बहुत ही व्यस्त हूँ मैं आजकल आना नहीं होगा,
तुम्हारे साथ कुछ पल बैठ बतियाना नहीं होगा।
न ले लो अन्यथा इनको कहीं, मुझको यही डर है,
सरल मेरे लिए आक्रोश सह पाना नहीं होगा।
न टूटें तार वीणा के जुड़ाये यत्न से हमने,
अकेले बैठ कर तट पर गीत दुहराना नहीं होगा।
चल रही सृष्टि अब तक आपसी विश्वास पर ही तो,
प्रतीक्षा का सलौना सौख्य अनजाना नहीं होगा।
लहर से पूछिए क्योें आ रही वह कूल पर फिर फिर,
समझकर यदि चले यह बात पछताना नहीं होगा।
अनुष्टुप आदि कवि के कंठ से क्यों फूट निकला था,
विरह से दग्ध मन को अर्थ समझाना नहीं होगा।
कवि – डॉ दयाकृष्ण विजयवर्गीय ”विजय”