Home
शीत लहर
शीत लहर – 2

शीत लहर – 2

कलायन पत्रिका


शीत लहर
महा वीर शर्मा

हिमालय की पर्वत-शृंखलाओं से शिशिर ॠतु की डसने वाली बर्फीली शीत लहर, गगनचुम्बी अट्टालिकाओं से टक्कर खाती हुई, हार मानकर खिसियाई बिल्ली की तरह इन जीवित लाशांे पर टूट पड़ी। इन निरीह निस्सहाय अभागांे ने बचाव के लिए कुछ यत्न करने का प्रयास किया जैसे कँपकँपी, चिथड़े, कोई फटी पुरानी गुदड़ी या फिर एक दूसरे से सटकर बैठ जाना। इससे अधिक वे कर भी क्या सकते थे? सभी के दाँत ठण्ड से कटकटा रहे थे जैसे सर्दी ध्वनि का रूप लेकर अपने प्रकोप की घोषणा कर रही हो। कुछ शोहदे बिगड़ैल छोकरे राह चलते हुए छींटाकशी से अपना ओछापन दिखाने से नहीं मानते – “ऐसा लगता है जैसे मृदंग या पखावज पर कोई ताल पर बज रही है।’
इन ठिठुरे हुए बेचारांे के कानांे के पर्दे सर्दी के कारण जम चुके हैं। कुछ सुन नहीं पाते कि ये छोकरे क्या कुछ कहकर हँसते हुए चले गए। यदि सुन भी लेते तो क्या करते? बस अपने भाग्य को कोस कर मन मसोस कर रह जाते।
झबिया की गोद मंे ललुआ ठिठुर कर अकड़ सा गया है। ना ठीक तरह से रो पाता है, ना ही ज्यादा हिल-डुल पाता है। माँ उसे सर्दी से बचाने के लिए अपने वक्ष का कवच देकर जोर से चिपका लेती है। ललुआ माँ के दूध-रहित स्तनांे को काटे जा रहा है। बड़ी बड़ी बिल्डिंगांे से हार कर, बड़े आवेग से एक बार फिर यह बर्फानी हवा का झांेका इन पराजित निहत्थांे पर भीषण प्रहार कर अपनी खीज उतार रहा है।
एक गाड़ीं इस हवा के झांेके की तीव्र गति को पछाड़ती हुई सड़क पर पड़े हुए बर्फीले पानी पर से सरसराती हुई चली जाती है। कार के पहियांे से उछलती हुई छुरी की तरह बर्फीले पानी की बौछारांे से इन लोगांे के दाँतों की कटकटाहट भयंकर नाद का रूप ले लेती है। ललुआ ने अकस्मात ही झबिया के वक्ष को काटना चूसना बंद कर दिया। आँखें खुली पड़ी हैं माँ की ओर टिकी हुई हैं जैसे पूछ रहा हो,

“माँ मुझे क्यांे पैदा किया था?’

झबिया उसे हिलाती-डुलाती है किंतु ललुआ के शरीर मंे कोई हरकत नहीं है। वह दहाड़ कर चीख उठती है। सभी की आँखें उसकी ओर घूम जाती हैं। बोलना चाहते हैं पर बोलने की शक्ति तो शीत-लहर ने छीन ली है।

पीछे 

Powered By Indic IME