ट्रैक सूट
कलायन पत्रिका
एक व्यंग्य रचना
सुजाता शुक्ला
आजकल बाजार में इतने सुंदर-सुदर ट्रैक सूट मिलने लगे हैं कि मत पूछिए! मैचिंग स्ट्राइप्स, कंट्राÏस्टग स्ट्राइप्स और रंग इतने लुभावने कि हरेक सूट पर दिल आ जाता है। मैं न कोई खिलाड़ी हूँ और न ही मुझे किसी खेल में रुचि है। दौड़ने और टहलने में भी मुझे कोई रुचि नहीं है। फिर भी मैं अपना मोह संवरण नहीं कर पाया और एक दिन एक ट्रैक सूट खरीद कर घर ले आया। ले तो आया, पर उसको पहन कर न तो मैं किसी के घर जा सकता था और न ही उसे पहन कर सो सकता था, इसलिए उसका इस्तेमाल करने के लिए मैंने प्रात: भ्रमण में जाने का निर्णय लिया। दो-तीन प्रयत्नों के बाद एक दिन मैं ठीक समय पर उठ ही गया और ट्रैक सूट पहन कर प्रात:भ्रमण के लिए निकला। जिस प्रकार सिर मुड़ाते ही किसी के सिर पर ओले गिरे थे, उसी प्रकार प्रात:भ्रमण को निकलते ही मेरी मुठभेड़ देविका से हुई।
देविका नियमित रूप से सुबह दौड़ने वालों में से एक है। उसने मुझे देखा तो सीधे मेरे पास चली आई। उसको अनदेखा कर के वहाँ से बच निकलना असंभव था। उसने आते ही कहा,
“वाह महेश, आखिर तुमने शुरू कर ही दिया सुबह दौड़ना।”
“हाँ आँ आँ ।” मैने कहा।
“तब मैंने कहा था तो तुम अड़ियल टट्टू की तरह की तरह अड़ गए थे।” उसने कहा।
“हाँ आँ आँ।” मैने कहा।
“क्या हाँ आँ आँ लगा रखी है? मेरे सामने कैसी झिझक? मैं तो तुम्हारी शुभचिंतक हूँ।” उसने कहा।
“हाँ आँ आँ ।” मैने कहा।
“रियली महेश!” उसने अपना सिर हिलाते हुए कहा।*
उसके इस तरह सिर हिलाने पर मैं समझा, अब वह मुझसे निराश हो कर अपने रास्ते चली जाएगी। पर मेरी ऐसी किस्मत कहाँ कि वह चली जाती! अपनी कमर पर हाथ रख कर वह मेरे सामने हो गई और जैसे छोटे बच्चे से पूछते हैं वेसे ही उसने पूछा,
“आजकल क्या कर रहे हो?”
उसके सामने बड़े बड़ों की बोलती बंद हो जाती हैे मेरी क्या बिसात! “क… कुछ नहीं।” मैंने कहा।
उसके सामने बड़े बड़ों की बोलती बंद हो जाती हैे मेरी क्या बिसात! “क… कुछ नहीं।” मैंने कहा।
” गॉल्फ?” मैंने पूछा। उसकी विचारधारा मेरी समझ में नहीं आई।
“आजकल में हर इतवार को गॉल्फ खेलने जाती हूँ। तुम चाहो तो मेरे साथ चल सकते हो।” उसने कहा।
“नहीं… नहीं… थैक्यू… पर नहीं।” मैंने जल्दी से कहा।
“अरे इसमें हिचकने की क्या बात है। मुझसे कैसी हिचक? देखो, मैं अगले इतवार को तुम्हें लेने आऊँगी। तैयार रहना, ठीक 10 बजे।” उसने कहा।
“नहीं-नहीं देविका।” मैंने विरोध करने का प्रयत्न किया।
“बस-बस अब इस संबंध में कुछ कहने की जरूरत नहीं है। अभी चलो, तुम्हारे घर की ओर दौड़ लगाते हैं। मेरे लिए चक्कर लंबा पड़ेगा, पर कोई बात नहीं है। मैं तुम्हें पहँुचा कर चल दूँगी। नहीं तो देर हो जाएगी। आज मेरा मेरा मैच है न, टेनिस का, अभी आधे घंटे बाद।”
और क्या करता? उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगा।
हाँफते-हाँफते घर पहुँचा।
देविका एक बहुत सक्रिय और तंदुरुस्त लड़की है। लाइफबॉय साबुन से नहाती है या नहीं, यह तो मुझे नहीं मालूम है, पर वह तंदुरुस्ती का जीता-जागता विज्ञापन है। जीता-जागता की जगह दौड़ता-भागता विज्ञापन कहना चाहिए। बैडमिंटन की वह स्टेट चैम्पियन है। शौक के तौर पर वह सभी खेल खेलती है। रूप के मामले में भी वह ठीक-ठाक है। तीन साल पहले हम लोग एक पिकनिक में गए थे। वहीं पिकनिक की मस्ती में एक असावधान क्षण में मैं उससे कह बैठा कि मैं उससे प्यार करता हूँ। बस देविका ने मेरा जीवन अपने हाथ में ले लिया।
मेरी दिनचर्या में हस्तक्षेप किया गया। मेरे खान-पान पर पाबंदी लगाई गई। एक वाक्य में कहूँ तो उसने मेरा जीना दूभर कर दिया
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