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कहानी- मथुरा कलौनी

केशव ने कालर के नीचे गले में अंगुली से रगड़ा तो मैल की काली पपड़़ी अंगुली में आ गयी। आज पांचवां दिन था यात्रा करते हुए। गांव से बाबूजी का तार आया था कि ईजा बहुत बीमार है, जल्दी आओ। तार के बूते पर उसे छुट्टी मिल गयी थी। ईजा सचमुच बीमार है या उसको बुलाने का बहाना है, यही सोचते सोचते वह दो मील का रास्ता तय कर पंडित शिरोमणि की दुकान पर पहुंचा। कुशल मंगल के बाद उसने पंडितजी से मां के बारे में पूछा तो वह बोले,
”क्या होता है तेरी ईजा (मां) को? भली चंगी है वह। तार तो तुमको बुलाने के लिए दिया था। अगले बुधवार को एक तिथि पड़़ती है, अब उसी दिन होगी तुम्हारी शादी।”
तो केशव का शक ठीक ही निकला, जिसका उसे डर था वैसा ही हुआ है।
घर पर रिश्तेदारों की रेलपेल थी। ढोक आशिष की औपचारिकता निभा कर,
अपने चचेरे भाई चरन को साथ लेकर वह द्यारे पर नहाने चल दिया। रास्ते में चरन ने बताया कि लड़की पंतवाड़ी गांव की है। नाम बसंती है। चार दर्जे तक पढ़ी है और थोड़ी संावली है।
वापस घर आ कर उसने बाबूजी और चाचा को आंगन में धूप में बैठे हुक्का गुड़गुड़ाते हुए पाया। उसको वहीं बुलाया गया। बाबूजी ने जो बताया वह उसे चरन से मालूम हो ही चुका था। चाचा ने कहा,
”इस बार दो खेत बंजर ही रह गए। उनको कमाने वाला कोई नहीं है। तुम्हारी ईजा की भी अब उमर हो गई है। लड़की हाथ पंाव की अच्छी है। घर में थोड़ी मदद हो जायेगी।”
”आप मेरे लिए पत्नी नहीं बल्कि घर और खेतों में काम करने के लिए एक लड़की ला रहे हैं। नहीं तो खोज-खेाज कर एक अनपढ़ सांवली को नहीं चुनते।” आवेश में वह बोल पड़ा। विवाह के प्रति अप्रत्याशित विरोध सुन कर बाबूजी ने उसे समझाया,
”केशव तुम अभी लड़के ही हो, तभी ऐसी बातें कर रहे हो। लड़की ने चौथी कक्षा तक स्कूल में पढ़ा है, और केदार दत्तजी ने उसे घर में भी अच्छी शिक्षा दी है। वे हमारे मित्र होते हैं। मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं। तुम्हारा भला ही सोचूंगा।
केशव ने कोई उत्तर नहीं दिया तो वे फिर बोले,
”लड़की थोड़ी सांवली है तो क्या हुआ? तुम्हारे चाचा का कहना भी ठीक ही है। हमारे पुरखों ने अपनी हड्डियां तोड़ कर इस जमीन को इस लायक बनाया है कि हम यहां रह सकें। खेत बंजर रह जाने का दु:ख तभी समझोगे जब मेरी उमर तक पहुंच जाओगे।”
केशव चुप रहा। अपनी बात कहने के लिए शब्द जुटा रहा था। बाबूजी ने उसे फिर समझाया,
”यह हमारी धरती है। हमारी जन्मभूमि है केशव, तुमको भी तो यहीं आना है।”
”मुझे यहां आना है या नहीं यह तो समय ही बतायेगा। मैं इतना बता सकता हूँ कि मैं यह शादी नहीं करुँगा।” कह कर केशव गुस्से में वहां से चला आया।
शाम को दीये जलने के बाद वह घर आया। दालान में सिगड़ी जल रही थी। उसी के चारों ओर सब बैठे चिंता कर रहे थे।
”पढ़ाई का दोष नहीं है। हां, पढ़ाने वालों को कुछ देाष अवश्य है जो बच्चों को अपनी भूमि और संस्कृति के बारे में उचित रूप से नहीं बताते।”
”अब करोगे क्या? लड़के से पहले पूछ लेना चाहिए था। अब तो नाक कट जायेगी। पंतवाड़ी वाले हुक्का पानी बंद कर देंगे।”
”नहीं, केशी मान जायेगा। अभी थका हारा है। गरम खून है। थोड़ा सोचेगा तो अकल आ जायेगी।”
”अकल तो तब आयेगी जब उमर बीत जायेगी। अकल और उमर में भी कभी भेंट हुई है भला?”
”अकल तो तब आयेगी जब उमर बीत जायेगी। अकल और उमर में भी कभी भेंट हुई है भला?”
केशव सुनी अनसुनी कर के अंदर कमरे में जाकर लेट गया। उसकी बहन चंद्रिका उसको खेाजती हुई वहां आयी।
”केशीदा, ऐसे क्या सोया हुआ है अंधेरे में? लालटेन तो जला लेता,” उसने कहा।
”अब तू आयी है दादी अम्मां बन कर?”
”नहीं दा,” कह कर चंद्रिका चुप हो गयी।
”क्या है चंदी ?” केशव ने कुछ नरम होते हुए कहा।
”तेरे जाने के बाद ईजा रो रो कर बेहाल है। वह तो समझे बैठी है कि तू वापस चला गया है। चल, वहीं चल खाना भी वहीं खा लेना।”
”चल।”
खाना परोसते हुए ईजा ने कहा कि बेटा, मां-बाप बेटे का भला ही सोचते हैं। जवानी के जोश में उसे कोई उल्टा सीधा कदम नहीं उठाना चाहिए। वह ठीक से सोच कर सबेरे जवाब दे। केशव ईजा के चेहरे में कई नई रेखाएं पहली बार देख रहा था। बाल भी खिचड़ी हो चले थे। बहुत थकी थकी लग रही थी।
”केशीदा,” चंद्रिका ने कहा, ”लड़की अच्छी है रे। मैं भी देखने गयी थी। थोड़ी सांवली है, लेकिन स्वभाव की बहुत अच्छी है। ईजा की हालत तो देख ही रहा है। मैं चली गयी। तू भी फौज में है। ईजा बेचारी अकेली कितना करेगी?”
”चंदी, चुप कर। खाने दे केशी को।” ईजा ने कहा।
रात भर चंद्रिका के स्वर केशव के कानों में गूंजते रहे। पढ़ी लिखी संुदर लड़की आवश्यक नहीं कि स्वभाव की भी अच्छी निकले। ईजा का चेहरा उसकी आंखेां के सामने घूमता रहा। यही सोचते हुए रात गुजर गयी। सुबह होने तक उसने फैसला कर लिया था।
धूमधाम से बारात पंतवाड़ी गयी। कुमाऊंनी ढोलों और छलिया नर्तकों ने ऐसा समां बांधा कि केशव के चेहरे से उदासी के बादल छंट गये। लेकिन केवल थेाड़ी देर के लिए। शुभदृष्टि के समय जब पहली बार लड़की को देखा तो उसका दिल बैठ गया। मोटे होंठ, चौड़ी नाक, बेढंगी नथ, पेंडुलम जैसा मांगटीका और लाल ओढ़नी में गहरा सांवला चेहरा। ईजा, बाबूजी को ही मुबारक हो यह बहू।
सुहागरात को कमरे में जाने का उसका मन ही नहीं हुआ। जब उसे भेजा गया तो वह शौच के बहाने खेतों की ओर हो लिया। सिगरेट पर सिगरेट फूंक कर जितना समय बिता सकता था बिता कर जब वह वापस लौटा तो सब सो चुके थे। वह रसोई में जा कर लेट गया। दूसरे दिन ही चले जाने का निश्चय कर उसने अपने मन को हल्का कर लिया। जब उसकी आंख खुली तो पौ फटने वाली थी।
उसका सब सामान उसके कमरे में था। वह दबे पंाव वहां गया। दरवाजा खुला हुआ था। बसंती कमरे में नहीं थी। उसने जल्दी जल्दी अपना सामान ठीेक किया तथा साबुन तौलिया ले कर धारे की ओर नहाने चल दिया।
पहाड़ी पर धूप आ रही थी। नहा धो कर दंात किटकिटाते हुए वह धूप तापने बैठ गया। रातभर ठीक से सोया नहीं था। इसलिये उसकेा वहीं नींद आ गयी। औरतों की खिलखिलाहट सुन कर उसकी नींद खुली।
चंद्रिका और उसकी सहेलियां बसंती के साथ द्यारे पर जा रही थीं। खिलखिलाहट उन्हीं की थी। केशव को उठा देख कर सब तो आगे बढ़ गयीं, चंद्रिका वहीं ठहर गयी और उसने शोखी से पूछा,
”क्यों रे केशीदा, लगता है कल रात को सोया नहीं जो यहां सेा रहा है? शादी से पहले तो बड़े रस्से तुड़ा रहा था।”
”हां चंदी, कल रात सोया नहीं।” कुछ रुक कर वह फिर बोला, ”चंदी, मैं आज दोपहर को चला जाऊंगा।”
”कहां चला जायेगा?”
”वापस अपनी यूनिट में।”
आशंका से सहमते हुए चंद्रिका ने कहा, ”तेरी छुट्टी तो देा महीनों की है, फिर आज ही क्यों जा रहा है?”
बाबूजी ने कुछ नहीं कहा। आशीर्वाद भी नहीं दिया। ईजा ने चुपचाप आंसू बहाते हुए दही-अक्षत का टीका लगा दिया। केशव सबका मोह तोड़ कर लंबे डर भरता हुआ चला गया।
राखी में चंद्रिका ने राखी के साथ एक छोटा पत्र भेजा था।
केशीदा,
तुझे ऐसा ही करना था तो शादी नहीं करनी थी। कायरों की तरह भागने से तो अच्छा था शादी की वेदी से ही उठ आता। बाबूजी तेरा नाम तक नहीं लेते। ईजा आंसू बहाती रहती है। दोनेां बसंती भाभी का मुँह देख कर जी रहे हैं। तूने सबको घाव दे रखे हैं।
तुम्हारी बहन
चंद्रिका
इस चिट्ठी को पढ़ कर केशव बहुत दिनों तक सोचता रहा। उनको बहू चाहिए थी, वह उनको मिल गयी है। बेटे की अब क्या आवश्यकता? बेटे का थोड़ा भी ध्यान होता तो एक अनपढ़ गंवार लड़की को उसके पल्ले नहीं बांधते। कभी कभी वह यह भी सोचता था कि बसंती का क्या देाष? लेकिन देाष तो उसका भी नहीं है। सब अपनी अपनी किस्मत है।
उस साल वह छुट्टी में घर नहीं गया। दूसरे साल भी नहीं गया। शादी के ठीक दो साल बाद उसे बसंती का पत्र मिला।

आपके जीवन में उजाला तो न ला सकी, पर मुझे अवसर भी तो नहीं मिला। मैं अंधेरा भी नहीं लाना चाहती हूं। आपकी अनुपस्थिति में मैंने यहंा आपके बारे में बहुत कुछ जाना है। जिससे मैं यह कह सकती हूँ कि घर से मुंह मेाड़ कर आपकी आत्मा सुखी न होगी। यह निस्संदेह है कि आप मेरे कारण छुट्टी नहीं आ रहे हैं। विवाह की रस्म चाहे जो भी कहे आपने अपने जीवन में मेरा प्रवेश
निषिद्ध कर रखा है। विश्वास कीजिए मैं भी अनाधिकार प्रवेश नहीं चाहती। अत: मैं आपके और ईजा बाबूजी के बीच व्यवधान नहीं बनूँगी। केवल आने की तिथि सूचित कर दीजिएगा, मैं आपको यहां नहीं मिलूँगी।
बसंती
कई बार पढ़ने के बाद भी केशव विश्वास नहीं कर पा रहा था कि चार कक्षा तक पढ़ी लड़की इतनी सुंदर हस्तलिपि में इतना सुलझा हुआ पत्र लिख सकती है। क्या उसके साथ छल हो रहा है? वह किसी से पूछ भी तो नहीं सकता। चंद्रिका पहले से ही नाराज है, उचित उत्तर नहीं देगी। क्या वह घर जा कर पता करे?
केशव कोई फैसला नहीं कर पाया, लेकिन नियति ने फैसला कर लिया था। लड़ाई छिड़ गयी। बर्फीले पहाड़ों पर मौत से ऑखमिचौनी खेलते हुए अंतरद्वंद्व के लिए समय ही न था।
उधर रोज दिल दहलाने वाली खबरें आ रही थीं। वीरगति को प्राप्त हुए तथा गुम हुए जवानेां की सूचियंा लंबी होती चली जा रही थीं। उस अंचल का शायद ही कोई घर होगा जहां से क्रंदन नहीं सुनायी पड़ता हो। लापता होने वालों में केशव का नाम भी था।
असंख्य मांगों का सिंदूर पोंछ कर लड़ाई समाप्त हुई। रोना धोना हो लिया। समय के साथ कई घाव भर गये और कई नासूर बन कर जीवन के साथी बन गये।
स्नेहमयी सास ने बसंती को कभी यह अनुभव नहीं होने दिया कि वह परायी बेटी है। केशव के अपराध को बाबूजी ने स्वयं ओढ़ लिया था तथा अपना सारा स्नेह उस पर उंडेल दिया था। इसी स्नेह से शक्ति पा कर बसंती गांववालों के प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से किये गये आघातों को झेल गयी।
वह धारे पर जब भी जाती, एक टीस उभरती थी। यहीं उसने लापता होने वाले को पहली बार अच्छी तरह से देखा था। दूर पहाड़ी पर गूंजता किसी विरहन का गीत उसकी आंखेां में आंसू ला देता।
एक सुबह को ठीक उसी जगह उसने एक अपरिचित को लेटे हुए पाया। पास जा कर देखा तो जी धक् से रह गया। वही चेहरा था। युद्ध की विभीषिका में ने जाने क्या क्या झेलना पड़ा हो।
केशव की आँखें खुलीं तो उसने एक तरुणी को अपनी तरफ देखते हुए पाया। बसंती के मुंह से निकल पड़ा, ”आप!” ”मैं इसी गांव का हूँ,” केशव ने अपना परिचय दिया, ”परदेश से अभी पहुंचा हूँ। घर जाने से पहले सोचा थेाड़ा सुस्ता लूं। आप नयी लगती हैं इस गांव में?” ”नयी तो नहीं हूँ। हाँ, आपके लिए हो सकती हूँ। आप घर जाइये। आपकी राह देखते देखते आपके घरवालों की आंखें पथरा गयी हैं?” ”आप मुझे पहचानती हैं?” ”आपका चेहरा आपके पिताजी से मिलता है।” कह कर वह आगे बढ़ गयी। अपने चेहरे के चुगली खाने का डर था। थोड़ी दूर आगे जा कर एक चट्टान पर बैठ गयी और घंटों वहीं बैठी रही। ईजा उसकेा खोजती हुई वहां पहुंची। वह उसके मन की अवस्था समझ रही थी। उसने बसंती के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ”बसु, चल बेटी घर चल। मैं समझ गयी थी कि तू कहीं छिपी बैठी होगी।” बसंती ईजा से लिपट कर खूब रेायी। ईजा को भी रुलाया। थोड़ा जी हल्का हुआ तो बोली, ”मेरा कहा सुना माफ करना, ईजा। आपका बेटा आ गया है, अब मैं जाती हूं।” ”तू कहीं नहीं जायेगी बसू। तू घर चल।” वह खींचकर बसंती को घर ले गयी। केशव एक बार फिर उहापोह में था। लड़ाई ने उसे सिखा दिया था कि रूप तो देखने वाले की आँख में है। कुरूप तो युद्ध है। बसंती के पास जाये तो किस मुंह से जाये। कुछ समय बाद ग्लानि से भरा केशव साहस बटोर कर बसंती के पास आया। उसको देख कर आश्चर्य से बोला, ”आप!” हां वही तो है, चौड़ी नाक, मोटे होंठ, सांवला रंग। दुल्हन की वेशभूषा में जो कुरूप लग रही थी वही धारे पर मिलने वाली आकर्षक तरुणी थी। आत्मग्लानि गहरी हो गई। सिर झुका कर वह बोला, ”मैं तुम्हारा अपराधी हूं बसंती, हो सके तो मुझे माफ कर देा।” बसंती ने केशव को माफ कर दिया। सुबह का भूला घर लौट आया था।
केशव कोई फैसला नहीं कर पाया, लेकिन नियति ने फैसला कर लिया था। लड़ाई छिड़ गयी। बर्फीले पहाड़ों पर मौत से ऑखमिचौनी खेलते हुए अंतरद्वंद्व के लिए समय ही न था।
उधर रोज दिल दहलाने वाली खबरें आ रही थीं। वीरगति को प्राप्त हुए तथा गुम हुए जवानेां की सूचियंा लंबी होती चली जा रही थीं। उस अंचल का शायद ही कोई घर होगा जहां से क्रंदन नहीं सुनायी पड़ता हो। लापता होने वालों में केशव का नाम भी था।
असंख्य मांगों का सिंदूर पोंछ कर लड़ाई समाप्त हुई। रोना धोना हो लिया। समय के साथ कई घाव भर गये और कई नासूर बन कर जीवन के साथी बन गये।
स्नेहमयी सास ने बसंती को कभी यह अनुभव नहीं होने दिया कि वह परायी बेटी है। केशव के अपराध को बाबूजी ने स्वयं ओढ़ लिया था तथा अपना सारा स्नेह उस पर उंडेल दिया था। इसी स्नेह से शक्ति पा कर बसंती गांववालों के प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से किये गये आघातों को झेल गयी।
वह धारे पर जब भी जाती, एक टीस उभरती थी। यहीं उसने लापता होने वाले को पहली बार अच्छी तरह से देखा था। दूर पहाड़ी पर गूंजता किसी विरहन का गीत उसकी आंखेां में आंसू ला देता।
एक सुबह को ठीक उसी जगह उसने एक अपरिचित को लेटे हुए पाया। पास जा कर देखा तो जी धक् से रह गया। वही चेहरा था। युद्ध की विभीषिका में ने जाने क्या क्या झेलना पड़ा हो।
केशव की आँखें खुलीं तो उसने एक तरुणी को अपनी तरफ देखते हुए पाया। बसंती के मुंह से निकल पड़ा, ”आप!”
”मैं इसी गांव का हूँ,” केशव ने अपना परिचय दिया, ”परदेश से अभी पहुंचा हूँ। घर जाने से पहले सोचा थेाड़ा सुस्ता लूं। आप नयी लगती हैं इस गांव में?”
”नयी तो नहीं हूँ। हाँ, आपके लिए हो सकती हूँ। आप घर जाइये। आपकी राह देखते देखते आपके घरवालों की आंखें पथरा गयी हैं?”
”आप मुझे पहचानती हैं?”
”आपका चेहरा आपके पिताजी से मिलता है।” कह कर वह आगे बढ़ गयी। अपने चेहरे के चुगली खाने का डर था।
थोड़ी दूर आगे जा कर एक चट्टान पर बैठ गयी और घंटों वहीं बैठी रही। ईजा उसकेा खोजती हुई वहां पहुंची। वह उसके मन की अवस्था समझ रही थी। उसने बसंती के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
”बसु, चल बेटी घर चल। मैं समझ गयी थी कि तू कहीं छिपी बैठी होगी।”
बसंती ईजा से लिपट कर खूब रेायी। ईजा को भी रुलाया। थोड़ा जी हल्का हुआ तो बोली,
”मेरा कहा सुना माफ करना, ईजा। आपका बेटा आ गया है, अब मैं जाती हूं।”
”तू कहीं नहीं जायेगी बसू। तू घर चल।” वह खींचकर बसंती को घर ले गयी।
केशव एक बार फिर उहापोह में था। लड़ाई ने उसे सिखा दिया था कि रूप तो देखने वाले की आँख में है। कुरूप तो युद्ध है। बसंती के पास जाये तो किस मुंह से जाये।
कुछ समय बाद ग्लानि से भरा केशव साहस बटोर कर बसंती के पास आया। उसको देख कर आश्चर्य से बोला,
”आप!”
हां वही तो है, चौड़ी नाक, मोटे होंठ, सांवला रंग। दुल्हन की वेशभूषा में जो कुरूप लग रही थी वही धारे पर मिलने वाली आकर्षक तरुणी थी। आत्मग्लानि गहरी हो गई। सिर झुका कर वह बोला,
”मैं तुम्हारा अपराधी हूं बसंती, हो सके तो मुझे माफ कर देा।”
बसंती ने केशव को माफ कर दिया। सुबह का भूला घर लौट आया था।