+91 80 4372 3449
धर्मेद्र कुशवाहा
‘एक बकरा हैरान है… …”
आवाज डुग्गी के डब-डब के साथ कब्रिस्तान की ढलान पर बसे छोट-से मुहल्ले की मनहूसी को तोड़ने लगी थी। बच्चों का गोल न जाने कहाँ से फूट पड़ा और मुनादी की नकल करने लगा। डब-डब डुग्गी की आवाज फिर बज उठी।
”एक बकरा हेराना हैं, ओका रंग कत्थई हैं। जे भाई को मिले, जमालू मियाँ के इहाँ पहुँचा दे… …। पहुँचाने वाले को इनाम बक्शीश… …।”
लड़कों का झुण्ड गली के नुक्कड़ तक डुग्गी वाले का पीछा करता रहा।
त्यौहार के मौके पर बकरी का गायब होना कोई बड़ी बात नहीं थी। एक बार की मुनादी के बाद लोग चुप हो जाते थे। सभी जानते थे कि कौन गायब करता है। मवेशी चोर ताक लगाये रहते थे। आधे-पौने में बेचा और रास्ता नापा। लेकिन इस बार-बार की मुनादी ने घर-घर बात फैला दी कि जमालू का बकरा हेराना है जिसे उसकी बीबी, बच्चे की तरह पोस रही थी। जमालू न जाने कहाँ कहाँ दौड़ रहा था। न खाने की फिक्र न सोने की।
आज इस मुहल्ले में तो कल उस मुहल्ले में जहाँ-जहाँ गुंजाइश थी, चक्कर मारकर वह थक चुका था। अभी परसों ही तो गायब हुआ है, सबेरे -सबेरे। जमालू को अच्छी तरह याद है। सुबह नहाने के लिए जब नदी की ओर जाने को हुआ तभी से बकरुआ आया ही नहीं। वैसे हर रोज जब वह कंधे पर लुंगी रखकर जाने को बाहर निकलता तो दरवाजे से बाहर घुँघरु बजाता बकरुआ ही पहले निकल भागता था और आगे-आगे चलने लगता। वह भी तो मुहल्ले की जिन्दगी से परिचित हो गया था। जमालू ने सोचा, शायद सानी-पानी में देर हुई होगी, इसलिए अभी तक नहीं आ पाया। अभी-अभी मुँह में पूरे छोर तक खलीकराई का दाग लगाये छींकता छींकता, मिंगनी करता आता ही होगा।
उसने वह भद्दी आवाज अपनी बीबी जैबुनिया को लगाई जो बरतन माँज रही थी। वह हड़बड़ा कर बाहर निकल आई। उसके हाथ में बरतन माँजने की कालिख लगी ही हुई थी। बायें हाथ से साड़ी का पल्ला संभालते हुए बोली, ”सबेरे- सबेरे का हाय-तोबा मचाय रक्खे हो! नद्दी जाये की बेला नहीं भई का!!”
”चोप्प कहाँ है बकरुआ? इसकी बिटिया की तो… जब देखेा तब गायब।” जमालू बहुत तेज टिर्राया।
”हम का जाने कहाँ गवा… जरा बढ़ के देख त लो।” जैबुन ने कहा और दरवाजे पर खड़ी देखती रही जब तक कि जमालू लौटकर नहीं आ गया। जमालू तेजी से गया और अगली बगली झाँक कर लौट आया था। बकरुआ नहीं मिला। जैबुन की लापरवाही पर गुस्सा खा रहा था वह।
”एनापारी मिल जाँय बेटा तो काट डालेंगे… तंग कर रखा है।”. कहता हुआ जमालू फिर खोजने की तैयारी करने लगा। उसने कन्धे की लुंगी को जैबुन को थमाया और अंटी में नोट खीसता हुआ उल्टे पांव लौट गया।
जैबुनिया के पूरे शरीर में सनसनी फैल गई। दरवाजे पर ताला लगाया और बाहर निकल आई। वह भी उधर ही बढ़ी जिधर जमालू चला जा रहा था। जल्दी में वह हाथ भी नहीं धो पाई थी। सरकारी बम्बे पर हाथ धोया और तेजो से आगे बढ़़ने लगी।
गर्मी का दिन था और धूप बढ़ चली थी। गली की पथरीली सड़क जानवरों और बच्चों के गुह-मूत से तर होकर गँधा रही थी। बकरों और भैंसों का झुंड बराबर आ जा रहा था। जैबुनिया सड़क की ओर खुलती खड़की से उनके खुरों की आवाज सुना करती। यह कस्साई बाड़े का चोर रास्ता था। उस समय गुल्ले काढ़ रही थी। कस्साई बाड़े की ओर जाने वाले जानवरों और नदी नहाने जाने वालों में कितना फर्क होता है, वह अच्छी तरह जानती है। रास्ता वही और वही जानवर परन्तु जिन्दगी और मौत की छाप इनकी आँखों में साफ देखी जा सकती है। वह जानती है कि नीची मुँछों वाला कस्साई बाँस की लम्बी सिटकुनी से बेतरह मार रहा होगा और बेचारे बेजान से बने… चीख नहीं पाते होंगे केवल आँसू बहाये जाते होंगे… जैसे जानते हों कि चिल्लाने से कोई फायदा नहीं। बहुत रहम आ जाती है ऐसे वक्त उसको। इसलिए बहुत कम झाँकती है खिड़की से। लेकिन रोशनी की मजबूरी से दिन में खोलना ही पड़ता है।
जोहर की अजान हो चुकी थी। जमालू खाना खाने के लिए आने वाला ही था। वह उठी खिड़की बन्द करने के लिए तो देखती क्या है कलुवा कस्साई दो खसियों को एक ही रस्सी में बाँधे खींच रहा था । इनमें एक उसका बकरुआ भी था। छोटा सा दो-तीन महीने का देसी खसी। सामने से दोनों पैरों को जमीन पर गड़ाये आगे बढ़ने से इनकार कर रहा था। उसकी कातर आँखें फटी-सी जा रहीं थी और बें -बें की आवाज में चिल्ला रहा था। अचानक बकरुआ की बड़ी-बड़ी भयभीत आँखे खिड़की पर खड़ी जैबुन पर पड़ गयीं। जैबुन ने भी उसे देखा तो न जाने कहाँ से ममत्व और करुणा से उसका मन भर आया। वह बरदाश्त नहीं कर पाई थी और वहीं से बोल उठी थी।
”हे … हे… कल्लू छेाड़ो ओका … हम्मे दे दो … का लेइहो एका…”…”
जैबुनिया की भी बड़ी साध थी कि उसके यहाँ भी कुर्बानी हो। कब तक लोगों का एहसान लेती रहेगी।
”चलो चलो, बड़का गोश खाओ बड़का, एके वस्ते रकम चाहिए, रकम।” कहकर कलुवा कस्साई और भी जोर लगाकर खींचने लगा। उसकी नजरों में हिकारत थी और था टुच्चापन।
वह जानती थी कलुवा कस्साई को। मूड़ पर खचिया में कलिया लाद कर बेचता था और हेला-मेली करता था। यहीं दंद-फंद करके दो पैसे कमा लिये तो बड़ा बन रहा है। कुजड़ा कस्साई की जात ऐसा कह कर निकल जाय उसको गवारा नहीं। उसको बात लग गई और अपनी कमाई की रकम जो जमालू से छिपाकर रखे थी, ताव में लेकर बाहर निकल आई।
कलुआ को गुमान भी नहीं था कि उसके पास भी पैसा होगा पर तब बात लड़ गई तो खसी को देना ही पड़ा। दोनेां की थुक्का-फजीहत में दो-तीन आदमी और भी आ गये थे और किसी तरह से खसी दे दबाकर बात खतम हो गयी।
उसी दिन से बकरुआ घर में आ गया। जमालू ने देखा तो बड़ा खुश हुआ। टो टा कर एक पसेरी का अन्दाज लगाया। घर में बेर के पेड़ से बकरुआ को बांध दिया। कलुआ, जमलुआ और नेहलुआ के मुहल्ले में बकरुआ भी रहने लगा।
जब से नेहालू भागा था बड़ा सूना-साना सा हो गया था जैबुन का घर। न जाने कहाँ होगा नेहलुआ? क्या करे इस मुहल्ले का चलन ही बेढब है। लड़कों को जहाँ हाथ-पैर हुआ कि भागने पर उतारु। कहाँ तक कोई रोके। नेहलुआ उसका सगा तो था नहीं, लेकिन उसने क्या-क्या नहीं किया था उसके लिए। कहाँ नहाता होगा, कहाँ खाता होगा? अब भी उसकी याद करके वह चुपचाप रोया करती है। खैर… यह तो नेहलुआ की तरह भागेगा नहीं। खा पीकर गुर्रायेगा तो नहीं। बात-बात पर मतरिया-बहिनियाँ तो नहीं करेगा। लेकिन उसे क्या पता कि जानवर को भगाया जा सकता है। चुराया जा सकता है। आज उसके कलेजे में वैसा ही दर्द उमड़ पड़ा है जैसा कि नेहलुआ के भागने पर।
अच्छा होता कि पिछले बकरीद पर ही कुर्बानी हो जाती। न वह रहता और न हेराता। परन्तु उसी के मना करने पर ही तो ऐसा नहीं हो पाया था। कुर्बानी के दिन जमालू ने जब बकरुआ को पकड़कर गले में रस्सी बांधना चाहा तो उसको अजीब सा लगा था। उसे लगा कि रस्सी बकरुआ के गले में न हो कर उसी के गले में बंधी हो और जब खींचना शुरु किया तो उसकी चिल्लाहाट एक बकरे की न होकर एक बच्चे की लगने लगी थी। उससे रहा नहीं गया और
जमालू के हाथ से रस्सी छीन ली। बकरुआ की कातर आँखे जैबुन पर गड़ सी गयी थीं जैसे कोई बीमार बच्चा लगातार अपनी डूबती आँखों से माँ को देख रहा हो। गुस्से में देा तीन झापड़ जमालू ने उसको भी जड़ दिये। लेकिन उसने बकरुआ को जाने नहीं दिया। उस दिन वह बहुत देर तक रोती रही। न जाने कहाँ की कुहुक उसके कलेजे में उमड़ पड़ी थी। उसी ने कुर्बानी के लिए खरीदा था और वही रोक रही थी। अजीब हालत हो गई थी उसकी।
बकरुआ केवल बकरा ही नहीं रह गया था अब… वरन एक जिम्मेदार सदस्य बनता जा रहा था। रोज-रोज के नहाने से कत्थई रंग और भी साफ हो गया था। रेशमी चमक थी उसके बँटे हुए जार्जेट की तरह बालों में। सारी देह पर कत्थई, गला और पैर सफेद, एकदम हिरन मालूम पड़ता था देखने में।
बकरुआ भी समझता था कि कौन देास्त है और कौन दुश्मन। बगल वाली पक्की हवेली की हजियायिन से जैबुनिया का कई बार झगड़ा हो चुका था… बंधकी रकम को लेकर। बात दरअसल यह थी कि जमालू पहले हाजी के यहाँ रेजा बीना करता था। जमालू के हाथ की साड़ी अच्छी उतरती थी इसलिये हाजी ने पैसा देने में कोताही नहीं बरती। हाजी, जमालू को हाथ से नहीं जाने देना चाहता था। इसी बीच जमालू ने दूसरी जगह काम लगा लिया तो बंधकी रकम का झगड़ा उठ खड़ा हुआ। हजियायिन कहती कि रकम जमालू ने ली है जो वही अदा करे… और जैबुनिया का कहना था कि रकम गिरस्ता से वसूलो जहाँ वह काम करता है। बंधकी रकम का कारीगर जिम्मेदार नहीं होता। गिरस्ता-गिरस्ता आपस में निपटें। कारीगर को उससे क्या मतलब। उसको जहाँ सुभीता होगा काम करेगा। वह कारीगर है कोई मजूरा नहीं जिसकी गरज हो आकर तेल लगाये। तेल लगाये… की आवाज हजियायिन को मिर्चे की तरह लगती और वह आपे से बाहर हो जाती।
उन्हीं के बीच ऊँचाई पर हाजी के घर की मजार थी शानदार। चढ़ने की सीढ़ी चौतरफा ईंट की, जंगलेदार बाउंडरी तथा एक तरफ दिया-बत्ती वालों के लिये रास्ता खुला था। चूने की सफेदी से मजार झक-झक करती रहती। बकरुआ को किसी ने सिखाया नहीं था। वहीं बकरों के साथ उठता-बैठता लेकिन चलने की बेला होती तो वह सीढ़ी से चढ़ता हुआ ऊपर चला जाता, वहीं पेशाब करता, मिंसनी करता और लौट आता। वह उसकी आदत-सी बन गई थी। इस बात का हजियायिन को बड़ा मलाल था। एक बार तो इसी बात को लेकर झगड़ा भी हो गया था। हाजियायिन ने कहा था बकरा बाँध के रक्खा करो ठीक नहिने… बुरा होइये… लेकिन जैबुन जहाँ एक ओर मन ही मन खुश थी, वहीं बात का निकास करती। मुहल्ले में और भी तो बकरे है फिर जानवर को क्या समझाया जाय। लड़का होता तो कोई बात भी थी। बकरुआ को वह गोद में उठा लेती बच्चे की तरह… कान में कुछ कहती तो लगता वह सब समझ रहा है… अपनी बड़ी-बड़ी आँखे बन्द कर लेता और पागुर करने लगता।
जैबुनिया खाली कराई की सानी-पानी लिये दरवाजे के पास बैठी हुई इंतजार कर रही थी। उसे यकीन था कि बकरुआ मिल जायेगा। एक बार वह दो तीन बकरों के साथ इमामबाड़े की ओर चला गया था। शाम को जब जमालू काम से छूटा तो पकड़ कर ले आया। इस दिन बड़ी मार पड़ी थी उस पर, तभी से दूर जाना छोड़ दिया था। आजकल तो जानवरों को छुटटा छोड़ना भी गुनाह है। बरेठिन बता रही थी कि गदहों पर सबसे ज्यादा जुर्माना लगता है। कानीहौद (काजी हाऊस) का नाम सुनते ही जैबुनिया को न जाने क्यों कँपकँपी छूटने लगती है। कानी हौद का हौद में एक बड़ा सा हौद, उस हौद में गाय, भैस, गदहा, बकरी-बकरा दाना-पानी के और अंधेरा कुप। हाय अल्ला।
जमालू आधा शहर का चक्कर मार आया था परन्तु बकरुआ मिला नहीं। धरमशाला, बँसवारी, निबुआरी, कानीहौद, इमामबाड़ा, डोमहनवा कहाँ-कहाँ नहीं गया वह। पूछते-पूछते वह थाने भी चला था। वहाँ उसकी फरियाद कौन सुनता। उल्टे लात खाते-खाते बचा था। अब वह सट्टियों का चक्कर लगायेगा। वहाँ भी नहीं मिला तो सीधा मंतरशाह की मजार जायेगा। जो भी साला चुराये होगा उसकी शकल अँगूठी में खड़ी उतर जायेगी, फिर कहाँ जायेगा बचकर। ऐसा कमर तेगा मारेगा साले को कि अन्टा चित। वह उसी उधेड़बुन में चला जा रहा था परन्तु न जाने क्यों सब सच मालूम पड़ रहा था और कुछ भी यकीन नहीं हो रहा था। फिर वह चोरी कायम करे भी तो किस पर। बात बिगड़ गई तो पंचाईत में बेवकूफ बनना पड़ेगा और जुरमाना होगा सो अलग। यह तो ऐसे ही है कि बलवे (दंगा) में छुरा भोंके कोई बदमाश और जुरमाना दें मुहल्ले वाले।
अब बकरुआ को निकाल पाना मुशकिल है। लेकिन जैबुनिया का क्या हेागा? जान देती थी उस पर उसी के खर्च को निकालने के लिये ही तो उसने गुल्ला भरना शुरु किया था। किससे-किससे झगड़ा मोल नहीं लिया था उसके लिये। फिर क्या जवाब देगा उसको। अंधा हो जायेगा साला जो उसके खायेगा। साले का घरो भर अंधा हो जायेगा। अल्ला ताला! तू सबकी देखता है मेरी भी देख। क्या बिगाड़ा था मैंने। हम ठहरे गरीब जोलहा… मौका कहाँ मिलता है कि पाँचो बक्त की नमाज अदा कर पावें। लेकिन जुम्मा के दिन मसजिद जाने से तो बाज नहीं आते। पूरी नमाज भी तो याद नहीं लेकिन आज तक रोजा कभी नागा नहीं गवा। फिर किस बात की सजा कि बकरुआ को हमसे छीन लिया।
वह तहमद उठाये गंजी पहने एक अंटी की चादर बदन पर डाले नंगे पैर सट्टी की ओर भागा जा रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे? जैबुनिया को मुँह दिखाये भी तो कैसे। रोने लगेगी तो कैसे मना करेगा। वह घर कैसे लौटे? कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अब तो बेला भी बिसर गई। सट्टी में क्या कोई होगा। वही सड़ी-गली सब्जी वाले। अंडा बत्तख मुर्गी मुर्गा, बकरी बकरा, बाघ-बेहन वाले सभी चले गये होंगे परन्तु वह अदृश्य आकर्षण पर खिंचा चला जा रहा था। उसने टटोला… उसकी अंटी में रुपये साबूत पड़े थे।
वह गली में घुस गया। सामने ही था ताड़ीखाना। आलू दम और पकोड़ी छानने वालों के ठेले के पास आकर रुक गया और ललचाई निगाह ताड़ीखाने पर डाली। खोंमचे और ठेलेवालों की बत्ती की पीली रोशनी एक धूमिल सा वातावरण बनाये हुई थी। उसने बारा-पकौड़ी खरीदी और बीड़ी सुलगाता हुआ ठेके में घुस गया।
जुम्मा का दिन था सो भाई लोग सीधा करगह से उठकर ठेके में आ गये थे। गाली-गलौज से कोहराम मचा हुआ था।
आज वह जमकर पी रहा था लेकिन बकरुआ की शकल आँखो में और भी उमड़ती आ रही थी। वह चाहता था कि बकरुआ को भूल जाय। उसने दूसरा चुक्कड़ भरवाया और चूस-चूसकर पीने लगा। थोड़ी ही देर में उसका माथा चलने लगा। बकरुआ हेराना है… तो क्या जितने लोग पी रहे हैं सबका बकरा हेराना है। वह हँसा मुस्कराया और फिर बाहर निकल आया। बायें ओर की बत्तियों के खम्भे को रुख बनाकर बढ़ा जा रहा था घर की ओर वह। यह रहा लकड़ी का अड़ार और आगे बढ़ चला… यह आई मसजिद और तकिये की चहार दीवार शुरू। ईंट की दीवार में जो खोखा लाँघनेवालों ने बना दिया था उसी में उसने दाहिना पंजा डाला फिर चौचक दीवाल को पकड़कर ऊपर उछल गया। अब वह तकिया की चहारदीवारी पर उकडूँ बैठ गया। जब भी पीकर आता तो वह यहीं बैठा करता। यहीं से वह घर की ओर जाती गली को देखने लगा। अचानक जैबुनिया को आता देखकर अचकचा गया। अरे! साथ में बकरुआ भी है। कहाँ मिला साला। एक खुशी की लहर उसके मन में फैल गई। गली की चिमनी बत्ती की घूमिल रोशनी चटखार हो गई थी थोड़े देर के लिये। उसने आँखें मुलमुलाईं। गौर से देखा तो वह तो धनिया भौजी थी। अब्बुल कद्दुस की बेवा अपने बकरे के साथ।
वह घर की ओर जाने के लिये उठा। कलेजे पर बकरुआ बोझ बनकर चढ़ा आ रहा था। वह अपने दरवाजे की सीढ़ी पर उदास होकर बैठ गया।
”हम पिये थोड़े हैं? नहीं मिला साला तो क्या हुआ… कौनो लड़िका तो नहिने हेराना…। ” वह जोरों का धक्का मारता भीतर आ गया था। जैबुनिया के रोने की आवाज उसके कानों में आ रही थी।
जैबुनिया दरवाजे पर खड़ी-खड़ी जमालू की बाट जोह रही थी… जब उसको खाली हाथ पीकर लड़खड़ाते देखा तो भीतर चली गई। घर में अँधेरा था। आज उसने दिया-बत्ती नहीं किया। मुँह में कौर जाता ही नहीं था तो खाती कैसे? उसे बहुत यकीन था कि बकरुआ मिल जाएगा। वह चटाई पर लेटकर रोने लगी। दरवाजे पर सिकड़ी पर धक्का देने की आवाज अब भी उसके कानों में गूँज रही थी। जमालू वहीं पेड़ के पास जहाँ बकरुआ बाँधा जाता था, बैठ गया और जोरों की आवाज में रोने लगा। थोड़ी देर में उसे जोरदार उल्टी हुई और दोनों हाथों को जमीन पर टेक कर झूल सा गया।
जैबुनिया सजग हुई। उसने जमालू को उठाया, चटाई पर लिटाया और उल्टी को साफ किया।
रात तारों से खाली थी और अँधेरा बेर के पेड़ पास इकट्ठा हो गया था। आँगन भर आकाश में बकरुआ की महक रह गई थी केवल। वह बहुत देर तक बिसूरती रही। बकरुआ के भिनभिनाने की आवाज चारों ओर गूँजने लगी थी। उसकी साँस से सिसकारी उठी… बहुत रोका उसने आँसुओं की धार को, लेकिन रोक नहीं पाई और फफक कर रो उठी। वहीं पेड़ के पास बैठ गई… मातम मनाती हुई… जैसे किसी बच्चे की लाश थोड़ी देर पहले पड़ी रही हो। वह जमीन पर हाथ थपथपाकर कुछ ढूँढ़ रही थी और छाती पीट रही थी। पेड़ में बकरुआ की गंध अब भी बाकी थी जहाँ बाँधा जाता था। उसके मन को एक सहारा सा मिला। उसे लगा कि बेर का पेड़ उसका संगी और संघाती हो। वह पेड़ से लिपट गई और बैन काढ़कर रोने लगी…
कहवाँ हेराना मोर बकरुआ मोरी बहिनी
देत रहे ओका सानी पानी मोरी बहिनी
अखियाँ क मोर सितारा मोरी बहिनी
केकरा के खतिर अब जीब मोरी बहिनी
एक दिन
दो दिन
रोज डुग्गी। बकरा हेराना की मुनादी होती।
तीसरे दिन।
फिर डुग्गी वाला दिखलाई पड़ा। आज उसके हाथ में डुग्गी नहीं थी। उसने बाये कान पर हाथ रखकर जोर की आवाज लगाई।
”मट्टी की तैयारी है, चलो भाई लोगो … जमालू मियां की बीबी … मट्टी की तैयारी है।”
समाप्त