“फिर भी।”
मिस्टर सिन्हा ने मोटर साइकिल निकाली, मिसेज सिन्हा ने चप्पलें। एस.डी.ओ. को लिखित बयान दे कर लौटते हुए वे स्थानीय अखबार के दफ्तर भी हो आए हैं। अखबार वाले ने सारी सूचना का विवरण लिखा और उन्हें आश्वस्त किया कि कल अपने तरीके से वे इस खबर को प्रकाशित कर देंगे। घर लौटकर फिर दोनों के बीच एक मौन छा गया है। वक्त के गुजरने का अहसास घड़ी के घंटे दे रहे हैं।
“ऐसा करते हैं। मान लो, लड़के आ ही गए तो उनकी आवभगत का थोड़ा इन्तजाम तो होना ही चाहिए। अभी तो बहुत समय बाकी है।” मिस्टर सिन्हा ने ही चुप्पी तोड़ी।
दोपहर हो गई थी। अभी खाना बनाना था। महरी के लिए रसोई खाली करनी थी। कपड़े वाशिंग मशीन में डालने थे। बचा हुआ खाना फ्रिज में डालना था। गर्मियों की दोपहर यूँ भी भारी पड़ती है। लू चलनी शुरू हो चुकी थी। घर – आँगन के दरवाजे बन्द कर परदे खिसका देने थे। इतना कुछ करने को बाकी था और तब भी लग रहा था कि वक्त गुजर ही नहीं रहा। मिसेज सिन्हा यंत्रवत् सबकुछ निबटाती रहीं। कौन जाने यही अन्त हो! यदि लड़के सचमुच आए और वह सब कर गुजरे जिसकी धमकी वे दे गए हैं तो यह उनदोनों का आज आखिरी दिन है। जिन्दगी खत्म होती है यहाँ। सहानुभूति जताने कल शायद कई लोग चले आएँ। शायद उनके साहस को पुरस्कृत किया जाए। अखबारों में खबर छपे, बहस छिड़े। लेकिन, फिलहाल तो वे हैं और पतिदेव हैं। इस मुसीबत से उन दोनों को अकेला ही निबटना है। वरना, अबतक तो खबर पूरे कॉलेज में फैल चुकी होगी। चिड़िया का बच्चा भी पर मारने नहीं आया। कौन जाने कईयों को खुशी ही हुई हो। अक्सर ही उनके साहस को दुस्साहस कहा गया है। जलनेवालों की भी कमी नहीं। लड़कों के हुजूम से अकेले लड़कर पतिदेव जीतने से तो रहे। यदि जीवित बचे तो भी उनकी दुर्दशा पर आत्महत्या ही करेंगे। बच्चों को खबर मिलने तक तो सारा खेल खत्म हो चुका होगा। वैसे उस बारे में अब ज्यादा कुछ सोचने को है नहीं। बच्चों के प्रति उनके कर्तव्य पूरे हो चुके हैं। वे दोनों नि‚िचन्त हैं उस तरफ से। शायद इसीलिए पतिदेव ने उनके साहस को कभी तिरस्कृत नहीं किया। कभी उन्हें डराया नहीं कि इतने खतरे न उठाएँ। कॉलेज की व्याख्याता का जीवन शान्त समरस होता है, यही बोध उन्होंने बचपन से पाया था। घर और बाहर के दायित्व साथ-साथ निभाने में कोई दिक्कत नहीं आयेगी – यही सोच उन्हें इस नौकरी तक ले गई थी। समय के साथ समाज के समीकरण भी इस तरह बदल जायेंगे, तब कहाँ अहसास था।
लेकिन इतना क्यों सोच रही हैं वे ?
तमाम खयालों को झटक कर देखने लौटीं कि पतिदेव कहाँ हैं। मिस्टर सिन्हा ने दरवाजे का ग्रिल लगा दिया था और दरवाजा खुला छोड़ दिया था।
“लड़के आए तो शक्लें पहले ही दिख जायेंगी। वरना, दरवाजे की कॉलबेल किसने बजायी, दरवाजा खोले बिना मालूम ही नहीं पड़ता। ठीक है न?” पत्नी को सामने पा वे पूछ रहे थे।
अब मिसेज सिन्हा की समझ में आया कि तमाम बन्द दरवाजों के बावजूद यह गर्म हवा कहाँ से आ रही थी। पूरा घर तप रहा था जैसे। उस तपती दोपहरी में पति-पत्नी उस आहट पर कान लगाए बैठे थे जो कभी भी सच्चाई में तब्दील हो सकती थी।
दोपहर का खाना खा लिया गया। दरवाजे की आड़ में डंडे रख लिए गए थे जो घर में उपलब्ध थे और वस्तुत: दरवाजे की अटकन के रूप में प्रयुक्त होते रहे थे। कहीं से एक लोहे की छड़ छत पर पड़ी मिल गई थी। मिस्टर सिन्हा उसे भी उठा लाए थे। हालाँकि ये सारे प्रयत्न उस घटना को देखते हुए हास्यास्पद कहे जा सकते थे जिसके मद्देनजर यह सारा इंतजाम किया गया था। लड़के गुण्डे किस्म के थे और देसी कट्टे हों उनके पास तो कोई आ‚चर्य नहीं, यह मिस्टर सिन्हा ने खुद स्वीकार किया था।
टन्न- टन्न करके घड़ी ने दिन के दो बजाए।
दिन ढलने लगा था। अभी तक दरवाजे पर कोई नहीं आया था। सड़कों पर सन्नाटा पसरा था और कभी हॉर्न देती कोई मोटरसाईकिल गुजर जाती तो पति-पत्नी दोनों सिर उठा कर देख लेते। फिर सन्नाटा पसर जाता। गूँजती केवल पेड़ों की साँय- साँय और कभी -कभार कौवा काँव काँव कर सन्नाटे को तोड़ जाता।
साँझ ढल आई। लड़कों के आने का वक्त बीत गया या अब वक्त हुआ, इस बारे में दोनों में से कोई भी स्पष्ट नहीं था। महरी काम करके जा चुकी थी। शाम की चाय बनाकर पी ली गई। कॉलेज से किसी शुभचिन्तक का कोई फोन नहीं आया। मिस्टर सिन्हा से अबतक किसी ने कुछ नहीं पूछा था। वरना, सारे दिन फोन बजा करता। नि‚चय ही तमाम लोगों को खबर है। कोई क्यों इस मामले में हाथ डालने लगा? किसकी शामत आई है ! मिसेज सिन्हा अबतक अपने को बहुत अपराधी महसूस करने लगी थीं। उनकी वजह से ही हुआ यह सब। इनकी भी जान पर बन आई है। कितने गम्भीर हैं, ज्यों मौत का बुलावा आनेवाला हो। वरना, इतना चुप रहना उनसे कभी होता है क्या ? उन्हें इस तरह सबों को मुसीबत में डालने का क्या हक है! सिर्फ उन्हीं की बात होती तो कोई और बात थी। स्त्री होकर भी इतना साहस! कदाचार मुक्त परीक्षाएँ करवाने का कुछ उन्हें ठेका मिला है क्या ?
मिस्टर सिन्हा सीढ़ियों से उतरकर लॉन में टहलने लगे थे। निगाहें अब भी रह-रहकर सड़क की ओर मुड़ जातीं। मिसेज सिन्हा भी नीचे उतरीं।
“तुम्हारे गुण्डे नहीं आए?” सहसा मिस्टर सिन्हा ने चुप्पी तोड़ी। “आए क्या?” मिसेज सिन्हा चौंकी।
“आए क्या?” मिसेज सिन्हा चौंकी।
एकबारगी दोनों बेसाख्ता हँस पड़े।
वातावरण में इतने समय से घिर रहा तनाव सहसा छँट गया।
ढलती शाम में गर्मियों की शीतल बयार शुरू हो चुकी थी।
आज का दिन बीत गया था।
रात गुजरनी थी। वो भी गुजर गई।
सुबह का अखबार बतला रहा था – “कल महिला कॉलेज में परीक्षाओं के दौरान एक महिला व्याख्याता के साथ हुए दुव्र्यवहार को ध्यान में रखते हुए एस.??.ओ. ने परीक्षाओं के दौरान सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करने का निर्णय लिया है। कल की घटना की जाँच के आदेश दे दिए गए हैं।”
मिसेज सिन्हा के चेहरे पर एक आश्वस्ति भरी मुस्कान खेल गई।
एक बार फिर वे जीत गई थीं !