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सुनामी – गीत

सुनामी – गीत

कलायन पत्रिका

सुनामी – गीत


डॉ. दयाकृष्ण विजयवर्गीय ‘विजय”

गर्जना करता भयंकर आ रहा तूफान
लेाक अधरों से उड़ी कर्पूर सी मुस्कान।

रच रहीं लहरें सुनामी
बढ़ प्रलय का दृश्य
लिख रहा दुर्भाग्य भू पर
लहलहाता शस्य;

काल कानों में रहा कह नाश का आख्यान।
लोक अधरों से उड़ी कर्पूर सी मुस्कान।

जड़ किवाड़ों को खड़ा
संस्तब्ध सा व्यापार,
भीति सुरसा सा बनाये
राक्षसी आकार;

स्वप्न चिन्ता की नदी में डूब खोते प्राण।
लोक अधरों से उड़ी कर्पूर सी मुस्कान।

मृत्यु का ताण्डव लिखेंगे
शेष सीपी शंख
गगन नापेंगे उड़े
परछाइयों के पंख;

प्रेम पत्रों को पढ़ेगा डूब कर अवसान।
लोक अधरों से उड़ी कर्पूर सी मुस्कान।

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