गर्जना करता भयंकर आ रहा तूफान
लेाक अधरों से उड़ी कर्पूर सी मुस्कान।
रच रहीं लहरें सुनामी
बढ़ प्रलय का दृश्य
लिख रहा दुर्भाग्य भू पर
लहलहाता शस्य;
काल कानों में रहा कह नाश का आख्यान।
लोक अधरों से उड़ी कर्पूर सी मुस्कान।
जड़ किवाड़ों को खड़ा
संस्तब्ध सा व्यापार,
भीति सुरसा सा बनाये
राक्षसी आकार;
स्वप्न चिन्ता की नदी में डूब खोते प्राण।
लोक अधरों से उड़ी कर्पूर सी मुस्कान।
मृत्यु का ताण्डव लिखेंगे
शेष सीपी शंख
गगन नापेंगे उड़े
परछाइयों के पंख;
प्रेम पत्रों को पढ़ेगा डूब कर अवसान।
लोक अधरों से उड़ी कर्पूर सी मुस्कान।