एक
दरपन कहाँ गइल
माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल
खुशबू भरल सनेह के उपवन कहाँ गइल
भउजी हो, तहरा गाँव के मधुवन कहाँ गइल
खुलके मिले-जुले के लकम अब त ना रहल
विश्वास, नेह, प्रेम-भरल मन कहाँ गइल
हर बात पर जे रोज कहे दोस्त हम हईं
हमके डुबाके आज ऊ आपन कहाँ गइल
बरिसत रहे जे आँख से हमरा बदे कबो
आखिर ऊ इन्तजार के सावन कहाँ गइल
दो
हादसा कुछ एह तरे के हो गइल
लोग दुश्मन अब घरे के हो गइल
रोप गइलें बीज बाबा बैर के
सात पुश्तन तक लड़े के हो गइल
अब गिलहरी ना रही एह गाँछ पर
वक्त पतइन के झरे के हो गइल
जब से लाठी गाँव के मुखिया बनल
साँढ़ के छुट्टा चरे के हो गइल
आँख में कुछ फिर उठल बा लालसा
आँख में कुछ फिर मरे के हो गइल
प्यार के अब जुर्म चाहे जे करे
नाम ‘भावुक’ के धरे के हो गइल
तीन
दीप जरावल जाये
अबकी दियरी के परब अइसे मनावल जाये
मन के अँगना में एगो दीप जरावल जाये
रोशनी गाँव में, दिल्ली से ले आवल जाये
कैद सूरज के अब आजाद करावल जाये
हिन्दू,मुसलिम ना, ईसाई ना, सिक्ख,ए भाई
अपना औलाद के इंसान बनावल जाये
जेमें भगवान, खुदा, गौड सभे साथ रहे
एह तरह के एगो देवास बनावल जाये
रोज़ दियरी बा कहीं, रोज़ कहीं भूखमरी
काश ! दुनिया से विषमता के मिटावल जाये
सूप, चलनी के पटकला से भला का होई
श्रम के लाठी से दलिद्दर के भगावल जाये
लाख रस्ता हो कठिन, लाख दूर मंजिल हो
आस के फूल हीं आँखिन मे उगावल जाये
जेकरा यादन में जले दिल के दिया के बाती
ए सखी, अब ओही ‘भावुक’ के बोलावल जाये
इस कविता का मनोज ‘भावुक’ द्वारा हिन्दी रुपांतर
दीप जलाया जाये
दीप जलाया जाये अबकी दीपों का पर्व ऐसे मनाया जाये
मन के आँगन में भी एक दीप जलाया जाये
रोशनी गाँव में, दिल्ली से ले आया जाये
कैद सूरज को अब आजाद कराया जाये
हिन्दू, मुसलिम न ईसाई न सिक्ख, ऐ भाई
अपनी औलाद को इंसान बनाया जाये
जिसमें भगवान, खुदा, गौड सभी साथ रहें
इस तरह का कोई देवास बनाया जाये
रोज दियरी है कहीं, रोज़ कहीं भूखमरी
काश दुनिया से विषमता को मिटाया जाये
सूप, चलनी को पटकने से भला क्या होगा
श्रम की लाठी से दरिद्दर को भगाया जाये
लाख रस्ता हो कठिन, लाख दूर मंजिल हो,
आस का फूल हीं आँखों में उगाया जाये
जिनकी यादों में जले दिल के दिये की बाती
ए सखी, अब उसी ‘भावुक’ को बुलाया जाये
यह तीन कविताएँ मनोज ‘भावुक’ के पुरस्कृत भोजपुरी गजल संग्रह ‘तस्वीर जिन्दगी के” से ली गर्इं हैं।