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मथुरा कलौनी की उत्तरांचल से संबंधित कहानियाँ

मथुरा कलौनी की उत्तरांचल से संबंधित कहानियाँ

कलायन पत्रिका

मथुरा कलौनी की उत्तरांचल से संबंधित कहानियाँ


मेरे गांव की लड़की

“मैंने हंसी के साथ अच्छा नहीं किया भास्कर। उसके पास जाऊँ भी तो कैसे?”

“कैसे जाऊँ ! यह तुम क्या कह रहे हो नरेन दा? वह पराई थोडे ही है? तुम्हारे गाँव लड़की है। अपनों के पास जाने के लिए भी कोई ऐसा सोचता है भला!”

…. चाहे कैसी ही परिस्थितियाँ क्यों न आयें, रहेगी वह सदा उसके गाँव की लड़की। सरला चाची की बेटी।

कब होगी भेंट

गजेन्द्र और रुकुमा का प्यार कुमाऊँकी प्रेमकथा का एकदम
आधुनिक और आकर्षक संस्करण था। कैसा था उनका प्रेम?

दोनों को क्या-क्या कष्ट सहने पड़े? बिछुड़ जाने के बाद क्या वे मिल पाये?
एक बेहद दिलचस्प प्रेम कहानी।

बिलौरी की धूप

हे बाबुल मुझे छाना बिलौरी मत ब्याहना क्यों कि सुना है वहाँ की धूप बड़ी तेज होती है।……..

‘मैं आत्मनिर्भर पहले भी थी, चंदर। पर अपने जीवन साथी को अपने जीवन की बागडोर सौंपने में भी एक सुख होता है। तुमने वह सुख मुझसे छीना है चंदर।’…….

सुबह का भूला

वह धारे पर जब भी जाती, एक टीस उभरती थी। यहीं उसने लापता होने वाले को पहली बार अच्छी तरह से देखा था …….

एक सुबह को ठीक उसी जगह उसने एक अपरिचित को लेटे हुए पाया। पास जा कर देखा तो जी धक् से रह गया। वही चेहरा था। युद्ध की विभीषिका में न जाने क्या क्या झेलना पड़ा हो……

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एक झूठ

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