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कलायन पत्रिका

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मधुर शास्त्री

ओ शब्दधर!
शब्द के अर्थ सारे-
पुराने पड़े,
कुछ नया सोच तू-
आज के शब्दधर!

जिन्दगी बेखबर हो गई इस तरह-
मौत उसके लिए रोज का खेल है,
आदमी आदमी में बडे़ फासले-
बुद्धि का ह्मदय से कहाँ मेल है,
सत्य के सब रूप,
ठगे से खड़े,
अब नई गूँज दे,
सत्य के पक्षधर
कुछ नया सोच तू-
आज के शब्दधर!

भीड़ में रास्ते खो गए इस तरह-
दीखती हर तरफ मंजिलें, मंजिलें,
आँधियों में बिके गंध के दूत सब-
फूल बन कर खिलें तो कहाँ हम खिलें,
ये हरे पेड़ सब-
लौह जैसे कड़े,
मत गिरा बिजलियाँ, प्यार के वारिधर
कुछ नया सोच तू-
आज के शब्दधर!

दूर तक हैं अँधेरे नहीं रोशनी,
स्वप्न आये मगर, अश्रु ने धो दिए,
सोचते थे अमृत फल मिलेगा ‘मधुर’
बीज विष के मगर किसी ने बो दिए,
सिर कटी देह से-
सब परस्पर लडे़,
एक जीवन नया फूँक दे प्राणधर
कुछ नया सोच तू-
आज के शब्दधर!

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