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किसके प्रति

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कलायन पत्रिका

किसके प्रति


कहानी- सुधा

 

किसी राजा के दरबार में एक अति गुणी गायक थे। संगीत-प्रेमी राजा उनकी बहुत इज्जत करता था। गायह को उसने अपने मित्र का दर्जा दे रखा था। एक दिन मधुर संगीत सुनने के बाद राजा ने कहा- ‘सचमुच तुम्हारा जोड़ा नहीं है। मेरे मन में यह बात बार-बार आती है कि तुम्हारे गुरु कौन हैं! वे कैसा गाते होंगे!’

गायक ने श्रध्दा के साथ अपने गुरु का नाम बताया।

‘कभी उनका गायन सुनते!’ – राजा ने इच्छा व्यत की।

‘लेकिन, राजन ! वे किसी के कहने से और किसी को सुनाने के लिये नहीं गाते।’

‘तब ?’

‘स्वेच्छा से कभी भी गा सकते हैं।’

‘हमलोग प्रतीक्षा तो कर सकते हैं !’

‘लेकिन उन्हें यदि पता चल गया कि कोई सुनने बैठा है तो, शायद गायें ही नहीं; वहाँ से दूर चलें जायें !’

‘सेा तो है। तो, ऐसा करो कि हम आस-पास कहीं छिप कर रहें। ताकि उन्हें विरक्ति नहीं हो।’

‘हाँ यह तो हो सकता है।’

संगीत-गुरु जंगल में अपनी कुटी बना कर रहते थे। उनके इस शिष्य के साथ उस गुणरसिक राजा ने कर्णलभ्य दूरी पर अपना गोपनीय डेरा डाल दिया। अनेक दिनों की प्रतीक्षा के बाद गुरु के गायन से सराबोर होने का आनन्द उन्हें मिल पाया। उस अदभुत स्वर के आनन्द में डूबा हुआ राजा फिर वैसा ही कुछ सुनने को लालायित हो उठा।

लेखिका – सुधा

किसीराजा के दरबार में एक अति गुणी गायक थे। संगीत-प्रेमी राजा उनकी बहुत इज्जत करता था। गायह को उसने अपने मित्र का दर्जा दे रखा था। एक दिन मधुर संगीत सुनने के बाद राजा ने कहा- ‘सचमुच तुम्हारा जोड़ा नहीं है। मेरे मन में यह बात बार-बार आती है कि तुम्हारे गुरु कौन हैं! वे कैसा गाते होंगे!’

गायक ने श्रध्दा के साथ अपने गुरु का नाम बताया।

‘कभी उनका गायन सुनते!’ – राजा ने इच्छा व्यक्त की।

‘लेकिन, राजन ! वे किसी के कहने से और किसी को सुनाने के लिये नहीं गाते।’

‘लेकिन….. !’ !’

‘तब ?’

‘स्वेच्छा से कभी भी गा सकते हैं।’

‘हमलोग प्रतीक्षा तो कर सकते हैं !’

‘लेकिन उन्हें यदि पता चल गया कि कोई सुनने बैठा है तो, शायद गायें ही नहीं; वहाँ से दूर चलें जायें !’

‘सेा तो है। तो, ऐसा करो कि हम आस-पास कहीं छिप कर रहें। ताकि उन्हें विरक्ति नहीं हो।’

‘हाँ यह तो हो सकता है।’

संगीत-गुरु जंगल में अपनी कुटी बना कर रहते थे। उनके इस शिष्य के साथ उस गुणरसिक राजा ने कर्णलभ्य दूरी पर अपना गोपनीय डेरा डाल दिया। अनेक दिनों की प्रतीक्षा के बाद गुरु के गायन से सराबोर होने का आनन्द उन्हें मिल पाया। उस अदभुत स्वर के आनन्द में डूबा हुआ राजा फिर वैसा ही कुछ सुनने को लालायित हो उठा।

‘जो तुम्हारे गुरु गा रहे थे, तुम भी वही राग गाओ मित्र!’

‘जो आज्ञा। ‘

संगीतज्ञ ने अपने गुरु से सीखा हुआ वह राग पूरी कुशलता के साथ गाया। कहीं कोई त्रुटि नहीं हुई। लेकिन राजा को लगा जैसे यह गुरु द्वारा गाये हुए राग का विद्रूप हो। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया छिपायी भी नहीं।

‘यह वह राग है?’

‘हाँ राजन।’

‘लेकिन….. !’ !’

‘महाराज, हमारे गुरु का गायन उनकी अंतरात्मा की आवाज पर, प्रभु के प्रति होता है। और मेरा गायन आपके आदेशेां पर, आपके प्रति है राजन!’

राजा ने पूरी विनम्रता के साथ इस अंतर को समझ लिया।

सामाप्त

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