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आतंकवादी की माशूका | मथुरा कलौनीे

आतंकवादी की माशूका | मथुरा कलौनीे

कलायन पत्रिका

आतंकवादी की माशूका 


मथुरा कलौनीे

हुस्न है अदा भी है
आशिक़ ही दहशतोजुनूं को माशूक बनाए हुए हैं
सूरज औ चाँद की रोशनी भी क्या करे
फ़ख्र स़े मुँह में वे कालिख लगाए हुए हैं।
हम अब भी बाम पे जाते हैं,
चेहरे से नकाब सरकाते हैं।
देखने की ताब वो कहाँ से लाएँ,
जो सियाह रातों में चेहरा छुपाते हैं।

दिल ही नहीं देता है सदा,
नफरत की सियाही छाई हुई है।
जानलेवा तो अब भी है अदा,
पर मुहब्बत ही मुरझाई हुई है।

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