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कविता
उलझन

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कलायन पत्रिका

उलझन


उलझन

1. उलझन

इस से बढ़ कर क्या हो उलझन
जान से प्यारा जान का दुश्मन।
उस ने जवानी आते आते
तड़पाने का सीख लिया फ़न।
आँखों में तस्वीर है उस की
उसको पुकारे दिल की धड़कन।
हम को घेर रहे अँधेरे
चाँद न उतरा अपने आँगन।
मिल जाए आँखों को ठंडक
हो जाए गर उस के दर्शन।
रूठ के जाने वाले आ जा
बीत गए हैं कितने सावन।
हर पल दिल ए गुल पे भारी
बिन इस के बेकार है जीवन।

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