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कहानी – मथुरा कलौनी

एक क्षण तो मैं अचंभित हुआ कि बात मेरी श्रीमती जी से मेरे पाउडर के इस्तेमाल पर कैसे चली गई। तभी बात साफ-साफ समझ में आ गई। ये दोनेां लड़कियां निश्चय ही द्वार-द्वार जा कर पाउडर बेच रही हैं।
”अगर आप पाउडर बेच रही हैं तो मुझे खेद है कि मैं पाउडर नहीं खरीद पाऊंगा।” मैंने कहा।
”जी, मैं पाउडर नहीं बेच रही हूँ। मैं पाउडर के संबंध में जनता की राय ले रही हूँ।” उसने कहा।
”ऐसा क्यों कर रही हैं आप?” मैंने पूछा।
”जी, मैं एक विज्ञापन एजेंसी में काम करती हूँ। मेरी कंपनी को पाउडर के संबंध में जनता की राय लेने का काम मिला है। उसी सिलसिले में मैं आई हूँ।” उसने जल्दी-जल्दी कहा। उसके कहने के तरीके से यही लग रहा था कि वह यही बात कई जगह देाहरा चुकी है।
हाय, नियति भी कितनी कठोर है कि इस जलती देापहरी में जब गर्मी से पत्थर भी पिघल रहे हैं, इस चंद्रमुखी कोमलांगी को दर-दर भटकना पड़ रहा है। मैंने कहा, ”आइए, अंदर आइए।”
मैं दरवाजा छोड़ कर एक ओर हट गया। वह अंदर आई। उसके पीछे उसके साथ वाली लड़की भी जब अंदर आने लगी तब मुझे उसके बारे में ध्यान आया, नहीं तो मैं उसके बारे में भूल ही गया था। वैसे वह भी चुपचाप दरवाजे के एक कोने में खड़ी थी। सारी बातें मेनकामुखी ही कर रही थी।
अंदर ले जा कर मैंने उन दोनों को सोफे पर बैठाया और कहा- ”पूछिए, आप क्या पूछना चाहती हैं?”
इस पर उसने एक लंबा और देा पेज वाला फॉर्म निकाला और मुझे भरने के लिए दिया। मैंने उस फॉर्म को पढ़ा। उसमें पाउडर के संबंध में केवल दो प्रश्न थे-
1 – आप कोन-सा पाउडर इस्तेमाल करते हैं, और उसमें आपको क्या विशेषता दिखाई पड़ती है?
2 – हम एक आधुनिक पाउडर बनाने जा रहे हैं जो नवीनतम तकनीक से बनाया जाएगा। इस नए पाउडर से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?
इसके बाद सभी प्रश्न व्यक्तिगत थे। नाम, पता, आयु, विवाहित/अविवाहित, मासिक आय, आय के साधन, आय के अन्य साधन, परिवार के सदस्यों की संख्या, उनके नाम इत्यादि। उस फॉर्म को पढ़ कर मैंने कहा–
”यह तो मुझे इनकमटैक्स डिपार्टमेंट का फॉर्म लग रहा है। आप पाउडर के संबंध में जानना चाहती हैं या मेरे व्यक्तिगत जीवन के संबंध में?”
”पाउडर के संबंध में।” उसने कहा।
”तो यह सब जानकारी क्यों? आपके पाउडर का मेरी मासिक आय या मेरी आयु से क्या संबंध हो सकता है? मैंने पूछा।
”हमें बताया गया है कि इस जानकारी से कंपनी को यह मालुम होगा कि किस इनकम ग्रुप के और किस आयु के लोगों को किस प्रकार का पाउडर चाहिए?” उसने कहा।
”लेकिन यह सब जानकारी मैं आपको क्यों दूं?” मैंने पूछा।
”यह जानकारी आप मुझे नहीं दे रहे हैं, कंपनी को दे रहे हैं। यह सब जानकारी गोपनीय रखी जाएगी, कंपनी इसका आश्वासन देती है। यही भी इस फॉर्म के अंत में लिखा हुआ है। हमलोगों को भी भरा हुआ फॉर्म पढ़ने की मनाही है।” उसने कहा। साफ लगा रहा था कि वह ऐसे प्रश्नों की आदी है।
”प्लीज भर दीजिए न।” उसने कुछ रुक कर कहा और कुछ इस अंदाज से कहा कि मैंने तुरंत फॉर्म भर दिया। वैसे मेरा तो इरादा हो रहा था कि फॉर्म सामने पड़ा रहे और हम दोनों दिन भर बातचीत करते रहें।
फॉर्म लेकर उसने धन्यवाद दिया। दोनों लड़कियों ने नमस्ते की और चलती बनीं।
मेरा घर बिÏल्डग के दूसरे तल्ले पर था और मेरे घर की बालकनी से बिÏल्डग का प्रवेश द्वार दिखाई पड़ता था। मैं उन दोनों को देखने के लिए बालकनी में गया। बिÏल्डग की छांव से निकल कर दोनों धूप में गर्इं। धूप में ठिठक कर दोनों ने एक-दूसरे का माथा छू कर तापमान का अंदाजा लगाया और आगे चल पड़ीं। मुझे उन दोनों पर बहुत दया आई, विशेष कर मेनकामुखी कोमलांगी पऱ। नौकरी जो न कराए। इस धूप में जब सभी ऑफिस या घरों की छांव में बैठे थे ये दोनों सड़कें नाप रही थीं।
वह दिन मैंने घर में ही बिताया जिसके लिए अगले दिन मेरे ऑफिस के अधिकारी मेरे ऊपर बहुत उबले। उत्तर में मैं मन ही मन मुस्कराया था। क्यों न मुस्कराता? मेरे धूप में उबलने से तो यही अच्छा था कि मेरे अधिकारी गुस्से से उबलें। उस दिन घर में रहा तभी तो उस जानुमस्तिष्का रुपवती के दर्शन हुए।
उस दिन, दिन में मैं खूब सोया। सपने भी देखे। एक सपने में मैंने देखा कि वे दोनों लड़कियां मेरे साथ होली खेल रही हैं और अबीर-गुलाल की जगह सुगंधित पाउडर मेरे ऊपर छिड़क रही हैं।
बहुत पहले मैंने एक रुमानी उपन्यास पढ़ा था। उसमें कहानी की नायिका अपने नायक के जीवन में एक ताजा हवा के झोंके की तरह आती है। उस समय मुझे उस उपन्यास का लेखक पागल किस्म का व्यक्ति लगा था। ऐसी बेतुकी उपमाएं मैंने पहले कभी नहीं पढ़ी या सुनी थीं। लेकिन उस दिन उस लड़की से मिलने के बाद मुझे मालुम हुआ कि ताजा हवा का झोंका क्या होता है।
वह एक ताजा हवा का झोंका ही था जो आया और चला गया और जिसको अपने पास नहीं रखा जा सकता। मैं इसी पर संतोष करने लगा था कि वह लड़की फिर मेरे घर आई करीब 20 दिनों के बाद, इतवार का दिन था।
इस बार वह अकेली थी। मेरे अंदर बुलाने पर वह बेझिझक अंदर चली आई और सोफे पर बैठते हुए उसने कहा-
”मैं परसों भी दिन में आई थी। आपका घर बंद था।”
”दिन में मैं आफिस में रहता हूँ।” मैंने उससे कहा।
मुझे क्या मालुम था कि वह आने वाली है, नहीं तो मैं घर में ही बैठा उसकी प्रतीक्षा करता।
”शुक्रवार को छुट्टी नहीं होती आपकी?” उसने पूछा।
”’नहीं, रविवार को होती है। क्यों? मैंने कहा।
”पहली बार मैं शुक्रवार को ही आई थी और आप घर पर ही थे, इसलिए मैंने पूछा।” उसने कहा।
”उस दिन मैं ऑफिस नहीं गया था।” मैंने कहा, ”आज आप अकेली आई हैं, आपके साथ वाली लड़की कहां गई?” मैंने उससे पूछा।
”मैं उसको साथ नहीं लाई। वैसे, आज उसकी आवश्यकता नहीं थी।” उसने कहा।
”आवश्यकता नहीं थी?” मैंने पूछा।
”हां, जब किसी के घर पहली बार जाती हूं तो उसको साथ ले जाती हूं।” उसने कहा।
उसकी बात मैं समझ गया था, फिर भी मैंने उससे पूछा, ”क्यों?”
”पहली बार थोड़ा डर लगता है कि पता नहीं कैसे लोग मिलें। एक बार इत्मीनान होने पर अकेली ही जाती हूँ।” उसने कहा।
”अच्छा तो अभी यहाँ अकेली आकर आप मुझे एक तरह से सर्टिफिकेट दे रही हैं। मैंने कहा।
उसका इस तरह मेरे ऊपर विश्वास करना मुझे बहुत अच्छा लगा था, हालांकि मुझे मालुम था कि मैं भीरु होने की सीमा तक शरीफ था। मैंने अभी तक उसका नाम भी नहीं पूछा था। उसका नाम पूछने की इच्छा तो थी पर साहस नहीं हो रहा था। मेरी सर्टिफिकेट वाली बात पर वह हंस दी और अपने बैग से कागज निकालने लगी।
”आज भी आप किसी पाउडर के संबंध में आई हैं?” मैंने पूछा।
”जी नहीं, आज मैं एक साबुन के सिलसिले में आई हूं।” उसने कहा। और मुझे एक फॉर्म पकड़ा दिया।
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