अग्निरेखा – 2
कलायन पत्रिका
एक झूठ
मथुरा कलौनी
चैतीराम कैसे बताये, कि वह आज भी कितनी विवशता के साथ यहाँ आने को मजबूर हुआ था। बच्चों का जीवन धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ रहा था। मौत सामने खड़ी थी भूख के रूप में, प्यास के रूप में, जानवरों के रूप में। बूँद-बूँंद पानी के लिए तरसते बच्चे! जिस घने जंगल में चैतीराम अपने पिता के साथ जाया करता था वही जंगल देखते-देखते साफ हो गया। जमीन उजाड़ हो गई थी। जानवरों के हमले आये दिनों होने लगे थे। पानी की तलाश में बाहर निकले भटके जानवर अपना संयम खो बैठते थे। ताल-तलैया सूख गए थे। नदियों की धार के निशान शेष बच गए थे। कुओं में पानी साठ फ़िट नीचे चला गया था और हैंडपंप में पानी निकलता न था। और खेत, खेत न रहकर बड़ी-बड़ी दरारों की सूखी ज़मीन मात्र रह गए थे। त्राहि-त्राहि करते लोगों ने वहाँ से निकलना ही मुनासिब समझा था। चैतीराम भी कब तक अपना घर अपनी जगह का मोह बाँधता! मोह तो कठफोड़ा तथा चिड़ियों का भी टूट गया था जो अपनी जगह छोड़ कर मकानों में अण्डे देने के लिए मजबूर हो गये थे।
“”मालिक के पास चलते हैं।” साँवली ने चैतीराम से कहा था।
“”नहीं। याद नहीं, जाते बखत मालिक हमसे कितना नाराज थे।”
“”मालिक वहाँ हमें काम दिलवा देंगे।”
“”तेरा मन कहता है? मालिक पुरानी बातों को भूल गये होंगे?”
“”हाँ, मेरा मन कहता है। मैं मालकिन का काम करूँगी। मुझसे मालकिन कित्ती खुस रहती थी।” साँवली के चेहरे पर उम्मीद की रेखा चमकी थी!
लगता है मालिक मालकिन को गये ज्यादा समय नहीं बीता है। गुप्ता जिस वर्ष तबादला होकर आये थे तब भी जंगल घना था। सूखा नहीं पड़ा था। गर्मियों में पानी की किल्लत होती थी। असंख्य छोटी-बड़ी, रंग-बिरंगी चिड़ियाँ दिखती थीं। सियार, भेड़िया, तेंदुआ या जंगली कुत्ते कभी-कभी ही दिखते थे। बस्तर के बाद यह स्थान गुप्ताजी का पसंदीदा स्थान था। बस्तर (नारायणपुर) में जब गुप्ता थे तो कितने दोस्त आते थे। छुट्टियाँ बिताने, शिकार करने और जंगल घूमने। जंगल के सौन्दर्य पर रीझते, वे सब प्रशंसा करते न थकते थे। लंबे-लंबे विशालकाय वृक्षों का अंतहीन सिलसिला दिन में भी झीना-झीना सा अँधेरा। घास-पत्तियाँ, उनके बीच दिखते घूमते निद्र्वन्द्व जानवर। चाँदनी की उन्मादक छटा सनसनाती हवाएँ। वो मादकता, वो गंध, सब कुछ सम्मोहित करने वाला, पर गुप्ता को समझ में नहीं आता था कि शहरी लोगों को इसमें क्या रोमांच महसूस होता है। उनका तो एकमात्र मकसद था पैसा कमाना। पैसा बटोरना। इससे भी अधिक रोमांच का और कोई काम हो सकता है, आज के दौर में। इसके पीछे सबसे बड़ा और प्रमुख कारण था असुरक्षा का भाव गुप्ता के भीतर हीनग्रंथि बनकर बैठ गया था कि जिस बचपन को उन्होंने जिया है उनके बच्चे न जियें बल्कि उसकी छाया भी न पड़े। चटनी और बासी रोटियाँ गुप्ता दुबारा नहीं खाना चाहते थे। चाचा की दया पर पले गुप्ता “दया’ शब्द से चिढ़ने लगे थे। उनकी विधवा माँ ने अपना तमाम जीवन गाँव में एक खेत के टुकड़े के सहारे गुजार दिया था। चाचा के सख्त अनुशासन में रहते हुए गुप्ता को कई बार एकांत में रोना आ जाता था, लेकिन भाग्य ने साथ दिया और उनका चयन जंगल विभाग में रेंज अफसर के लिए हो गया था। ट्रेनिंग होते-होते तक चाचा ने उनकी शादी कर दी थी। शादी के बाद एक के बाद एक तीन लड़कियाँ फिर चौथा लड़का। यानी भरी पूरी गृहस्थी का बोझ या जिम्मेदारी गुप्ता के कंधों पर थी, इसलिए जंगलों के प्रति वे निरपेक्ष भाव रखते थे। ठीक वैसे ही जैसे मुर्गी पालने वाले रखते हैं। मुर्गे-मुर्गियों तथा चूजों की खूबसूरती से अप्रभावित। खिलाना-पिलाना, देखभाल करना और फिर उसी निरपेक्ष भाव से हलाल करने वालों के हाथों बेच देना। 1
उसी दौरान गुप्ता ने जंगलों का मिजाज समझा था। स्थानीय व्यवस्था और व्यवस्थापकों की नीयत, स्थिति और ताकत को समझकर राजधानी में बैठे बड़े अफसरों और नेताओं की फरमाइशों को किस तरह पूरा करना चाहिए, यह कला सीखी तथा समझी थी। नेताओं को खुश करने के गुर सीखते हुए जंगल उनके लिए कुबेर का खजाना बन गया था। अपनी निम्न मध्यवर्गीय सोच और जीवन शैली से बाहर निकलकर, पूर्व अफसरों के पदचिह्नों पर चलते हुए संवेदनशील गुप्ता दिन-ब-दिन प्रवीण, चालाक तथा चापलूस बनते गये थे। यहाँ पर न चाचा की सीख याद रही थी न विधवा माँ के दिए गये संस्कार। कुछ ही सालों की नौकरी में गुप्ता ने वो नाम तथा धन कमाया था कि सुनने वाले विस्मित रह गये थे। उनकी विदेशी घड़ियाँ, बेशकीमती चीज़ों से सजा घर, पति-पत्नी की नेपाल, सिंगापुर तथा दुबई की कई-कई यात्राएँ, छोटे भाई के लिए मेडिकल स्टोर और अपने लिए भाई के नाम पर कोठी, भाई की पत्नी के नाम पर जमीन, कई तोला सोना तथा अच्छा खासा पैसा जमा करवा दिया था। और वैष्णव भक्तिन माँ जिसने कभी प्याज लहसुन नहीं खाया था, जब उसे पता चला कि उसका बेटा तीतर, मुर्गा, मटन खाता है और जब उसने पहली बार फ्रिज में मटन भरा रखा देखा था तो नाराज होकर चली गयी थी। उस नाराज, सताई हुई विधवा माँ के नाम भी पन्द्रह एकड़ जमीन लेकर डाल दी थी।
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