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कविता
याद करना जीजा होली

याद करना जीजा होली

कलायन पत्रिका

याद करना जीजा होली


आनंद सिह रावत

होली आती जीजा आते ऐसा होता था हर साल
हर होली में संग जीजी के सीधे आते थे ससुराल
आए जीजा अचकन पहने और पजामा चूड़ीदार
इस होली में मजा चखायें सबने ऐसा किया विचार

भ्ंाग घांेटकर उसमें डाली दूध मलाई लच्छेदार
पिसे हुये बदाम पड़े थे देखे जो बस टपके लार

सभी सालियाँ हँसती गाती लायीं भ्ंाग मलाईदार
बढ़िया चीज बनी जीजाजी बोलीं आँखें करके चार

बैठ गटागट पीते जाते जीजाजी है बढ़िया भ्ंाग
धीरे धीरे आँखें झपकीं ढीले हुये अंग प्रत्यंग

अब जीजा के वस्त्र हरण का शुरू हुआ अद्भुद अभियान
धीरे धीरे वस्त्र उतारे बचे जाँघिया और बनियान

कैंची लेकर साफ कर दिये उनके आधे सिर के बाल
मूँंछ भी आधी काटी-पीटी गाल कर दिये बिल्कुल लाल

छोड़ अकेला वहीं फर्श पर हुर्इं सालियाँ अन्तर्धान
जीजा सोये बेहोशी में हों जैेसे बिल्कुल निस्प्राण

भेार हुई आइनेे में देखा एक विचित्र विदूषक रूप
लज्जित होकर सोचें मनमें कूद पड़ें यदि हो जल कूप

इतने में आ गयीं सभी सालियाँ हँंसती हुई ठहाका मार
उन्हें उठाया उसी दशा में जाकर पटका बीच बाजार

इस धटना के बाद उन्होंने कभी नहीं देखी ससुराल
साली होली दोनों लगते जीजा को जी के जंजाल

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