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दोपहर की मेनका

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कलायन पत्रिका

दोपहर की मेनका


कहानी – मथुरा कलौनी

 

””रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून”

ऐसा रहीम कवि कह गए हैं। उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में सिखाए गए विज्ञान विषय पर ध्यान दिया जाय तो यही लगता है कि रहीम अपने जमाने के सबसे बड़े कवि ही नहीं, सबसे बड़े वैज्ञानिक भी थे। विद्यालय में हमें बताया गया था कि मनुष्य के शरीर का बहुत बड़ा भाग पानी है। जी हां, मनुष्य का 80 प्रतिशत भाग तरल पदार्थ है। विश्वास तो नहीं होता कि इतने बड़े हाड़-मांस के शरीर का 80 प्रतिशत बहने योग्य है, लेकिन चूंकि विज्ञान यही कहता है इसलिए विश्वास करना पड़ता है। विज्ञान में यही तो खूबी है कि वह ज्ञान को चकरा देता है। खैर, यह एक अन्य विषय है।

यहां पर शरीर की रासायनिक रचना का जिक्र इसलिए आया था कि मैं
पिछले डेढ़ मिनटों से कड़कती धूप में पैदल चल रहा था और मेरे शरीर का यह 80 प्रतिशत भाग खौलने लगा था। और मेरे शरीर के सभी लोम-छिद्रों से पसीना नहीं, बल्कि भाप निकलने लगी थी। मेरे लिए कवि-वैज्ञानिक रहीम की रचना पर ध्यान देना अतिआवश्यक हो गया था। यदि मैं थोड़ी देर और धूप में रह जाता तो निश्चित था कि मेरा केवल 20 प्रतिशत बचा रहता।

मैंने भविष्य की कल्पना की तो 15 मिनटों के बाद का अपना चित्र दिखाई पड़ा – लंबी-लंबी हड्डियों से लटकी हुई सूखी मांसपेशियां और पपड़ी की तरह लिपटी हुई खाल। शरीर में पानी का सर्वथा अभाव।

कल्पित दृश्य इतना भयावह था कि मैं भागा घर की ओर। अपने कमरे की ठंडी छांव में, नंबर पांच पर घूमते हुए पंखे के नीचे लंबे हो कर ही चैन आया। जान बची लाखों पाए और जान है तो जहान है।

शरीर से भाप निकलनी बंद हुई और शरीर के तरल पदार्थ अपने साधारण तापमान पर आने लगे ही थे कि एक जोरदार चर्रचूं की आवाज सुनाई पड़ी। यह मेरे दरवाजे पर लगी हुई कालबेल की आवाज थी।

दरवाजा खोल कर देखा तो देखता ही रह गया। मेरे सामने मेनका सदृश्य एक लड़की खड़ी थी। मेनका से साक्षात्कार का सौभाग्य मुझे नहीं मिला है, लेकिन उसके बारे में मैंने बहुत पढ़ रखा है। उसकी छवि की कल्पना मैंने कर रखी थी। मेरे सामने खड़ी लड़की को देखकर मुझे लगा कि मेरी
कल्पना शरीर धारण कर मेरे सामने प्रकट हो गई है।

मैंने यह भी पढ़ रखा था कि मेनका के शरीर से निकली हुई सुगंध कोसों दूर तक फैलती है। इस संबंध में मैं कल्पना नहीं कर पाता था कि कैसे किसी लड़की के शरीर से सुगंध निकल सकती है, वह लड़की भले ही
अप्सरा क्यों न हो। मेरे सामने खड़ी लड़की को देखकर, या कहना चाहिए सूंघ कर मेरी समझ में सब कुछ साफ-साफ समझ में आ गया। अवश्य ही मेनका भी कुछ उसी प्रकार का सेंट लगाती होगी जो मेरे सामने खड़ी लड़की ने लगा रखा था।

”क्या हम आपकी श्रीमती जी से मिल सकती हैं?” मेनका ने पूछा।

तब मैंने देखा कि उसके साथ एक और लड़की भी थी। वह दरवाजे की ओट में खड़ी थी, इसीलिए मैं उसे पहले नहीं देख पाया था। या यह भी हो सकता है कि मेनका की चकाचौंध में वह मुझे न दिखाई पड़ी हो।

”इस घर में श्रीमती जी नहीं हैं।” मैंने अपनी आवाज में मिश्री घोलते हुए कहा।

”ओह! वे कब तक लौटेंगी?” मेनका ने पूछा।

उसके इस प्रश्न से मैं धन्य हो गया। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों को देख कर मैं ऐसे ही प्रश्न की अपेक्षा कर रहा था, किन्तु मुझे विश्वास नहीं था कि वह ऐसा प्रश्न पूछ ही लेगी। यह लड़की उन लड़कियों में से थी जिनके बारे में कहा जाता है कि उनकी बुद्धि घुटने में होती है। ऐसी लड़कियां बहुत दुर्लभ होती हैं।

आजकल की लड़कियां रुपवती भले ही हों, लेकिन वे पढ़-लिख कर इतनी तेज हो गई हैं कि उनकी सोहबत में खामखां ही हीन भावना का शिकार होना पड़ता है। आगरा के साथ घाघरा का तुक मिलाने वाली लड़कियां आज-कल कहां हैं, जिनके बारे में शायर लोग कह गए हैं कि ”इस सादगी पे कौन न मर जाए ए खुदा … इत्यादि।”

रूप और बुद्धि का ऐसा वांछनीय संगम मेरे सामने खड़ा था। उसने मुझसे फिर पूछा कि मेरी श्रीमती जी कब तक लौटेंगी?

”देवी जी।” मैंने कहा, ”यह घर एकदम श्रीमती विहीन है। मैंने अभी तक शादी नहीं की है।”

”ओह!” उसने एक बार फिर कहा और उसका मुंह लटक गया।

”वैसे क्या काम था आपका मेरी श्रीमती जी से?” उसके लटके मुंह से द्रवित हो कर मैंने कहा।

”आपने अभी तो कहा था कि आप अविवाहित हैं!”

”जी हां कहा था। और गलत नहीं कहा था।” मैंने कहा, और साथ में यह भी जोड़ा, ”आप तो ऐसे कह रही हैं जैसे अविवाहित रहना पाप हो।”

”एक ओर तो आप यह कह रहे हैं कि आप ने शादी नहीं की है और दूसरी ओर यह भी पूछ रहे हैं कि मेरी आपकी पत्नी से क्या काम है?” उस मेनका ने शिकायत-भरे स्वर में कहा।

”ओह,” मैंने उसकी दुविधा समझते हुए कहा और उसे समझाया, ”देवी जी, मेरा कहने का अर्थ था कि यदि मेरी श्रीमती जी होतीं तो आपको उनसे क्या काम हो सकता था?”

”अर्थात् मैं मिलने का कारण बताऊंगी तभी आप अपनी श्रीमती जी से मिलने देंगे।” उसने कहा।

मुझे उसके भोलपन पर प्यार आ गया। अब आपसे क्या छिपाऊं उसके भोलेपन पर ही नहीं उस पर भी प्यार आ गया। आपने प्रथम दृष्टि में प्यार के संबध में सुना होगा। उस मेनका-मुखी को देखकर मैं अपने अंदर इसी प्रकार का कुछ अनुभव कर रहा था। हमारी प्राचीन संस्कृति के अनुसार प्रथम दृष्टि में प्रेम हो जाना बहुत स्वाभाविक है। यदि यह घटना त्रेता युग में होती तो बात ही कुछ और होती। दुर्भाग्यवश मैं पैदा हुआ कलियुग में। और इस कलियुग में मेरी पारिवारिक संस्कृति भारत की प्राचीन संस्कृति से बहुत भिन्न है। मेरे परिवार में प्रेम-वेम का चक्कर अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता है। अपने संस्कारवश और आजकल की सभ्यता के हिसाब से मैं उस लड़की का नाम-पता तक नहीं पूछ सकता था।

इधर क्षण-प्रतिक्षण मेरा प्यार उस लड़की पर बढ़ता ही जा रहा था। जब उसने ऊपर वाली बात कही तो उसके स्वर में न तो व्यंग्य था और न ही आवेश। एक निरीह रुआंसी प्रकार की आवाज थी। शरीर की राजधानी घुटने में होने के कारण इन्द्रिय संचार व्यवस्था में गड़बड़ होना स्वाभाविक था और यही कारण था कि वह मेरी बात नहीं समझ रही थी। उसकी नासमझी उसको बहुत आकर्षक बना रही थी।

”देखिए,” मैंने कहा, ”मेरा विश्वास कीजिए, मैं अभी तक कुंवारा हूं। अर्थात् मेरी अभी तक शादी नहीं हुई है। चूंकि मेरी शादी नहीं हुई है, आप मेरी श्रीमती जी से नहीं मिल सकती हैं। यदि मेरे योग्य कोई सेवा हो तो आप बेझिझक कह सकती हैं।”

मैंने ये बातें बहुत धीरे-धीरे कही थीं ताकि सब कुछ साफ-साफ उसके घुटने तक पहुंच जाय। मेरी बात सुन कर उन दोनेां लड़कियों में थोड़ी देर तक कुछ खुसुर-फुसुर हुई और उसके बाद उसी जानुमस्तिष्क यौवना ने मुझसे पूछा-

”क्या आप पाउडर का इस्तेमाल करते

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