+91 80 4372 3449
कहानी – घनश्याम सिंह तोमर
मालती एक टक उन्हें देखे जा रही थी। उनका चेहरा-किसी शंातझिल के जल की तरह, ठहरा हुआ, निर्विकार सौम्य।
सफेद कुरते में यह चेहरा कितना कांतिमय लग रहा था। उन्हें सफेद रंग बहुत पसंद था। वे कहते सफेद रंग सातों रंगों के मिश्रण से बना हैं, यह साधुवाद का प्रतीक हैं।
सफेद कुरते में सुनहरे बटन अब भी चमक रहे थे। यह बटन उन्हें मालती ने लाकर दिये थे। वे कुछ बिगड़े भी थे, किन्तु जब मालती ने कहा था कि यह उसकी पसंद के हैं तो उन्होने बिना किसी विरोध के चुपचाप कुर्ते में लगा लिये थे। इसके बाद भी वे बड़े प्यार से कपड़े बदलते समय स्वयं उन्हें अपने हाथ से निकाल कर धुले कुर्ते में लगा लिया करते थे। कभी-कभी बच्चे कहते कि पापा यह बटन बदल दीजिए, काफी पुराने पड़ गये हैं और अब इनका चलन भी नहीं रहा, तो वे बड़े प्यार से उन्हे झिड़क कर कहते,
नहीं बेटे यह बटन न तो पुराने पड़ सकते हैं। और न इनका चलन बदल सकता है। यह तो तुम्हारी मम्मी ने लाकर दिये हैं।
उन्हें खुशबुओं से प्यार था। उनके कमरे में हमेशा एक मादक सुगन्ध उठती रहती थी। व्ेा जिस ओर हेाकर निकल जाते पराग की एक हल्की सी लकीर हवा में तैर जाती।
मालती को भी यह सुगन्ध भली लगती थी। चालीस साल से वह इस सुगन्ध के साथ रह रही थी। अब तो यह सुगन्ध उसमें इतनी रच बस गई थी कि उसे यह अहसास होने लगा था कि वह खुशबू स्वयं उसके बदन से उठ रही हैं।
उनके लिखने-पढ़ने की आदत से मालती काफी परेशान रहती थी। वे रात काफी देर तक लिखा-पढ़ा करते थे। मालती को यह सब नहीं सुहाता था। वह इन क्षणों को अपने लिये चाहती थी। आज भी रोज की भांति डायरी उनके तकिये के पास रखी हुई थी। खुली हुई, और पेन भी सलीके से रखा हुआ था। शायद रात में उन्होने कोई नई कविता लिखी थी। मालती ने अपनी नजर उठाई और धुँधलाई आँखों से वे पंक्तियाँ पढ़ी जो मोटे अक्षरों में लिखी हुई स्पष्ट दिख रही थी।
बहुत समय बीत गया चलेा घर चलें……….
कई बार ऐसा हुआ था कि मालती ने झुंझालाइट में उनसे कई अनर्गल बातें कह दीं। एक बार तो उनसे यह भी कह दिया था कि जिसकी याद में वे कविता या कहानियाँ लिखते हैं, उसी के पास जाकर रहें। कहने को तो मालती ने यह सब कह दिया था लेकिन बाद में मन ही मन पछताई कि उसे यह सब नही कहना चाहिये था, क्योंकि उसकी बात सुनकर उनका चेहरा उतर गया था। वे लाइट आफ करके लेट गये थे। और मालती काफी देर तक उनकी गहरी साँसों से उनकी पीड़ा का अन्दाजा लगाती रही थी।
उन्हें इस बात का दुख था कि शायद मालती के मन से उनके प्रति विश्वास कम हो रहा हैं। यह विश्वास जिस पर सारी दुनिया का काम चल रहा हैं, और जिस पर सब रिश्ते टिके हुये हैं। उनके मन को गहरी चोट पहुँची थी, जिस चरित्र बल पर उन्हेांने ख्याति और आदर घर के बाहर की दुनिया में प्राप्त किया हैं, वही आज स्वयं उनकी पत्नी ने एक वाक्य के धक्के से, बालू की भीत की भांति गिरा दिया।
शराब के नशे में ही वह अपने आत्म विश्वास को खोज पाता था। शराब के नशे में सावित्री को डंाट डपट कर ही उसे आत्मतुष्टि होती थी। नीचे लुढ़कना एक आसान पथ है। राजू नीचे लुढ़कता गया। डांट डपट से गाली-गलौज पर और शीघ्र ही मारपीठ पर उतर आया।
शराब उसे ले डूबी। गैरेज बंद हो गया और शीघ्र ही खाने के लाले पड़ गए। सावित्री ने पहले राजू को सुधारने का प्रयत्न किया था लेकिन जब वो असफल रही तो उसे छोड़ने का निश्चय कर लिया था। दुर्भाग्यवश उस समय वह बीमार और गर्भवती थी। इसी नरक में अमर ने जन्म लिया। अभाव में अमर का लालन पालन करते और राजू के अत्याचार सहते सहते महीनों, सालों बीत गए। अमर तीन या चार साल का रहा होगा जब सावित्री थक हारकर जवानी में ही जर्जरित हुए शरीर को छोड़ कर इस दुनिया से चल बसी।
उस समय अंधेरा हेा चला था। जब तक सावित्री में साँस थी तब तक अमर उसके पास बैठा उसे झंझोडता रहा। जब सावित्री कि साँस बन्द हुई तो वह डर कर रेाने लगा था। रोते रोते उसका गला बैठ गया था। तब आया था राजू। नशे में धुत्त होकर।
राजू ने सावित्री को गाली दी और उसे उठने को कहा। सावित्री नहीं उठी तो लड़खड़ाते कदमों वह उस पर पिल पड़ा। इतनी मार खाने के बाद भी जब सावित्री ने चूं तक नहीं की तो उसका माथा ठनका। तभी उसे अमर की याद आई। कमरे में इधर-उधर देखा तो उसने अमर को एक कोने में पाया। अमर चुपचाप बिना पलकें झपकाए राजू को देख रहा था।
पता नहीं राजू ने उन आँखो में क्या देखा। पता नहीं वो क्या समझा। जो भी हो वह उसी समय घर से निकल गया था। उसके बाद वह कहाँ गया किसी को मालुम हुआ था।
मोहल्ले के एक दयालु आदमी ने अमर को एक अनाथाश्रम में डाल दिया। अनाथाश्रम का संचालक एक कर्मठ व्यक्ति था, जिसे लेाग गुरुजी कहते थे। गुरुजी को अमर पर विशेष अनुकंपा न हुई होती तो अमर शायद ही बचता। बीमार बचपन से गुजर कर वह जवान हुआ। वह अपने मॉे बाप को भूल चुका था, लेकिन उस रात की घटना, जब उसकी माँ मरी थी, उसके मस्तिष्क में कहीं कुछ कुरेद गई थी।
उस रात की अस्पष्ट सी याद उसे यदा-कदा परेशान कर देती थी। यहाँ तक कि उसे अंदर ही अंदर विश्वास हो चला था कि उसका मानसिक सन्तुलन ठीक नहीं है। उसने बहुत सोचा, पुस्तकों में बहुत खोजा, लेकिन उसे इसका उत्तर नहीं मिला कि उसके मस्तिष्क में धुंधले चित्र क्यों उभरते हैं। किसी से कहने का साहस उसे नहीं होता था, इस डर से कि कहीं लोग उसे पागल न समझने लगें । आश्रम के कामेां में और गुरुजी की सहायता करने में वह अपने को व्यस्त रखता था।
अनाथाश्रम के पास ही एक क्लब था जहाँ जूडो सिखाया जाता था। वहाँ अमर घंटो खड़े होकर लड़के-लड़कियों को व्यायाम करते और जूड़ो के दाव सीखते देखा करता था। एक दिन एक लड़की रजनी ने जूड़ो सीखने के लिए क्लब में प्रवेश लिया। उसके व्यक्तित्व ने अमर को इतना प्रभावित किया कि उसने भी अपनी झिझक पर विजय पाकर जूड़ो सीखने के लिए प्रवेश ले लिया।
रजनी भी अमर की ओर आकर्षित हुई थी। अमर औरों से भिन्न था। उसके चहरे से लगता था कि उसके लिए जीवन पथ दुर्गम ही रहा है। कभी वो हंसमुख रहता था तो कभी अभेद्य गंभीरता ओढे हुए। रजनी जितना भी उसके बारे में जानने का प्रयत्न करती थी उतना ही उलझ जाती थी। चेारी छुपे देखा-देखी से आरंभ होकर, धीरे धीरे उन दोनों का संबंध सरल सुलभ वार्तालाप पर आ गया। लेकिन अमर सब समय सरल और सुलभ नहीं होता था। कभी कभी जब वह अपनी ही भावनाओं की जटिलता में खोया रहता था तो रजनी को लगता था कि अमर उसके लिए एक नितांत अपरिचित हैं।
जूडो सीखते सीखते अमर का अपने ऊपर विश्वास बढ़ गया था। रजनी का सहचर उसके आत्मविश्वास को दृढ़ बनाता था। लेकिन मस्तिष्क में उभरते अस्पष्ट बिंबांे ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। जब बिना कारण ही उसका मस्तिष्क उन धुंधले चित्रों के बारे में सोचना आरंभ कर देता था तब उसका आत्म विश्वास बरसाती पानी की तरह बह जाता था।
इसी समय एक ऐसी घटना हुई जिसने अमर को चूर करके रख दिया। गुरुजी की किसी ने हत्या कर दी थी। अमर ऐसा बिखरा कि रजनी भी उसे नहीं सम्हाल पाई। गुरुजी की हत्या के तीसरे दिन अमर को उनका एक पत्र मिला।
”अमर,
बहुत संभव हैं यह पत्र तुम्हें मिलने तक मेरी हत्या हो चुकी हो। अगर ऐसा हो गया तो मेरा एक काम अधूरा रह जाएगा। इसको तुम अवश्य पूरा करना। कार्यालय की मेज के डराज में मेरी एक डायरी हैं, उससे तुम्हें सबकुछ पता चल जाएगा। अपने ऊपर भरोसा रखना।
गुरुजी।”
गुरुजी की डायरी से अमर को मालुम हुआ कि वे एक ”डबल्यू” नामक आदमी की पीछे लगे हुए थे। यह डबल्यू चरस आदि दवाइयों का व्यापार करता था। इस व्यापार में अनाथाश्रम का ही एक व्यक्ति रघुराम भी सम्मिलित था। गुरुजी ने ही दौड़ धूप करके इस रघुराम के लिए एक पान की दुकान की व्यवस्था की थी। इसी पान की दुकान से रघुराम नशीली दवाइयाँ बेचता था किशोर बालकों को इनका आदी बनाने का चक्कर चलाता था। रघुराम को यह नशीला दवाइयाँ डबल्यू सप्लाई करता था।
गुरुजी की डायरी की अंतिम लिखावट उनकी हत्या के कुछ घंटे पहले की थी। इसमें लिखा था कि जब गुरुजी अनाथाश्रम के लिए किए गए एक कार्यक्रम के बाद जब रात को लौट रहे थे तो रास्ते में उनको रघुराम दिख गया। वे उसका पीछा करने लगे। रास्ते में रघुराम को उबल्यू मिला और दोनों साथ चलने लगे। थोडी देर बाद अचानक उबल्यू ने एक छुरा निकाला और रघुराम के पेट में भोंक दिया। गुरुजी के मुँह से चीख निकल गई। डबल्यू ने उन्हें देख लिया। डबल्यू उनकी तरफ बढ़ा तो किसी तरह बचते हुए आश्रम पहुँचे।
इसी बीच शायद कहीं उन्होंने अमर को पत्र लिखा था। हत्यारा उनका पीछा करता हुआ निश्चय ही अनाथाश्रम पहुँच गया था। उसने उनके कमरे में ही उनके पेट में शायद वही छुरा भोंक दिया था।
गुरुजी के उस पत्र ने और डायरी में लिखी हुई बातों ने अमर को स्वयं को संहालने के लिए प्रेरित किया। गुरुजी का अधूरा कार्य पूरा करने का संकल्प किया। उसके सामने अब एक उद्देश्य था। इससे जीवन के प्रति उसकी वितृष्णा किसी सीमा तक दूर हो गई।
अमर ने रघुराम की पान की दुकान से डबल्यू की खोज आरंभ की। पान की दुकान बंद हो जाने से डबल्यू का एक रास्ता बंद हो गया था। जब अमर ने दुकान खोली तो डबल्यू उसके पास गया। उसने अमर को अपना नाम एक्स बताया, जेवियर का संक्षिप्त रुप।
डबल्यू उर्फ एक्स के चेहरे ने अमर को विचलित कर दिया था। यह चेहरा उसे जाना पहचाना लगा, लेकिन बहुत प्रयत्न करने पर भी वह याद कर नहीं पाया कि उसने यह चेहरा कहाँ देखा हैं।
एक्स के परोक्ष रुप में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में उसने ऐसा जताया कि वह चरस आदि के व्यापार में रुचि रखता हैं। उसने एक्स का पीछा किया और उसके माध्यम से वह उस व्यक्ति के ठिकाने तक जा पहुँचा जो इन पदार्थों का व्यापार बहुत बड़े पैमाने पर कर रहा था।
दुर्भाग्यवश अमर पकडा गया। उसने बहुत संघर्ष किया। जूडो कि शिक्षा भी काम में आई लेकिन कुछ समय के लिए ही। वह अकेला था और वे कई। सबने मिलकर उसके हाथ-पाँव बंाध दिए। उसे समाप्त करने का काम एक्स को सौंपा गया।
एक्स ने पहले मदिरा पान किया। फिर ग्लास में बची हुई मदिरा उसने अमर के मुँह में दे मारी। शराब उसके आँख में चली गई। जलन से उसके आँखे भींच ली। साथ ही शराब की दुर्गन्ध से वह बेहोश-सा होने लगा। इसके साथ ही उसके मस्तिष्क में वही धुंधले चित्र उभरने लगे। लेकिन यह कया! चित्र अभी उसे साफ-साफ दिखाई पड़ रहे थे। वह देख रहा था कि वह रो रहा हैं क्योंकि उसकी माँ को कोई मार रहा हैं। मारने वाला कोई और नहीं था यही एक्स था। उसने आँखे खोली तो पाया कि शक कि कहीं कोई गुंजाइश नहीं थी। यही नराधम एक्स उसका बाप राजू था।
राजू सावित्री के रहते-रहते अच्छे बुरे में अंतर भूल चुका था। अब तो शराब और दो रोटी के लिए उससे कोई कुछ भी करा सकता था। जब कभी उसका नशा टूटता था तो उन व्यक्तियों के चहरे उसे डराने लगते थे जिनकी उसने हत्यायेंं कीं थी। इसीलिए वह नींद से जागते ही बोतल पकड़ लेता था। यदि केाई उसे कहता कि इस समय वह जिसकी हत्या करने जा रहा हैं वह उसका बेटा है तो बहुत संभव है उसे कोई फर्क नहीं पडता।
खैर, उसे कुछ करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। पुलिस पहूँच गई। अमर और पान की दुकान पर आने-जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर पुलिस की नजर थी। अमर का भाग्य अच्छा था कि पुलिस समय पर पहुँच गई।
गिरोह पकड़ा गया। गुरुजी का कार्य पूरा हुआ। तथा अमर को विश्वास हो गया कि वह पागल नहीं है। उसने जो मानसिक यातना भुगती हैं वह बचपन की दुर्घटना से संबंधित थी।
वह एक नई आशा के साथ रजनी के घर जाता है।
————————————–