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किस मुँह से !
किस मुँह से ! – 2

किस मुँह से ! – 2

कलायन पत्रिका


किस मुँह से !

के. पी. सक्सेना ‘दूसरे’

मैं समझ गया कि सब रुपये न देने से नाराज हैं। मुझे लगा कि इस माहौल में और रुकने का कोई मतलब नहीं है अत: बोला “भइया, मैं आया तो था यह सोचकर कि कुछ दिन बाबू जी के पास रुकूँगा लेकिन अब पैसों का इंतजाम करना भी जरूरी है अत: मैं कल दिन की ट्रेन से निकल जाता हूँ।” भइया, “जैसी तुम्हारी इच्छा” कहकर चुप हो गए।

गर्मी के दिन थे। हम तीनों भाई आँगन में लेटे थे। कोई किसी से कुछ बोल नहीं पा रहा था पर ऐसा लग रहा था कि सब एक दूसरे के मन की बात समझ रहे हैं। भौजी, जो पहले घर आने पर मुझे इतना छेड़ती थीं, लगता था इस बार मुँह में दही जमा कर बैठ गई हैं।

सुबह, अभी उसकी आँख ठीक से खुली भी नहीं थी कि छोटे की आवाज सुनाई पड़ी,

“भइया, मैं बाबूजी को तहसील ले जा रहा हूँ जाँच के लिए।”
“अरे अकेले कैसे ले जाएगा?” भइया एकदम चौंक गए।

“अकेले नहीं भइया, वो रमेसवा है ना! अपना ट्रक्टर ले जा रहा है। नब्बन, और बबलू भी हैं।”

“और पइसा, उसका का इंतजाम है?” भइया बोले। मैं अभी भी आँखें बंद किए पड़ा रहा।

“कुछ होइ गा है कुछ करब। अब ट्रैक्टर के जुगाड़ होइगा है तो हम सोचित है कि देर न कीन जाय।”

मैं समझ गया कि शाम को कोई ग्राहक हाथ लग गया होगा। घर में हलचल होने लगी थी अत: मुझे लगा कि शायद भइया ने हाँ कर दी। मैं उठ बैठा। हम तीनों ने बाबूजी को ट्राली में लेटाया। वहाँ छोटू के दो तीन दोस्त पहले से मौजूद थे। मैंने छोटू से पूछा, “मैं साथ चलूँ?”

“तुम फालतू परेशान होगे। करना तो सब डाक्टर को है और मदद के लिए ये सब घर के ही तो हैं।” भइया ने छोटू के दोस्तों की ओर इशारा करते हुए मुझे धर्मसंकट से उबारा।

“छोटू तू खर्च के लिए थोड़ा बहुत रख ले, मैं लाता हूं।” मैं अंदर जाने लगा तो उसने रोक लिया, बोला “कुछ इंतजाम हो गया है। फिर आपने कल बताया भी तो था कि कैसे अचानक आना पड़ा। हमारी चिंता छोड़कर आप ड्यूटी पर जाएँ, मैं आपको खबर करूँगा।” ट्रैक्टर चल पड़ा था।

मेरी ट्रेन 11 बजे थी। गाँव से स्टेशन दूर था। पैदल रास्ता। मैं बाबूजी के कमरे में पैर छूने के लिए घुसा तो बिस्तर खाली देखकर चौंक गया। फिर सुबह की बात याद आते ही एक हूक सी उठी। कमरे से बाहर निकलने को हुआ तो सामने ही उदास आँखें लिए भइया और उनके पीछे भाभी खड़ी थीं।

मुझे, मेरा मन कुछ कचोटने लगा। मैंने धीरे से अंदर वाली जेब टटोली जिसमें पत्नी के दिए हुए पाँच हजार रुपये रखे थे। लेकिन यह क्या! रुपये नदारद थे। मैं समझ गया निश्चय ही यह छोटू की करामात थी। अब पूछता भी तो किससे और किस मुँह से?

रास्ते भर सोचता रहा कि पत्नी का सामना कैसे करूँगा?

(कहानी में कुछ वाक्य बघेलखंडी बोली के हैं, जिसका प्रयोग मध्यप्रदेश के रीवा, सतना, शहडोल, सीधी आदि क्षेत्रों में होता है।)

समाप्त                                                                                                                                               पीछे

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