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बिलौरी की धूप

बिलौरी की धूप

कलायन पत्रिका

बिलौरी की धूप


कहानी – मथुरा कलौनी


यह रेस्टॉरंट एक जीर्ण बिÏल्डग की दूसरी मंजिल पर है। नाम है सागर। खुली बाल्कनी में बैठने से नीचे की सड़क और सड़क के उस पार की गतिविधियों का नजारा लिया जा सकता है।
नीचे सड़क, सामने दो सिनेमा हाल और दो सिनेमा हालों के बीच एक बहुत बड़ा शापिंग सेन्टर, स्थानीय लोगों और सैलानियों की मिलीजुली भीड़। खोमचेवालों की चिल्लपों और लोगों का शोरगुल। सड़क पर छोटी-बड़ी गाडियों की घुरघुर तथा हाड़ कंपा देनेवाले हॉर्न।

परसों इसी शोर ने उसकी आवाज को भागीरथी तक नहीं पहँुचने दिया था। उसने कितनी आवाजें दी पर इस शोर में उसकी आवाज खेा कर रह गई थी।

लेकिन आवाज पहुँच भी जाती तो क्या होता! वह अपना निर्णय थोड़े ही बदलती। इतना तो वह उसे जानता ही था। पर पता नहीं चंदर को ऐसा लग रहा था कि यदि वह यह जान पाती कि चंदर पीछे से आवाज दे रहा है तो अच्छा होता। अच्छा होता या न होता, कम से कम उसे तो अच्छा लगता।

अब यह बात एकदम फिजूल लगती हैं कि कौन सही था और कौन गलत जब कि हमसफर ने अपना रास्ता ही बदल लिया हो।
कितनी अजीब बात हैं, जब तक वह थी तो उसके लिए कितना महत्वपूर्ण होता था उसके तौर तरीकों में मीनमेख निकालना। और अब जब वह अपनी मर्जी से अपना स्वतंत्र निर्णय लेकर गई हैं तेा कितना उदास – उदास लगता हैं! जब थी तो कभी कभी ऐसा लगता था कि वह न होती तो कितना अच्छा होता और अब जब वह नहीं हैं तो लगता हैं कि जिन्दगी ही कहीं खो गई हैं। और उसे गए हुए अभी तीसरा ही दिन

तो हैं। ये मानवीय रिश्ते भी अजब है।

मन की बात और है पर चंदर जानता था कि किसी न किसी को घर छोड़ना ही था।
हालात ही कुछ ऐसे पैदा हो गए थे। उसने घर इसलिए नही छोड़ा कि वही तो भागीरथी को उसके पहाड़ी गाँव से यहाँ ले आया था। वैसे घर भी उसी का तो है, उसी के नाम पर हैं।

हालांकि चंदर अपने मन की बात कभी अपनी जबान पर नहीं लाया पर लगता हैं किसी न किसी तरह भागी ने टोह पा ली थी। अपने स्वाभिमान की खातिर वह उसे छोड़ कर चली गई हैं। भीड़ में जाते हुए कितनी निरीह लग रही थी। पर क्या वह सचमुच निरीह हैं? बाकायदा घर से प्लान बना कर निकली हैं। घर से स्टेशन गई, टिकट लिया, अपना सामान स्टेशन में छोड़ा और रेस्तराँ में आकर उसे घर की चाभी पकड़ा कर चलती बनी। क्या यह ऐसी निरीह पहाड़ी लड़की का काम है जो जीवन में पहली बार शहर आई हो।

भागी, गाँव की थी। शहर के समाज में उसका गंवारपन कहीं उजागर हो ही जाता था जो चंदर को नागवार लगता पर खुशी भी होती। नागवार इसलिए लगता कि पत्नी के गंवारपन पर लोग क्या कहेंगे खुशी इसलिए होती कि उसे सुधारने का एक मौका मिलता।

भागी का कहना था कि वह कुमाऊँ की नार है। जो तौर-तरीके उसे घुट्टी में मिले है। उन पर उसे गर्व हैं। एक पहाड़ी लड़की मेंं पहाड़ीपन नहीं झलकेगा तो और किसमें झलकेगा?

‘मैं भी तो पहाड़ी हँू।’ चंदर कहता तो भागी मुस्कुराहट ओढ़ कर कहती कि उसे इस बात पर आश्चर्य है कि चंदर कैसे पहाड़ी हो गया। आरंम्भ में यह मुस्कुराहट एक नवेली की होती थी जो अपने पति से अटखेली करना चाहती थी। अपने पति को समझाना चाहती थी। फिर यह मुस्कुराहट कडुवाहट छिपाने के लिए होती थी और बाद के दिनों में यही मुस्कुराहट कडुवाहट दर्शाती थी।

भागी एक सहिष्णु लड़की थी। उसने स्वयं को अपने पति की इच्छानुसार ढ़ाल लिया था। अपने पहाड़ीपन के ऊपर उसने शहरीपन का मुल्लमा चढ़ा लिया था। पर पति था कि जैसे उसने प्रसन्न होना सीखा ही न हो। वह अपने पति से प्यार करना चाहती थी। प्यार करने लगी थी। उसके साहस, उसकी लगन और सूझबूझ की वह कायल थी। पर उन दोनों के बीच एक ऐसा ऊंट था जो किसी करवट नहीं बैठ रहा था।

वह रात चंदर पर बहुत भारी पड़ी। एक ओर हताशा दूसरी ओर भावावेश और बीच में वह टेबल-टेनिस-बाल की तरह। सोचते सोचते उसके गाल उसके आंसुओं से गीले हो गए। ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था। सुबह पौ भी नहीं फटी थी जब वह जावेद के घर पहुँचा। ‘ऐसा क्या कह दिया भागीरथी ने कि जनाब आधी रात को दौड़ते हुए चले आये?’ जावेद ने पूछा।

‘भागी चली गई जावेद।’ चंदर ने लंबी साँस छोड़ते हुए कहा।

‘चली गई! क्या मतलब है तुम्हारा?’ जावेद ने पूछने के लिए पूछा। वर्ना उसे नीलोफर से मालूम हो गया था कि नौबत यहाँ तक पहुँच सकती हैं। फिर उसे गुस्सा आया कि उसका दोस्त इतना नासमझ है। उसने कहा, ‘चुगद हो तुम! गदहे हो तुम! बेवकूफ हो तुम!’

नीलोफर चाय लेकर आई। ‘सुना तुमने नीलोफर?’ जावेद ने पूछा।

‘मैंने सुन लिया है, जावेद। चंदर भाई, यह क्या कर दिया आपने?’

‘मैंने कर दिया! तुम दोनों को गलतफहमी हो रही हे। भागी को मैंने नहीं छोड़ा हैं। वह स्वयं मुझे छोड़ कर गई हैं। वह भी गुस्से में नहीं, सोच समझ कर, बहुत शांत दिल से पूरा इंतजाम करके।’

‘चंदर भाई, मुझे मालूम था कि भागी आज नहीं तो कल चली जाएगी। मैं तो दुआ माँग रही थी कि नौबत यहाँ तक न पहँचे।’ नीलोफर का गला रुंध आया।

‘नीलोफर……..’ जावेद ने कहा।

‘नहीं जावेद मुझे कहने दो,’ नीलोफर ने कहा, ‘चंदर भाई, भागी ने बहुत सहा हैं और कोई होती तो इतना सहने तक रुकती नहीं।’

‘नीलोफर यह तो तुम ज्यादती कर रही हो। कसूर मेरा जरुर होगा पर, ताली एक हाथ से नहीं बजती,’ चंदर ने कहा।

‘एक हाथ से ताली नहीं बजती पर एक हाथ से मुक्का जरुर मारा जा सकता हैं। भाई साहब आज की यह माडर्न दुनियाँ भी मर्दों की ही हैं। अच्छे की जिम्मेदारी आप लोग खुशी-खुशी ले लेते है। तो बुरे के जिम्मेदार भी आप ही हैं। भले ही दोष दोनों का क्यों न हो,’ नीलोफर ने कहा।

‘नीलोफर ठीक कहती है चंदर,’ जावेद ने कहा, ‘तुम जिस दृष्टिकोंण से भी देखेा कसूर तुम्हारा ही हैं। तुमको नहीं मालूम तुम्हारी समझदारी पर मैं कितना निर्भर रहता था। पता नहीं शादी के बाद तुमको क्या हो गया हैं। अरे नीलोफर और मेरे बीच भी बहुत बड़े बड़े झगड़े हुए । तुम्हारी तरह मेरे भी अपने बुजुर्ग नहीं हैं। कई बार इच्छा होती थी कि कोई तो अपना होता जो बीच बचाव करता। तुम अपने ही मामले में इतना उलझे हुए थे कि कभी तुम से मदद माँगने का दिल ही नहीं किया। फिर हमलोगों ने वही किया जो करना चाहिए था। जो तुमको भी करना चाहिए। यानी अपने मामले खुद निबटाओ। खुद निबटाना छोड़ कर तुम शायद भागी के भरोसे बैठे रहे कि वही निबटाएगी। जो हो, भागी को जाने दे कर तो तुमने हद ही कर दी।’

सचमुच उसने ज्यादती कर दी है।

‘अब तो देर हो गई है,’ हार कर थकी हुई आवाज में चंदर ने कहा, ‘मुझे तो यह भी नही मालूम कि वह कहाँ गई? मौनी गई होगी शायद।’

‘और कहाँ जाएगी बेचारी। अैार कोई देर-वेर नहीं हुई हैं।’ जावेद ने कहा।

‘वह नहीं आएगी जावेद।’

‘तुम जाओगे तो जरुर आएगी। कोशिश तो करो।’

‘चंदर भाई। आप आज ही चले जाइए।’ नीलोफर ने कहा।

मौनी ऊँचे पहाड़ पर बसा एक छोटा गाँव है। पिथौरागढ़ से करीब 10 किलोमीटर दूर हैंैतथा आखिरी बस स्टॉप से करीब चार किलोमीटर की चढ़ाई पर है। चंदर का बचपन तो पिथौरागढ़ में बीता था पर गांवों से उसे विशेष लगाव था। मौनी से थोड़ा हट कर एक रेशम का फार्म था जहाँ उसकी एक दूर के रिश्ते की चाची के यहाँ उसका आना-जाना लगा रहता था। पहली बार भागी को देखा था जब वह मौनी के बन मे घूम रहा था।

उसने देखा बड़ा हरी धास का बोझा पास में रखे एक लड़की विश्राम कर रही है और हल्की आवाज में गा रही है।

‘छाना बिलौरी जन दिया बौज्यू लागलो बिलौरी को घाम …..’ हे बाबुल मुझे छाना बिलौरी मत ब्याहना क्यों कि सुना हकी धूप बड़ी तेज होती है। …..’ –

अपरिचित को आते देख उसने गाना बंद किया और बोझा उठाने लगी। पीठ का बोझा बड़ा हो तो घसियारिनेंं बोझे के ऊपर पीठ के बल लेट जाती है। और सिर की रस्सी ठीक करके जेार लगा कर बोझे समेत उठती हैं।

अगर कोई पीछे से बोझ उठाने में सहायता दे तो काम आसान हो जाता हैं। जब भागी घास के बोझे पर अधलेटी रस्सी ठीक कर रही थी, उसी समय चंदर वहाँ पहुँच गया। जो छवि उसने देखी उस पर वह मंत्रमुग्ध हो गया। बाल छींट के पिछौडे से बंधे हुए, फिर भी कुछ काले भूरे से, पिछौड़े के नीचे से निकल कर माथे पर अठखेलियाँ कर रहे थे। उसने छींट की ही अंगिया पहन रखी थी। अपनी दशा और एक अपरिचित के पास होने का भान और ऊपर से बोझा उठाने का श्रम। भागी का चेहरा बीरबहूटी हो उठा।

एक स्वस्थ-सुंदर युवती की ऐसी छटा पर चंदर को मंत्रमुग्ध होना ही था। उस एक ही छवि पर वह ऐसा उन्मादित हुआ कि उसने भागी के बारे में सब-कुछ पता लगा लिया। उसे यह जान कर अति प्रसन्नता हुई कि भागी सुशिक्षित है। इसी साल मनोविज्ञान में एम ए किया है। बस, अपने रिश्तेदारों के माध्यम से पैगाम भिजवाया और एक साल के अंदर भागी को ब्याह कर ले गया।

इस बार भी वह रेशम फार्म पर ही रुका। उसने यह भी पता लगा लिया था कि भागी मौनी में ही हैं, पर वह उसके घर जाने का साहस नहीं जुटा पाया। मौनी के बनों में घूमते हुए दो दिन हो गए।

एक बार भागी मिल जाती तो उसे मनाने का प्रयत्न करता। पता नहीं वह मानेगी या नहीं। उसे इस बात का भी भान हो ही गया कि ज्यादती किसकी है। वह यही सोचता रहा कि भागी उसकी हैं, वह उसे जिस सांचे में थोड़ा तो हल्का होता।

रेशम फार्म में भी अधिक रुकना शायद न हो। आज तो चाची को भी अहसास हो गया था कि सब कुछ ठीक नहीं हैं। उन्होंने पूछ लिया कि वह ससुराल कब जा रहा हैं। दो एक दिन में भागी न मिली तो चाची को सब बताना ही पड़ेगा। बिना भागी से मिले वह वापस भी तो नहीं जा सकता।

भागी मिली उसे तीसरे दिन। उसने सुना, कोई वही छाना बिलौरी वाला गीत गा रहा हैं। आवाज एकदम भागी की ही थी। वह उसी ओर बढ़ा। पेड़ों की ओट से उसने देखा कि भागी हाथ में एक टहनी लिए एक छोटे टीले पर बैठी गा रही है। पास ही एक गाय चर रही है। गाने के अंत में उसने एक लंबी साँस छोड़ी और कहा, ‘शादी तो तेरी मर्जी से ही हुई थी भागी, पर तुझे लग ही गया बिलौरी का घाम। नहीं सहन कर पाई तू बिलैारी की धूप की ताप!’

एक गबूचा उठा और उसके गले में अटक गया। कैसा नामर्द हैं वह! जिन्दगी की कड़ी धूप सहने के लिए उसने भागी को अकेले छोड़ दिया। वह ओट से निकल कर उसके सामने आ गया। भागी अचकचा कर खड़ी हो गई।

न टकटकी बंधी और न किसी से बोल फूटे। दोनों आँखें नीची किए देर तक खड़े रहे। जब चुप्पी असह्र हो गई तो चंदर ने पूछा, ‘कैसी हो भागी तुम?’

‘देख तो रहे हो ठीक ही हँू,’ भागी ने कहा। और न चाहते हुए भी जोड़ दिया, ‘गाय चरा रही हँू। तुमको तो एकदम गंवार लग रही हूँगी।’ चंदर पर चोट करने का मोह संवरण नही कर पाई।

चंदर क्या जवाब देता। जैसा बोया था वैसा काटना तो पड़ेगा ही। नजर उठाई तो भागी को अपनी ओर देखते पाया। ‘तुम कैसे हो चंदर? तुमने अपनी यह कैसी हालत बना रखी है?’ उसने पूछा।

‘मैं तीन दिन से यहाँ आ रहा हँू भागी’ चंदर इतना ही कह पाया।

‘मुझे मालूम है, चंदर। यह छोटा गाँव है। किसी का आना छिपा नहीं रहता। जिस दिन तुम रेशम फार्म में आए थे उसी दिन मुझे पता चल गया था।’ फिर फीकी हँसी हँसते हुए उसने कहा, ‘मैं मौनी में तुम्हारा इंतजार कर रही थी। मैं अनहोनी की आशा कर रही थी। भूल गई थी कि मैं ही तुमको छोड़ कर आई थी।’

‘अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है भागी!’ चंदर ने कहा।

‘अब सही भी क्या रहा!’ साँस छोड़ते हुए भागी ने कहा।

‘ऐसा क्यांें कहती हो? हम बिखरा हुआ फिर समेट सकते हैं।’

‘क्या कया समेटोगे? कहँा से समेटोगे? जो बिखरा हैं वह कभी का गुम हो चुका हैं।’

क्या सचमुच? चंदर सोचने लगा। क्या भागी ठीक बोल रही है? कटिनाई से अपने को संयत कर उसने कहा, ‘तुम बदल गई हो भागी।’

‘हाँ चंदर, मैं बदल गई हूँ। तुमने मुझे बदलने पर मजबूर किया हैं। कम से कम तुम्हे यह शिकायत नहीं होनी चाहिए कि मैं बदल चुकी हँू। भागी ने थोड़े आवेश में कहा।

चंदर को करारी चोट पड़ी। जावेद और नीलेाफर से बात करके उसे अहसास हो गया था कि वह गलत हैं। पर कहीं एक आशा की किरण थी कि अंत में सब ठीक हो जाएगा। अब वह किरण बुझती नजर आ रही थी। पता नहीं क्यों उसे दादी की कहानी याद हो आई जो उसे बचपन में सुनाया करती थी। राजकुमार रुठी राजकुमारी को मनाने जाता हैं और राजकुमारी मान जाती है और उसके बाद वे दानेां हँसी-खुशी भरा सुखी जीवन बिताते है।

गाय दूर निकल गई थी उसको बुलाने के लिए भागी ने आवाज लगाई ‘सुरु! सुरु रुक जा। इधर आ।’ गाय वापस चली आई।

वह परीलेाक की कहानी थी और यह ठोस, कठोर यथार्थ है।

‘गाय अभी नई है। इसको अभी देखभाल की जरुरत है। एकबार आदत पड़ जाएगी तो फिर अपने आप चरने आया करेगी।’ भागी ने कहा।

इसका वह क्या मतलब निकाले? वह दिलोजान से कोशिश में था कि भागी उसको माफ कर दे और उसके साथ वापस चली चले, फिर से जीवन की शुरुआत करने। इधर भागी गाय को हाँक रही है और गाय की ही हाँके जा रही हैं जैसे कह रही हो अब बहुत हो चुका, जिस राह आए थे उसी राह वापस चले जाओ।

‘बहुत आत्मनिर्भर लग रही हो।’ चंदर ने कहा।

‘मैं आत्मनिर्भर पहले भी थी, चंदर। पर अपने जीवन साथी को अपने जीवन की बागडोर सौंपने में भी एक सुख होता हैं। तुमने वह सुख मुझसे छीना हैं चंदर।’ भागी ने कहा।

क्या यह भागी का उपालम्भ था। आवाज में तोड़ने वाली नहीं जोड़ने वाली भावना की झलक थी।

‘वापस चलो भागी।’ अचानक चंदर ने कहा।

‘नही चंदर, अब यह संभव नहीं है।’ भागी ने चेहरा नीचे करते हुए कहा।

‘संभव है भागी। मैं वादा करता हँू कि मैं तुम्हे अब और दुख नहीं दूँगा।’ चंदर ने याचना भरे स्वर में कहा।

‘नहीं।’ आवाज में दृढता थी, पर गालों पर आँसू लुढ़क आए।

‘मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, भागी।’

‘मुझे मालूम है चंदर। हम दोनों एक साथ नही रह पाए। पता नहीं क्यों। कभी इसका जवाब मिले तो मुझे बताना। चलती हूँ।’ कह कर भागी ने गाँव की और दौड़ लगा दी। और उसके पीछे गाय ने। भागी नहीं चाहती कि चंदर उसको रोते हुए देखे।

‘रुक जाओ भागी।’ चंदर ने आवाज दी।

भागी दूर जा कर रुकी। तब तक उसने अपने को संयत कर लिया था।

‘कल आओगी मिलने?’ चंदर ने पूछा।

भागी बिफर गई। उसने चंदर की ओर देखा और जोर से कहा, ‘नहीं। कभी नहीं। कदापि नहीं।’

और फिर गाँव की ओर दौड़ लगा दी।

चंदर ठगा-सा खड़ा रह गया। ऐसा क्या कह दिया उसने कि भागी इस तरह बिफर गई। ‘भागी! भागी! उसने आवाज दी पर भागी रुकी नहीं। फिर उसने गाय को आवाज दी, सरू! सरु रुक जा। इधर आ।’ गाय रुक कर उसकी और देखने लगी। भागी भी ठिठक गई।

‘फिर कब मिलोगी?’ उसने डूबते दिल से आवाज दी।

‘कभी नहीं’ उसने कहा और चल दी।

चंदर वही खड़ा-खड़ा बहुत देर तक सेाचता रहा कि यह क्या हो गया। फिर वहीं घास में लेट गया। एक एक बात जो उसके और भागी के बीच हुई थी उसी को दोहराता रहा। आशा-निराशा के बीच उतरते-डूबते दिन।

अब क्या रह गया था उसकी जिन्दगी में। भागी के बिना एक तो उसका जीवन ऐसे ही सूना हो चला था। फिर शायद नीलोफर से कभी नजरें न मिला पाएगा।

रात को उसने चाची को बताया कि कैसे भागी रुठ कर उसे सदा के लिए छोड़ कर आई हुई हैं।

उसने आज की मुलाकात के बारे में भी बता दिया।

‘चंदर तू पहाड़ का हो कर भी पहाड़ का न हुआ। तुमलेाग बाहर जा कर अपनी सभ्यता क्यों भूल जाते हो!’ चाची ने गंभीर स्वर में कहा।

‘क्या चाची मेरी जान पर आ बनी है और तुम पहाड़ी और देशी का पचड़ा लेकर बैठ गई।’

‘यह पचड़ा नहीं है। सभ्यता की बात है। बड़ों को इज्जत देने की बात है। यह तो भागी थी जो तुझसे मिलने जंगल चली आई।’ चाची ने कहा।

‘वह मुझसे मिलने नहीं आई चाची। गाय चराने आई थी।’ चंदर ने कहा।

‘और तू इस पर विश्वास करता हैं? इतने भोले मत बनो चंदर। पूरे गाँव को मालूम हैं कि वह तुझसे मिलने जंगल गई है। और तू! इतना न हुआ कि एक बार मौनी जा कर भागी के माँ-बाप से मिल आता। प्रणाम कर आता। अनबन तो तेरी भागी से हुई हैं न! यहाँ तक आया हैं तो उनसे मिलने क्यों नहीं गया?’

अब चंदर की समझ में कुछ आया। भागी का बिफरना भी उसकी समझ में आया।

‘गलती हो गई चाची। कल जाऊँगा।’

‘खाली हाथ मत जाना।’

‘अब चाची इतना तो मुझे भी मालूम हैं।’

अगले दिन जब वह मौनी भागी के घर गया। घरवालों ने उसकी आवभगत की, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

दिन भर वह गाँव के बच्चों के साथ खेलता रहा। भागी एक दो बार नजर आई, पर कोई बात न हो पाई। रात उसके सोने का इंतजाम भी वहीं एक कमरें में हुआ। उसे आशा हुई कि शायद पहले की तरह भागी उससे मिलने आए। फिर अपनी आशा पर उसे खिसियानी हँसी आई।

अगले दिन नाश्ते के बाद उसने वापस जाने की इच्छा जाहिर की। और हिम्मत करके कह ही दिया कि वह भागी को भी ले जाएगा साथ में।

‘मुझसे क्या पूछते हो चंदर। भागी से पूछ लेा। वह जाना चाहती है तो हमे क्या एतराज हो सकता है?’ भागी की माँ ने कहा।

चंदर ने वही से भागी को आवाज दी। भागी आई।

‘में तुम्हे लेने आया हँू भागी।’

भागी उसके चेहरे की और देखने लगी। बहुत देर तक देखती रही। पता नहीं क्या खोजने लगी उसके चेहरे में। और पता नहीं जो कुछ भी उसने खोजा उसे मिला या नहीं। उसने अपना सिर झुका लिया।

‘साथ चलोगी न?’

भागी ने स्वीकृति में सिर हिला दिया। और पूरे गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई।
पीछे

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