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कहानी- अन्तरा करवड़े

टेढ़ी मेढ़ी लकीरें खींचते आधा घण्टा बीत गया। घड़ी की ओर देखा। अभी तीन घण्टे बाकी थे आकाश को लौटने के लिये। घर का काम खत्म कर पिछले एक घण्टे से मैं टी वी के सामने बैठी थी। और कोई होता तो टी वी ऑन भी किया होता। मुझे इन फालतू सीरियल्स में कोई रस नहीं आता। पहली बात तो इतना ज्यादा रिश्तों का उलझाव देखकर ही उबकाई आने लगती है। फिर वक्त काटने के लिये और कोई जरिया भी तो नहीं है सिवाय खाली बैठे रहने के सिवाय।
अचिंत्य, मेरा बेटा। होस्टल में है। घर में और कोई नहीं है। सारी सोसाइटी मेरे भाग्य पर ईष्र्या करती है। कोई ”झंझट” जो नहीं है मेरे पीछे। जब जी चाहे घर को ताला लगाकर कहीं भी घूम आ सकती हूँ, शॉपिंग पर जा सकती हूँ। अच्छी खासी स्मॉल कार भी है मेरे लिये।
कितना गुस्सा हुए थे आकाश उस दिन मैंने कहा था। ”अचिंत्य अब एट्थ में आ गया है। काफी मैच्योर हो गया है। क्यों ना एक और इश्यू।”
”ये खाली बैठे बैठे कुछ भी फितूर पाल लेती हो तुम दिमाग में। आसान बात है क्या एक और बेबी मैनेज करना? जानती हो तुम कि कोई और है नहीं हमारा। फिर तुम्हारे चेक अप, तबियत, हॉस्पिटल वगैरह के लिये मुझे मेरे साल भर से तय प्रोग्राम्स डिस्टर्ब करने पड़ेंगे।”
कहने को कितना कुछ था मेरे पास। शारीरिक, मानसिक यंत्रणाओं से गुजरने को तैयार थी मैं। अपनी सोच की, अपनी अभिव्यक्ति की एक सृजनात्मक प्रतिकृति चाहती थी मैं। काश कि बच्चे पैदा करने के लिये मुझे किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता!
सारे कष्ट तो मुझे होने थे जिनका कुछ भी सोचे बगैर आकाश फैसला ले चुके थे।
मैं जब अपने आप में लौटी तो पाया कि खाली थाली के सामने बैठी हूँ। आकाश खाना खाकर टी वी के सामने बैठे थे। टी वी चालू था…
आकाश कहते तो हैं। फ्रेन्ड्स बनाया करो। किटी जॉईन करो। पार्टीज में जाओ। लेकिन तुममें वो चीज है ही नहीं। सुन सुन कर अब कोफ्त होने लगी है।
घूम फिरकर बस एक ही सवाल मन में गूँजता है। अब आगे क्या? कई बार तो दिमाग पर जोर ड़ालने पर भी आकाश की छवि ही याद नहीं आती। फिर मैं घबराकर फोटोफ्रेम पर नजर ड़ालती हूँ।
उस दिन डॉक्टर आनंद का फोन आया था आकाश के लिये। इन्हें साइकेट्रिस्ट के कन्सल्टंट की क्या जरूरत पड़ गई? कुछ बातें छुपकर सुन ली थी मैंने।
”एकदम कूल है डॉक्टर! कोई लाईफ ही नहीं बची। फुल्ली अनप्रिड़िक्टेबल। यू नो! कोई रिलेटिव भी नहीं है मेरा जो कंपनी दे सके।”
फिर कुछ दिनों के बाद अचानक अचिंत्य घर आ गया। आकाश को छुट्टियाँ मिली। हम हिल स्टेशन गए। वही रूटीन। सुबह उठकर ब्राश करने जैसा या फिर ड्राईविंग के जैसा लगता था। ऊपरी तौर पर कई चेन्जेस दिखाए मैंने लेकिन अंदर न जाने क्या ऐसा चिपक गया था जो लाख निकालो, निकलता ही नहीं था।
आकाश भी जैसे अपना सब कुछ कहीं बाँट आए थे। दो खोखली जिंदगियाँ एक साथ आखिर क्या कर सकती थीं?
”तुम ना आकाश! मुझे कभी नहीं समझ सकते।”
आखिरी दिन था छुट्टियों का। शाम की फ्लाईट थी। सुबह नाश्ता करते वक्त जब मेरे हिस्से खालीपन आया तब यही तो निकल पड़ा था मुँह से। आकाश देखते रहे थे मुझे।
”आर यू ओके सिमी?”
”मेरा नाम सिमी है ना! वो अरसे बाद आपके मुँह से सुना इसलिये…”
”लेटो-लेटो, आराम करो तुम।”
”डॉक्टर वो बहुत कोशिश कर रही है बट कहीं कोई गड़बड़ है। ठीक है, दिन में दो ना? मैं डोस डबल कर दूँगा। आई विल लेट यू नो। बाय”
डॉक्टर आनंद ही तो थे। आकाश मेरे लिये डॉक्टर आनंद से कन्सल्ट कर रहे है। कौन सी दवाई चल रही है मुझे जिसका डोस डबल होने वाला है?
खैर छोड़ो! ऐसे जाने कितने ही किस्से हो चुके हैं मेरे साथ। कहीं जाने के बहाने आकाश दस दस दिन सिटी में ही होते और मुझे अखबार पढ़कर मालुम होता। ऑग्र्यूमेंट करूँ तब तक उनके हिसाब से इतना वक्त गुजर चुका होता था, इतना कुछ घट चुका होता था कि मुझे हर वक्त पुराने इश्यूज को न घिसते रहने की हिदायत मिला करती थी।
फिर आई निर्मला। फिर साल भर का फॉरेन टूर। मुझे सिर्फ दो दिन पहले मालूम पड़ा था कि अब साल भर अकेली रहना है। ऑफिस से सैलरी चैक आ जाया करेगा।
आज हमें वेकेशन से लौटे दो महीने हो गये हैं। आकाश फिर तीन महीने के टूर पर बाहर गये हैं। मैं माता रूक्मिणीदेवी मानसिक रूग्णालय में भर्ती हूँ।
दिमाग पर बहुत जोर डालो तो याद आता है। आकाश डॉक्टर आनंद से मिलकर आए थे। और फिर अजीब सी शक्ल सूरत वाली दो बाईयाँ आकर मुझे ले गई थीं। मैंने कोई प्रतिरोध नहीं किया। उन्होंने साँस छोड़ते हुए कहा था, ”थैंक गॉड यह वॉयलेंट केस नहीं है।”
लेकिन मुझे समझ नहीं आया। इस हिसाब से तो पिछले पाँच सालों से मैं पागल ही कहलाऊँगी। पहले पाँच साल तक मैं भी हर चीज से प्रभावित होती थी। खुशी, दर्द, आँसू मुझे भी तो महसूस होते थे। लेकिन मेरी किसी भी पुकार का असर आकाश पर नहीं होता था। वो जैसा चाहते, मैं वैसा करती जाती। प्रतिरोध करना छोड़ दिया।
जब कोई सुनने वाला ही न हो तब दीवारों से बड़बड़ाने वाला भी पागल कहलाता है और चुपचाप खुद से बातें करने वाला भी। यही तो चाहते थे ना आकाश? मैंने सिर्फ उन्हीं का सुना। खुद को दफना दिया। फिर भी जाने क्या, कहाँ गलत हो ही गया। मुझे अपने दोस्त प्रशांत से बार बार मिलवाकर हमें घण्टे दो घण्टे अकेले छोड़ देने वाले आकाश शायद जानते नहीं थे कि मैं यह अच्छी तरह से जानती हूँ कि मैं किसी प्रशांत से नहीं डॉक्टर आनंद से बातें कर रही हूँ।
उस दिन भी सीढ़ियों से उतरते वक्त सिस्टर मेरा हाथ इतने जोर से पकड़े हुए थी! मैंने जरा छुड़ाने की कोशिश की तो वे चिल्ला पड़ी। ”शी इज गैटिंग वॉयलेंट! होल्ड़ हर प्रॉपरली।” और फिर मुझे और जोर से पकड़कर ले जाने लगे थे।
परसों आकाश आए थे। सूजा हुआ सा मुँह लेकर अचिंत्य भी आया था। और मेरी स्काय ब्ल्यू साड़ी में थी निर्मला। अचिंत्य छिटककर दूर जा खड़ा था। मुझे देखकर मुस्कुराया। सालों बाद उन जोड़ी भर आँखेां में अपना सा कुछ तैरता दिखाई दिया।
अचिंत्य ने भी निर्मला का कोई विरोध नहीं किया था। मेरा बेटा। बिल्कुल मेरे जैसा। मुझे अब कोई दर्द नहीं। मैं न सही मेरा अक्स है आकाश के पास। उसे जिंदगी भर का साथ निभाने को…