माँ

कलायन पत्रिका

माँ


माँ से बढ़कर न रिश्ता कोई
निरछल, निष्कपट है रिश्ता माँ का
माँ इन्सां की है पहचान
माँ सृष्टि का है वरदान
माँ से बढ़कर न रिश्ता कोई

जन्म देती वो शिशु को प्रसव पीड़ा सहती है
फूलों की सेज सुला उसको
खुद काटों पर सोती है

माँ से बढ़कर न रिश्ता कोई

सीने से लगा उसको
हर व्यथा को हर देती है
अमिट ममता की छाँव तले
सुनहरे सपनों में पहुँचा देती है

माँ से बढ़कर न रिश्ता कोई

सुबह से ले शाम ढ़ले तक
अथक परिश्रम करती है
है वो जीवन का आधार
माँ होती बहुत महान

माँ से बढ़कर न रिश्ता कोई

कवयत्री – सुषमा अग्रवाल

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