छोटे छोटे टेढे़ मेढे़
डग भरते हैं दिल में अक्सर
कुछ भूले कुछ बिसरे
सूखे से कुछ सवाल
प्यास स्याही की बन कर तो
बातें कुछ अधूरी सी
टुकड़ों में बँटे पल से कुछ
अहसास चिंदी चिंदी से
फिर शाम रूठी रूठी सी
हर बात लगती झूठी सी
जम गए अँधेरे मन के
मरमरी उजाले पर
कौन जाने पुरवाई ने
दिल को यों भरमा दिया
फिर छिड़ा तूफान सा बन
विचारों का बवाल
और घुमड़ते रह गए वो
सूखे से कुछ सवाल