माँ से बढ़कर न रिश्ता कोई
निरछल, निष्कपट है रिश्ता माँ का
माँ इन्सां की है पहचान
माँ सृष्टि का है वरदान
माँ से बढ़कर न रिश्ता कोई
जन्म देती वो शिशु को प्रसव पीड़ा सहती है
फूलों की सेज सुला उसको
खुद काटों पर सोती है
माँ से बढ़कर न रिश्ता कोई
सीने से लगा उसको
हर व्यथा को हर देती है
अमिट ममता की छाँव तले
सुनहरे सपनों में पहुँचा देती है
माँ से बढ़कर न रिश्ता कोई
सुबह से ले शाम ढ़ले तक
अथक परिश्रम करती है
है वो जीवन का आधार
माँ होती बहुत महान
माँ से बढ़कर न रिश्ता कोई
कवयत्री – सुषमा अग्रवाल