैं चाहूँ तो कभी भी अपने दत्त को नंद या शर्मा में बदल सकता हूँ। मैंने तभी निश्चय कर लिया कि मैं दत्त को नहीं बदलूँगा। जब दत्त धत् में बदल सकता है तो निश्चय ही शर्मा और नंद भी किसी बेतुके छंद में बंद हो सकते हैं।
अंत में मैंने कलौनी के संबंध में पूछा था कि हम कलौनी क्यों हुए?
यह हमारी जात है उन्होंने कहा था। लेकिन यह विचित्र नाम कलौनी क्यों? इस प्रश्न पर वे बड़े प्रसन्न हुए। तीन चार घंटों तक उन्होंने मुझे हमारी वंशावली के बारे में बताया। उसका सारांश यह है कि कलौनियों के आदिपुरुष कैलाश में रहा करते थे। उन आदिपुरुष को उड़ने की कला मालूम थी। उनके पाँवों में पंख होते थे। केवल यही नहीं वह और भी कई अलौकिक कलाओं के ज्ञाता थे, इसीलिए हमारे वंश को कलावानों का वंश कहा गया। कलौनी कलावान का ही अपभ्रंश है।
यह सब सुनकर मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया था। उस समय जमीन पर मेरे पाँव नहीं पड़ रहे थे। शायद पूर्वजों का कुछ असर अब भी बाकी था। लेकिन हाय रे दुनिया! कैलाश के कलावानों के वंशज इस कलौनी का नाम लोगों की जबान में चढ़ता ही नहीं है। जब से मैंने लेखन के क्षेत्र में प्रवेश किया है अपना नाम आसान बनाने की गरज से बीच का दत्त गायब कर दिया है। हो सकता है ऐसा करने में मेरे स्कूल के अध्यापक का असर रहा हो और डर रहा हो कि कहीं संपादक भी धत् न कहने लगें।
आजकल मथुरा तो मथुरा ही है लेकिन कलौनी कभी कलौनी नहीं रहा। लोग कलानी से कोलवानी तक सब लिखते हैं लेकिन कलौनी कभी नहीं लिखते। अभी हाल में ही एक पत्रिका से एक पत्र मेरे नाम आया था, पत्र में लिखा था प्रिय कालोनी जी और लिफाफे में लिखा था श्री मथुरा केलानी।
एक और पत्रिका ने मेरी कहानी का अंग्रेजी में अनुवाद किया है। उसमें कहानी के साथ साथ मेरे नाम का भी विचित्र अंग्रेजीकरण हुआ है। कलौनी खिंचते सिकुड़ते कल्लोपी हो गया है। अंग्रेजी का जिक्र आया है तो कुछ और बता दूँ। जब मैं समझने लगता हूँ कि मेरे नाम को विकृत करने की जितनी संभावनाएँ हैं सब समाप्त हो चुकी हैं तो एक और विकृति देखने को मिल जाती है। कल्लोपी इसी का एक उदाहरण है। कलौनी में कभी दो एल मिलते हैं तो कभी दो एन। कभी एल के बाद दो इंच की एक वक्र रेखा रहती है जो आई सा वाई में समाप्त होती है। भला हो डाक व तार विभाग वालों का, वे जानते हैं कि बंगलौर में ऐसा विचित्र नाम केवल एक ही आदमी का है। पहला अक्षर क हो और अंतिम अक्षर ई की मात्रा में हो तो बीच में कुछ भी भरा हुआ क्यों न हो चिट्ठी मेरे पास पहुँच जाती है।
मेरी पत्नी को मथुरा देहाती प्रकार का नाम लगता है इसीलिए मुझे वह मेरी जाति के नाम से बुलाती है। गनीमत है वह कलौनी ही बुलाती है कुलानी या केलानी नहीं।
मेरे एक शुभचिंतक ने मुझे सलाह दी है कि मैं अपना दूसरा नामकरण कर लूँ और मथुरा को मोहन बना लूँ। अब मथुरा या मथुरिया के सामने मोहन क्या टिक पायेगा। मोहन नाम से तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने रसगुल्ले का रस कानों में डाल दिया हो। अपना मथुरा नाम ही ठीक है।
अपने देश में ही बुरा हाल है, विदेशों में लोग नाम के प्रति बड़े जागरूक रहते हैं। उच्चारण में उन्हें भले ही कष्ट हो लिखने में वे गलती नहीं करते। मेरे अमरीकी भाइयों ने मेरे नाम का संक्षिप्तीकरण कर दिया है, एमडीे। चलो एमडी ही सही। कमसेकम यह गलत तो नहीं है।
नाम पर अंग्रेजी में एक कहावत है जिसका अर्थ निकलता है कि नाम में क्या धरा है। जी हाँ कुछ नहीं धरा है, सिर्फ इसके कि किसी व्यक्ति को उसके नाम से ही जाना जाता है। लिफाफे में मेरी फोटो चिपकाने से लिफाफा मुझ तक कभी नहीं पहुँचेगा।