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अग्निरेखा

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कलायन पत्रिका

एक झूठ


मथुरा कलौनी

 

 

चैतीराम और साँवली को अपने सामने देखकर गुप्ताजी आश्चर्य में डूब गए। फटेहाल बदहाल, परेशान, भूखे-प्यासे पति-पत्नी। उन्हें देखकर लग रहा था किसी कलाकार द्वारा बनाया गया चित्र हो। एक बच्चा गोद में जिसकी टाँगे सूखी लकड़ी की तरह लटक रही थी। पिचका पेट, सफेद आँखें और मुँह में दबायी उँगलियों से थूक टपक रहा था। दूसरा पिता का हाथ पकड़े था जिसके पिंजर जैसे शरीर पर बड़ा काला सिर ऐसा लग रहा था जैसे खाली डब्बा रख दिया हो, और तीसरा उन दोनों के पीछे दुबका खड़ा था। मुँह खुला और आँखें फटी-फटी। उनके चेहरों पर धूल, पसीना, आँसू और नाक। तीनों को देखकर लग रहा था जैसे अकाल पीड़ित जगह से आ रहे हों!
“”पहचाना मालिक ?” चैतीराम ने बीमार पर उत्साह से भरी आवाज में कहा।
“”तुम सब यहाँ! ऐसी हालत में? कैसे आना हुआ।” गुप्ता ने बाहर निकलते हुए कहा। वे बीच का दरवाजा बंद करना न भूले क्या पता पाँचों प्राणी बरामदे में आ जाएँ। गुप्ता को यूँ दरवाजा बंद करते देख चैतीराम और साँवली को हलका-सा धक्का लगा। अपमान भी महसूस हुआ। आगे बढ़ते कदम एकाएक ठिठक गए। यह क्या मालिक को न खुशी हुई, न प्रेमभाव उमड़ा, न अंदर आने के लिए बोला। क्या उनका आना मालिक को बुरा लगा है? और वक्त होता तो चैतीराम उल्टे पाँव लौट जाता लेकिन इस समय कई सौ किलोमीटर दूर, पराए शहर में, अपार भीड़ के बीच जहाँ चिड़िया तक पहचान की न हो वहाँ मान-अपमान का सवाल ही कहाँ पैदा होता है? यहाँ आने का एकमात्र अवलंब मालिक ही तो हैं। भूतपूर्व मालिक। जिनकी तीन साल तक सेवा की थी उन्ही मालिक की ऐसी रुखाई! जहाँ मालिक खड़े थे वहाँ बोगनवेलिया की घनी बेलें फूलों से लदी थीं। बंगले के चारों तरफ ऊँची दीवार खड़ी कर दी गई थी। लंबे-लंबे वृक्ष, रंंगबिरंगी बेलंे, पत्ते, एक तरफ नरम घास बिछी थी तो दूसरी तरफ अनगिनत गमले रखे थे जिनमें तरह-तरह के गुलाब के फूल खिले थे। पास में ही शानदार झूला रखा था। खिड़की के पास बड़ा सा लवबर्ड्स के लिए पिंजरा बना था। पूरा जंगल ही जैसे साहब के बंगले में सिमट आया था। हरियाली खुशबू और रम्यता! साहब को पखेरुओं से प्रेम कब से हो गया!
“”बैठो बैठो ।” उन सबको जड़वत् खड़ा देखकर गुप्ता ने जमीन की तरफ इशारा करते हुए कहा।
वे सब एक साथ सिकुड़कर बैठ गए। मैले कुचैले बदबूदार कपड़ों से ढके पाँच नरकंकाल!
“”क्या सोचकर आये हो यहाँ?” गुप्ता ने बेरुखी से पूछा।
“”मालिक, हम तो बरबाद हो गए। उजड़ गए। सब कुछ छूट गया मालिक।” चैतीराम अपनी बरबादी की कथा सुनाने लगा।
“”मैंने तो तुम लोगों से तभी कहा था कि हमारे साथ चलो। यहाँ एकाध गुमटी लगवा देते, अभी तक तो कितना कमा लिया होता और यह क्या फिर बच्चा! गुप्ता ने साधिकार डाँटते हुए कहा, “”जब खुद का पेट नहीं भर सकते तो बच्चे क्यों पैदा करते जाते हो भूखों मारने के लिए?” गुप्ता के भीतर वितृष्णा की लहर दौड़ गई।
“”आपका कहा सच था मालिक! तब वहीं पेट भर जाता था पर अब।” चैतीराम ने सफाई देते हुए कहा। “”सब कुछ खतम हो गया मालिक।”
चैतीराम कैसे बताये, कि वह आज भी कितनी विवशता के साथ यहाँ आने को मजबूर हुआ था। बच्चों का जीवन धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ रहा था। मौत सामने खड़ी थी भूख के रूप में, प्यास के रूप में, जानवरों के रूप में। बूँद-बूँंद पानी के लिए तरसते बच्चे! जिस घने जंगल में चैतीराम अपने पिता के साथ जाया करता था वही जंगल देखते-देखते साफ हो गया। जमीन उजाड़ हो गई थी। जानवरों के हमले आये दिनों होने लगे थे। पानी की तलाश में बाहर निकले भटके जानवर अपना संयम खो बैठते थे। ताल-तलैया सूख गए थे। नदियों की धार के निशान शेष बच गए थे। कुओं में पानी साठ फ़िट नीचे चला गया था और हैंडपंप में पानी निकलता न था। और खेत, खेत न रहकर बड़ी-बड़ी दरारों की सूखी ज़मीन मात्र रह गए थे। त्राहि-त्राहि करते लोगों ने वहाँ से निकलना ही मुनासिब समझा था। चैतीराम भी कब तक अपना घर अपनी जगह का मोह बाँधता! मोह तो कठफोड़ा तथा चिड़ियों का भी टूट गया था जो अपनी जगह छोड़ कर मकानों में अण्डे देने के लिए मजबूर हो गये थे।

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