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गनेश और मीनाक्षी – सूज़ैन का बिस्तर
गनेश और मीनाक्षी – सूज़ैन का बिस्तर-1

गनेश और मीनाक्षी – सूज़ैन का बिस्तर-1

कलायन पत्रिका


गनेश और मीनाक्षी – सूज़ैन का बिस्तर

मथुरा कलौनी


 

सूज़ैन तुम्हारे पास टाइम नहीं है तो…
गनेश तुम मुझे गुरु मानती हो और ऐसी बातें कर रही हो! तुमने मुझे समझ क्या रखा है।*
सूज़ैन मैंने क्या कहा जो तुम गुस्सा हो रहे हो।*
गनेश बिस्तर में बताने को कह रही हो और कहती हो कि मैंने क्या कहा!
सूज़ैन बिस्तर में नहीं बताओगे तो समझ में कैसे आएगा।*
गनेश फिर…फिर..
मीनाक्षी गनेश मुझे लगता है कि यहाँ कुछ गड़बड़ है।
गनेश गनेश मुझे लगता है कि यहाँ कुछ गड़बड़ है।*
मीनाक्षी सूज़ैन तुम हिंदी बिस्तर में क्यों सीखना चाहती हो।*
सूज़ैन सूज़ैन तुम हिंदी बिस्तर में क्यों सीखना चाहती हो।*
मीनाक्षी हँसने लगती है और हँसते हँसते लोट-पोट हो जाती है।*
गनेश अब तुमको क्या हुआ!
मीनाक्षी नहीं समझे? सूज़ैन तुम्हें बिस्तर में नहीं विस्तार में बताने को कह रही है।*
गनेश विस्तार… बिस्तर… विस्तार। हे भगवान! अर्थ का अनर्थ <इसी को कहते हैं!!

मीनाक्षी सूज़ैन को समझाती है। बिस्तर और विस्तार में अंतर बताती है। सूज़ैन शर्माती हैे और झिझकती है। फिर तीनों हँसते हैं।*

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