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सर्कस

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कलायन पत्रिका

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कहानी – कमलेश्वर

शहर में हर साल तो नहीं, पर दूसरे – तीसरे साल सर्कस जरूर आता था। उधर स्टेशन पर, जिधर धान के कारखाने हैं, वहीं एक बड़ा-सा ऊसर है। इस ऊसर में अब कुछ पैदा नहीं होता। गर्मियों में जवासा पैदा होता था। उसी की जड़े खस कहलाती थीं। पुराने दिनों में जब बिजली नहीं थी, तब कलक्टर साहब, जज साहब, थानेदार साहब के बंगलों पर उसी खस की पाटियाँ लगा करती थीं। उन पर पानी छिड़का जाता था। खस की वह पाटियाँ तब महका करती थीं। गरम लू को ठंडा कर देती थीं। साहब और उनकी मेम साहबें उन्हीं ठंडी खस की पाटियों के पीछे रहा करती थीं।

फिर उस ऊसर के उत्तर तरफ र्इंटों का एक भट्टा लग गया। ऊसर में तब जवासा उगना भी बंद हो गया। लोगों ने कहा, भट्टे की जो आग नीचे-नीचे दहकती है, उसकी आँच ने ऊसर को भी बाँझ-बंजर बना दिया है। उन्हीं दिनों कच्ची ईंटों के थबई-मेठ ने अपनी बीबी की हत्या कर दी। इलजाम यह था कि वह बाँझ-बंजर थी और मेठ को दूसरी शादी भी नहीं करने दे रही थी। हालाँकि इस हत्या का कोई संबंध सर्कस से नहीं था, पर सर्कस उस साल भी शहर में आया था। सर्कस आता था तो शहर में कुछ रौनक आती थी। छोटे पहियों वाले तिकोने ठेलों पर उसका विज्ञापन होता था। उन पर कर्तब दिखाने वाली लड़कियों के पोस्टर चिपके रहते थे और उसके आगे-आगे शहर का बजरंगी बैंड चला करता था। पीछे सर्कस के जोकरों की टोली हुआ करती थी, जो जनता का मनोरंजन करती, मजाकिया हरकतों से उसे आकर्षित किया करती थी। तब सर्कस पर बहुत भीड़ हुआ करती थी। हर शो में देखनेवाले उमड़़ पड़ते थे। शहर का बजरंगी बैंड तब टिकट खिड़की के पास बाजा बजाता था। एक जोकर लंबी टोपी लगाए दर्शकों को आवाज दिया करता था। सर्कस के खूँखार जानवर तब भी दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र हुआ करते थे। सर्कस के वे शेर, चीते और भालू उस विराट पंडाल के पीछे कटघरों में, कैद रहते थे। कर्तब दिखाने के लिए उन्हें हंटर चटकाता हुआ रिंग-मास्टर पंडाल में लाता था। कर्तब दिखाता था। खूँख़ार जानवर उसके हंटर से घबराते थे। कर्तब दिखा कर शेर चटकते हंटर के तले बिल्ली की तरह अपने कटघरे में घुस जाता था। लोग तालियाँ बजाते थे।

#2347;िर झूलों पर झूलती और खतरनाक कर्तब दिखती हुई रबड़ की खूबसूरत लड़कियाँ आती थीं। फिर गेंदों और तश्तरियों का खेल दिखाने वाले मास्टर जी आते थे। उनका नाम सत्तार था। जब पिछली बार सर्कस शहर में आया था, तो इस घटना को ले कर सनसनी फैल गई थी, कि मास्टर सत्तार ने अपनी खूबसूरत बीबी की हत्या कर दी थी। पुलिस ने मास्टर सत्तार को गिरफ्तार कर लिया था और सर्कस के शो पर पाबंदी लगा दी गई थी। मालुम यह पड़ा था कि मास्टर सत्तार की बीबी जिमनास्टिक मास्टर हरीहरन मेनन के तंबू में ‘सोती ‘ हुई पाई गई थी।

हत्या के इस मामले में आगे क्या हुआ, कुछ पता नहीं। सर्कस तो उखड़ कर आगे चला गया, फिर तीन साल तक शहर में नहीं आया। जब आया तो मास्टर सत्तार उसके साथ थे, और पता चला कि हत्या का मुकदमा उन पर चल रहा था। लेकिन मुकदमे के दौरान उन्होंने दूसरी शादी कर ली थी। वो अभी भी अपना शो इसी सर्कस में पेश करते थे।

इसी सर्कस में एक अजीबोगरीब कर्तब और भी दिखाया जाता था। वह खेल छुरियों का था। आपने अगर बचपन में कभी सर्कस देखा होगा, तो यह खतरनाक खेल जरूर देखा होगा। याद कीजिए, तब सर्कस के परिसर में एक घूमता हुआ चक्र लाया जाता था। उसके बाद एक कलाकार अपने हाथ में चमकती हुई बीस छुरियाँ लाता था। पीछे-पीछे उसका एक सहायक आता था। वह उसकी आँखों पर पट्टी बाँध कर नेपथ्य में चला जाता था। वह कलाकार तब उस घूमते चक्र पर पहली छुरी मारता था। फिर दूसरी। और तब सलमा-सितारों से सजी एक बेहद खूबसूूरत औरत आया करती थी। चक्र पर खुबी हुई दोनों छुरियों का सहारा ले कर वह उस चक्र पर चिपक जाती थी। और तब! आँखों पर पट्टी बाँधे, घूमते चक्र पर बल खाए अंदाज में चिपकी औरत के इर्द-गिर्द वह कलाकार छुरियाँ चलाता था। छुरियाँ उसकी कमनीय काया की किनारियों पर झालर की तरह खुब जाती थीं। मौत का यह खतरनाक खेल सभी दर्शक साँसें रोक कर देखते थे। घूमता हुआ चक्र रुकता था और छुरियों के व्यूह में से वह खूबसूरत औरत उतरती थी। उतरते ही वह कलाकार की आँखों पर बँधी पट्टी खोलती थी। दोनों झुक कर दर्शकोंं का अभिवादन करते थे। पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता था। वे एक बार फिर झुक कर दर्शकों को धन्यवाद देते थे और एक-दूसरे का हाथ पकड़े परिसर से फौरन विदा हो जाते थे। तालियाँ उसके बाद भी गूँजती रहती थीं।

” क्या हुनर है!” दर्शक चमत्कृत हो कर कहते थे।

” यह खतरनाक हुनर इसने तब सीखा था, जब चक्र पर चिपकने वाली खूबसूरत औरत इसकी प्रेमिका थी!” इंपीरियल सर्कस के मालिक ने बड़े गर्व से बताया था।

” यही होता है, यही होता है!” तब एक मनचले ने कहा था, ” औरत भी तो इतनी खूबसूरत है! प्यार सब कुछ सिखा देता है!”

” जब वह यह कला सीख रहा था, तब उसकी प्रेमिका को डर नहीं लगता था, कि कहीं एक भी छुरी गलत चल गई तो?”
” उसे अपने प्यार पर भरोसा था!” इंपीरियल सर्कस के मालिक ने सहज भाव से कहा, ” फिर जब हुनर पक्का हो गया तो उसने अपनी प्रेमिका से शादी कर ली।”

मनचले आदमी का उत्साह ठंडा पड़ गया। यह और कोई नहीं नगर के पार्षद का बेटा था।

तो इस बार जब सर्कस आया तो तंबू गड़ा, पोस्टर लगे। बजरंग बैंड फिर तिकोने ठेलों और जोकरों की जमात के साथ गाता बजाता निकला। फिर शहर में रौनक आई। पिंजड़ों में शेर-चीते आए। हाथी-घोडे़ आए। जिमनास्टिक के खेल दिखने वाली छरहरी लड़कियाँ आईं। अभी तंबू गड़ ही रहा था, कि शहर में हत्या का एक भयानक हादसा हुआ। सनसनी खेज खबर फैली कि शहर के पार्षद-पुत्र ने अपनी प्रेमिका की हत्या कर दी है और वह फरार है।

इंपीरियल सर्कस को इस खबर से कोई लेना- देना नहीं था। बस, इतना ही असर पड़ा था कि पार्षद के फरार बेटे को तलाशने वाले पुलिस के एकाध लोग जिमनास्टिक वाली लड़कियों के तंबुओं में तलाशी लेने आ जाते थे। उनके साथ बैठ कर चाय पीते और गप्पें लड़ाते थे। इंपीरियल सर्कस का मालिक परेशानी तो महसूस करता था, लेकिन कुछ कह नहीं पाता था। आखिर पुलिस अपनी तरह से अपना काम कर रही थी।

पुलिस का कहना था कि पार्षद के बेटे ने पिछले दिनों एक गैर-लाइसेंसी पिस्तौल हासिल की थी। उसे वह चलाना सीख रहा था। खेल-खेल में गोली उसकी प्रेमिका को लग गई और उस पर हत्या का जुर्म आयद हो गया।

” अगर गोली खेल-खेल में लगी थी तो उसको फरार होने की क्या जरूरत थी?”

” बात यह है ही नहीं। पार्षद का बेटा है, इसलिए पुलिस उसे बचा रही है। असल बात यह है कि वह लड़की प्रेगनेंट हो गई थी। हमल तो यहीं की एक डाक्टरनी ने गिरा दिया था, लेकिन उसके बाद से वह लड़की लगातार शादी की जिद कर रही थी। बस, इसी बात पर उसने गोली मार दी।”

” तो वह और क्या करता? इसके सिवा पिस्तौल और क्या कर सकती थी? उससे वरमाला तो नहीं निकलती!” कहते हुए पुलिस वाले ने चाय का आखिरी घूँट लिया और प्याला नीचे रख दिया।

तभी टिकट खिड़की पर बजरंगी बैंड बजने लगा। सर्कस की लड़कियाँ तैयार होने के लिए उठने लगीं। अपने तंबू में छुरियों वाला कलाकार अपनी छुरियों को एक-दूसरे से रगड़-रगड़ कर चमकाने लगा। उसकी खूबसूरत बीबी ड्रेस उठाकर पास वाले तंबू में जाने लगी तो उसने पूछा-

” कहाँ जा रही हो?”

” ड्रेस बदलने, टिकट बाबू के तंबू में। वह खाली पड़ा है।”

” क्यों ? इतने बरस से रोज देखता हँू। आज भी देख लँूगा तो क्या तुम्हारा बदन मैला हो जाएगा?”

पत्नी ने कुछ नहीं कहा। वह सलमा-सितारों वाली ड्रेस ले कर बगल वाले तंबू में चली गई। छुरियों वाला कलाकार अपनी छुरियाँ और तेजी से चमकाने लगा।

गेंदों और तश्तरियों का कर्तब दिखाने वाला मास्टर सत्तार इस बात को पिछले कई शहरों और कई महीनों से भाँप रहा था। उसने फौरन आकर छुरी मास्टर को राय दी-

” आखिर तुम इसकी बेवफाई बर्दाश्त क्यों करते हो? क्या जरूरत है टिकट बाबू के तंबू में जा कर ड्रेस बदलने की?”

” टिकट बाबू टिकट खिड़की पर है। तंबू खाली पंडा है क्या फर्क पड़ता है, वहीं ड्रेस बदल लेगी।” छुरी मास्टर ने खुद पर काबू रखते हुए कहा।

” उस दिन से बहुत पछताओगे बाबू, जिस दिन से वह रात को तंबू बदलने लगेगी!” मास्टर सत्तार ने कहा तो वह और जोर-जोर से छुरियाँ रगड़ने लगा। इतनी जोर से कि छुरियों से एकाध चिंगारियाँ छिटकने लगीं।
मास्टर सत्तार ने उसे गौर से देखा और आगे राय दी, ”तुम्हें तो मालुम है, मैंने अपनी बीबी की बेवफाई एक दिन बर्दाश्त नहीं की। खुले आम कत्ल कर दिया। मुकदमा अब भी चल रहा है। तुम पर तो मुकदमा चल ही नहीं सकता।

छुरी मास्टर ने मास्टर सत्तार को गौर से देखा।

” और क्या! तुम्हारी आँखें पर तो पट्टी बँधी रहती है। जब वह सजधज के चर्खी पर आए तो, दो चार सही छुरियाँ चलाने के बाद एक गलत छुरी चला दो। छुरी कलेजे के पार हुई, किस्सा खत्म! तुम पर तो मुकदमा चल ही नहीं सकता। इसे तो हर हालत में कर्तब दिखाने के दौरान हुआ हादसा ही माना जाएगा!”
छुरी मास्टर ने उसे फिर देखा और छुरियाँ कुछ इस तरह उठार्इं जैसे वह मास्टर सत्तार से सहमत था।

खेल शुरू हुआ। उसकी आँखेां पर पट्टी बाँधी गई। उसकी खूबसूरत बेवफा बीबी आकर घूमते हुए चक्र पर चिपक गई। छुरियाँ चलीं। खेल खत्म हुआ। पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँजने लगा। दानों कलाकारों ने सर झुका कर, तालियाँ बजाते दर्शकों का हमेशा की तरह अभिवादन किया।

बस, फर्क सिर्फ इतना था कि वे एक दूसरे का हाथ पकडे़ साथ-साथ परिसर से विदा नहीं हुए। वे आगे-पीछे चले गए। तालियाँ बजती रहीं।

यह सिलसिला यों ही चलता रहा। छुरियों वाला खेल बदस्तूर जारी रहा।

फिर कोई और शहर था। छुरी मास्टर अपना सामान बाँधे इंपीरियल सर्कस के मालिक के तंबू में आया। मालिक को मालुम था कि वह काम छोड़ कर जा रहा है। मास्टर सत्तार वहीं मौजूद थे। छुरी मास्टर ने अपना पैसा लिया, दोनों को सलाम किया और तंबू से बाहर निकल गया।

कुछ देर दोनों खामोश रहे। फिर मास्टर सत्तार ने मालिक से पूछा-

” यह जाएगा कहाँ और करेगा क्या?”

” भूखा मरेेगा, और क्या!”

” मैंने तो उससे कई बार कहा, अपनी छुरी को एक गलत जुम्बिश दे दे। मामला खतम।”

उस दिन की आमदनी का पैसा रखते हुए मालिक ने इतना ही कहा-

”अब क्या कहँू! पागल है। एक गलत जुम्बिश देने में क्या दिक्कत थी? लेकिन… शायद… इसमें उसका हुनर आडे़ आता था।”

टिकट खिड़की पर बजरंगी बैंड के बजने की आवाज फिर आने लगी।

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