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मोहिनी मूरत

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कलायन पत्रिका

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कहानी – रामेश्वर उपाध्याय

 

”ऐ पिंकू मुझे छुट्टी मिल गई। पूरे एक महीने की।”

जहाज के डैक पर आते ही उसने चिल्ला कर कहा। उसकी खुशी रोके न रुक रही थी।

मानव का चेहरा मुरझा गया। जाहिर है सिर्फ उसी की छुट्टी मंजूर हुई है। दोनों एक साथ घर नहीं जा सकेंगे। फिर भी दोस्त की खुशी में शामिल होना चाहिए। काफी जोश-सा उड़ेलते हुए वह चहक उठा-

”कांग्रेेट्स! भाई तुम्हें ही सही। बधाई।”

”अभी एडमिरल सर के सामने पेशी थी। कह रहे थे इस साल सिर्फ दस कैडेट्स को लीव ग्रान्ट कर सकते हैं। इससे ज्यादा नहीं। हाई सी पर एक्सरसाइज है, इसी महीने।”

मानव तो पिछली एक्सरसाइज पर भी नहीं जा सका था। अत: इस साल उसे छुट्टी मिलनी भी नहीं थी। पिंकू और मानव दिल्ली से ही सहपाठी थे। नेवी में एक साथ सेलेक्ट हुए थे। तब दोनों सबसे छोटे थे यानी सोलहवाँ अभी पूरा हुआ था।

”कोई बात नहीं। मगर तुम मेरे घर होकर आना।” मानव कहने लगा। ”सबसे बात कर आओगे, और फिर मुझे सुनाओगे तो लगेगा जैसे कि मैं खुद ही मिल कर आया हूँ।”

”श्योर, एक बार सब से मिल कर आऊँगा।” कहते हुए पिंकू यादों में खोने लगा था। कितनी ही बार वे अपने अपने घर की बातें परस्पर सुनाया करते हैं। बिना देखे ही सभी सदस्यों को पहचानता है पिंकू। सबके नाम, उƒा और स्वभाव सब बातों का पता हो गया है उसे।

मगर दिल्ली में आते ही, पिंकू कितना तो व्यस्त हो गया था। मन था, किन्तु समय नहीं निकाल पा रहा था। और छुट्टियां थीं कि खत्म होने को आ गई थीं। आखिरकार लौटने के दिन से दो दिन पहले वह गोल मार्केट पहुँचा। वहीं से मानव का मकान उसने पहचान लिया। बिड़ला मन्दिर वाली सड़क पर नम्बर पढ़ा, ठीक था। उसने काल बैल पर उँगली रखी

”पापाजी, मैं पिंकू, नेवी से’ उसने चहककर कहा- मानव तो पापाजी ही कहता है न अपने पिता को। उसे याद था

”आओ बेटे! चिठ्ठी में लिखा था कि तुम आओगे।” इतना बुझा हुआ स्वर तो नहीं होना चाहिए। मानव तो कहता था बिना हँसे पापाजी बात ही नहीं करते।

पैर छूकर पिंकू सीधा भी खड़ा नहीं हो सका था कि झाई निकल आयी। उनके पैर छुए मगर कोई आशीर्वाद नहीं। पिंकू को लगा कि काफी ठंडा स्वागत है। इसकी तो उम्मीद न थी।

स्वर में कुछ जोश, कुछ चहक कर पिंकू ने कहना शुरू किया – ”पापाजी, हम दोनों साथ-साथ आने वाले थे। मगर मानव को छुट्टी मिली ही नहीं। वह वैसे सबसे होशियार है। बैस्ट कैंडेट अवार्ड मिला है, उसे इस बार भी।”

पिंकू ने यह बात जरा जोर देकर कहीं। इसकी तो अच्छी प्रतिक्रिया होगी। मगर इस पर भी पापाजी ने सिर्फ ”हूँ… ” कहा था। और झाई ने तो मुँह ही दूसरी ओर कर लिया था। वह तो बन्द हुए टीवी को ही देखती चली जा रही थी।

”पिंकू ने शिप की बात शुरू की। फिर शिपयार्ड का वह रोचक वृतान्त सुनाया जब वे दोनेां मित्र समुद्र में कूद पड़े थे। सर ने डाँटा था कि दूसरे की जान बचाने को तुम्हें इतना रिस्क नहीं लेना था। फिर भी मानव को ‘सी’ मेडिल मिला। बहादुरी पर” पिंकू ने कहा।

इतना चहक कर बोलने पर भी मानव के माता-पिता बिल्कुल खुश नहीं जान पड़े। मानव तो कहा करता है कि उसके पेरेन्ट्स बहुत ख्ुश मिजाज हैं ऐसी होती है खुश मिजाजी? पिंकू ने एक बार फिर प्रयास किया। शायद इससे कुछ वातावरण बदले। उसने आस्ट्रेलिया ट्रिप की बात शुरू कर दी।

 

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