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बात बे बात में लक्ष्मीनारायण गुप्त जी *
उसका रूप – लक्ष्मीनारायण गुप्त
जिसका कोई रूप नहीं है, सारे रूप उसी के हैं*
जिसका कोई धाम नहीं है, सारे धाम उसी के हैं*
जिसका कोई नाम नहीं है, सारे नाम उसी के हैं*
जिसका कोई काम नहीं है, सारे काम उसी के हैं*
जिसका वैभव है यह सारा, वह सर्वथा अकिंचन है।*
जिसका वैभव है यह सारा, वह सर्वथा अकिंचन है।*
जिसका चिंतन दुनियाँ करती, वह चिंतन के बाहर है।*
कभी मृत्यु भी पास न आई, सारे मरण उसी के हैं*
जिसने एक शब्द न बोला, सारे शब्द उसी के हैं*
जिसने कभी न कलम उठाई, सारे लेख उसी के हैं*
उसका नमन करे हम कैसे, चरण नहीं जब उसके हैं?
उसका नमन करे हम कैसे, सारे चरण उसी के हैं?
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